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ग़ज़ल
न जाना ना-तवानी पर कि अब भी सई-ए-नाख़ुन से
दिखा सकते हैं हम ज़ख़्म-ए-कुहन का मुस्कुरा देना
साइल देहलवी
ग़ज़ल
अमानत मोहतसिब के घर शराब-ए-अर्ग़वाँ रख दी
तो ये समझो कि बुनियाद-ए-ख़राबात-ए-मुग़ाँ रख दी
साइल देहलवी
ग़ज़ल
ऐ ख़ुदा शिकवा नहीं 'साइल' को तेरी ज़ात से
माँ मिरी को बख़्श दे तू तुझ से है बस ये दुआ
शहज़ाद हुसैन साइल
ग़ज़ल
'नज़ीर' बस्ती के लोगों को क्यों नहीं एहसास
ये सैल-ए-आब है और सिर्फ़ मेरा घर ही नहीं
नज़ीर तबस्सुम
ग़ज़ल
अगरचे होंटों पे पानी की बूँद भी नहीं थी
सुलगते लम्हों को एक सैल-ए-आब मैं ने दिया
अबुल हसनात हक़्क़ी
ग़ज़ल
पत्थरों में ठोकरें खाता है नाहक़ सैल-ए-आब
पूछो क्या ले जाएगा आ कर मिरे ग़म-ख़ाना में