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ग़ज़ल
'ग़ालिब' ओ 'शेफ़्ता' ओ 'नय्यर' ओ 'आज़ुर्दा' ओ 'ज़ौक़'
अब दिखाएगा ये शक्लें न ज़माना हरगिज़
अल्ताफ़ हुसैन हाली
ग़ज़ल
जिगर मुरादाबादी
ग़ज़ल
यूँ पीर-ए-मुग़ाँ शेख़-ए-हरम से हुए यक-जाँ
मय-ख़ाने में कम-ज़र्फ़ी-ए-परहेज़ बहुत है
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
ग़ज़ल
ग़ुंचा-ओ-गुल के साथ साथ दिल की तरफ़ भी इक नज़र
शेफ़्ता-ए-शगुफ़्तगी वज्ह-ए-शगुफ़्तगी समझ
ख़ुमार बाराबंकवी
ग़ज़ल
ये तर्ज़-ए-तरन्नुम कहीं ज़िन्हार न ढूँडो
ऐ 'शेफ़्ता' या मुर्ग़-ए-चमन रखते हैं या हम
मुस्तफ़ा ख़ाँ शेफ़्ता
ग़ज़ल
क्यूँ ये हुजूम-ए-शोर-ओ-शग़ब है नुशूर में
ऐसा तो 'शेफ़्ता' हमें ख़्वाब-ए-गिराँ नहीं
मुस्तफ़ा ख़ाँ शेफ़्ता
ग़ज़ल
इक दम के न मिलने पे नहीं मिलते हैं मुझ से
ऐ 'शेफ़्ता' मायूसी-ए-उम्मीद-फ़ज़ा देख
मुस्तफ़ा ख़ाँ शेफ़्ता
ग़ज़ल
रब तो है शाफ़ी-ए-मुतलक़ है शिफ़ा-बख़्श वही
सर दर-ए-ग़ैर पे तुम अपना झुकाया न करो
हाजरा नूर ज़रयाब
ग़ज़ल
आज कुछ और दिनों से है सिवा इस्तिग़राक़
अज़्म-ए-तस्ख़ीर फिर ऐ शेख़-ए-ज़मन किस का है