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ग़ज़ल
ख़याल-ए-मर्ग कब तस्कीं दिल-ए-आज़ुर्दा को बख़्शे
मिरे दाम-ए-तमन्ना में है इक सैद-ए-ज़बूँ वो भी
मिर्ज़ा ग़ालिब
ग़ज़ल
तड़प कर मर गया वो सैद-ए-बाल-अफ़्शाँ कि मुज़्तर था
हुआ नासूर-ए-चश्म-ए-ताज़ियत चश्म-ए-ख़दंग आख़िर
मिर्ज़ा ग़ालिब
ग़ज़ल
क्या मज़ा है तेग़-ए-क़ातिल में कि अक्सर सैद-ए-इश्क़
आन कर उस पर रगड़ते अपनी गर्दन आप हैं
बहादुर शाह ज़फ़र
ग़ज़ल
अव्वल मुर्ग़ रिश्ता बपा सा था पाबंद-ए-तार-ए-ज़ुल्फ़
हल्क़ा-ए-गेसू में ला उस को आख़िर सैद-ए-दाम किया