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ग़ज़ल
कभी सू-ए-दश्त निकल पड़े कभी सू-ए-दार चले गए
तिरी चाह में न कहाँ कहाँ तिरे बे-क़रार चले गए
सरफ़राज़ बज़्मी
ग़ज़ल
आने वालों के लिए दरवाज़े रहते हैं खुले
जाने वाले भी कभी मुड़ कर सू-ए-दर देखते