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ग़ज़ल
जो नफ़स था ख़ार-ए-गुलू बना जो उठे थे हाथ लहू हुए
वो नशात-ए-आह-ए-सहर गई वो वक़ार-ए-दस्त-ए-दुआ गया
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
ग़ज़ल
तिरे घर में 'कैफ़' तेरा कोई क़द्र-दाँ नहीं है
जो वतन से दूर होता तो बड़ा वक़ार होता
कैफ़ अहमद सिद्दीकी
ग़ज़ल
हुई जंग-ओ-हर्ब की इब्तिदा तो बताओ बस यही इक पता
कोई तुम में नंग-ए-वक़ार था तुम्हें याद हो कि न याद हो
अर्श मलसियानी
ग़ज़ल
सवाल था इस तरफ़ अना का वक़ार का मसअला उधर था
न दर पे ख़ाना-ख़राब पहुँचे न घर से आली-जनाब निकले