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ग़ज़ल
दिलों में दुश्मनों के इस तरह डर बोल उठते हैं
गवाही को छुपाते हैं तो मंज़र बोल उठते हैं
हैदर क़ुरैशी
ग़ज़ल
राज़ क्या है मय-कशी में क्या है पैमाने की बात
तुझ को क्या मालूम ज़ाहिद क्या है मयख़ाने की बात
ज़हीर-उल-हसन तिश्ना
ग़ज़ल
मैं कैसी साअ'त-ए-बद-बख़्त में मुक़य्यद हूँ
दुआ ख़ुशी की है ज़ाहिर असर मलाल का है