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ग़ज़ल
ज़ीस्त करने को बहुत चश्म-ए-फुसूँ-कार मुझे
वो मिरे इश्क़ के ज़रताब से कम वाक़िफ़ है
नादिया अंबर लोधी
ग़ज़ल
मोमिन ख़ाँ मोमिन
ग़ज़ल
कोई हाथ भी न मिलाएगा जो गले मिलोगे तपाक से
ये नए मिज़ाज का शहर है ज़रा फ़ासले से मिला करो