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ग़ज़ल
अब न है फ़िक्र-ए-हिफ़ाज़त और न ज़ीक़-ए-रफ़-ए-कार
देने वाले ने दिया और मेरी ख़्वाहिश भर दिया
आरज़ू लखनवी
ग़ज़ल
आ गया दम ज़ीक़ में लेकिन न ये साबित हुआ
कौन है ईसा मिरा मैं किस के बीमारों में हूँ
आग़ा हज्जू शरफ़
ग़ज़ल
यारो कुछ तो ज़िक्र करो तुम उस की क़यामत बाँहों का
वो जो सिमटते होंगे उन में वो तो मर जाते होंगे
जौन एलिया
ग़ज़ल
मोमिन ख़ाँ मोमिन
ग़ज़ल
आ गया गर वस्ल की शब भी कहीं ज़िक्र-ए-फ़िराक़
वो तिरा रो रो के मुझ को भी रुलाना याद है