aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair
jis ke hote hue hote the zamāne mere
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तेरे का'बे को जबीनों से बसाया हम नेतेरे क़ुरआन को सीनों से लगाया हम ने
जिस पे पहले भी कई अहद-ए-वफ़ा टूटे हैंइसी दो-राहे पे चुप-चाप खड़ा रह जाऊँ
मेरे काबे को जबीनों से बसाया किस नेमेरे क़ुरआन को सीनों से लगाया किस ने
मुमकिन है कोई वहम था, मुमकिन है सुना होगलियों में किसी चाप का इक आख़िरी फेरा
क़ुरआन न हो जिस में वो मंदिर नहीं तेरागीता न हो जिस में वो हरम तेरा नहीं है
पढ़ते हैं आदमी ही क़ुरआन और नमाज़ियाँऔर आदमी ही उन की चुराते हैं जूतियाँ
अपने हाथों को पढ़ा करता हूँकभी क़ुरआँ कभी गीता की तरह
ज़मीं क्या आसमाँ भी तेरी कज-बीनी पे रोता हैग़ज़ब है सत्र-ए-क़ुरआन को चलेपा कर दिया तू ने
एक क़ुरआन-ए-सुख़न का सफ़हा खुलता हैअसदुल्लाह-ख़ाँ-'ग़ालिब' का पता मिलता है
तो उन को होगा अब चुप-चाप बहनाकिसी का हुक्म है
ख़ुदा ने क़ुरआन में कहा हैकि लोगो मैं ने
रात की सतह पर उभरे तिरे चेहरे के नुक़ूशवही चुप-चाप सी आँखें वही सादा सी नज़र
हर एक दर्द वो चुप-चाप ख़ुद पे सहता हैतमाम उम्र वो अपनों से कट के रहता है
तू आग में ऐ औरत ज़िंदा भी जली बरसोंसाँचे में हर इक ग़म के चुप-चाप ढली बरसों
वो चुप-चाप थे आगे पीछे रवाँख़ुदा जाने जाना था उन को कहाँ
रही है इस के लिए दाख़ली कशिश मुझ मेंरहा हूँ देखता चुप-चाप देर तक उस को
इंसान की इस ज़िल्लत से परे शैतान की ज़िल्लत क्या होगीये वेद हटा क़ुरआन उठा
रात चुप-चाप दबे पाँव चले जाती हैरात ख़ामोश है रोती नहीं हँसती भी नहीं
खप गए कितने बन के झाड़ों मेंमर गए सैकड़ों पहाड़ों में
मेज़ चुप-चाप घड़ी बंद किताबें ख़ामोशअपने कमरे की उदासी पे तरस आता है
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