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नज़्म
ख़ुदा-ए-इज़्ज़-ओ-जल की नेमतों का मो'तरिफ़ हूँ मैं
मुझे इक़रार है उस ने ज़मीं को ऐसे फैलाया
अख़्तरुल ईमान
नज़्म
कोई जबीं न तिरे संग-ए-आस्ताँ पे झुके
कि जिंस-ए-इज्ज़-ओ-अक़ीदत से तुझ को शाद करे
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
नज़्म
तेरे जबीं से नूर-ए-हुस्न-ए-अज़ल अयाँ है
अल्लाह-रे ज़ेब-ओ-ज़ीनत क्या औज-ए-इज़्ज़-ओ-शाँ है
चकबस्त बृज नारायण
नज़्म
यही क़ौमों को पहुँचाता है बाम-ए-औज-ओ-रिफ़अत पर
यही मुल्कों के अंदर फूँकता है रूह-ए-बेदारी
अहमक़ फफूँदवी
नज़्म
नाम को बाक़ी नहीं इस्लाम का इज़्ज़-ओ-वक़ार
तेरी आँखों से मगर जाता नहीं अब तक ख़ुमार
शहज़ादी कुलसूम
नज़्म
आशिक़ाँ कहते हैं माशूक़ों से बा-इज्ज़-ओ-नियाज़
है अगर मंज़ूर कुछ लेना तो हाज़िर हैं रूपे
नज़ीर अकबराबादी
नज़्म
मद्ह-ख़्वाँ उस का तू हो 'बर्क़' ब-सद इज्ज़-ओ-नियाज़
ख़ाकसारों के मदद-गार गुरु-नानक थे
श्याम सुंदर लाल बर्क़
नज़्म
पाक दामन पे नहीं उस के ज़रा गर्द-ओ-ग़ुबार
चोर-बाज़ार में फिरती है ब-सद-इज़्ज़-ओ-वक़ार
सय्यद मोहम्मद जाफ़री
नज़्म
तेरी जबीं से नूर-ए-हुस्न-ए-अज़ल 'अयाँ है
अल्लह रे ज़ेब-ओ-ज़ीनत क्या औज-ए-‘इज़्ज़-ओ-शाँ है
चकबस्त बृज नारायण
नज़्म
ये अमीन-ए-दोस्ताँ था दुश्मनों से बे-नियाज़
अज़म-ओ-इस्तिक़लाल का ले कर निशाँ बढ़ता गया