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नज़्म
नज़र को ख़ीरा करती है चमक तहज़ीब-ए-हाज़िर की
ये सन्नाई मगर झूटे निगूँ की रेज़ा-कारी है
अल्लामा इक़बाल
नज़्म
तेरी 'उम्र-ए-रफ़्ता की इक आन है अहद-ए-कुहन
वादियों में हैं तिरी काली घटाएँ ख़ेमा-ज़न
अल्लामा इक़बाल
नज़्म
हलाकतों के ग़ुबार से ज़िंदगी के मैदाँ पटे हुए हैं
धुआँ हर इक ख़ेमा-ए-सदा से निकल रहा है
मुज़फ़्फ़र वारसी
नज़्म
मैं जानता था मिरे क़बीले की ख़ेमा-गाहें जलाई जाएँगी और तमाशाई
रक़्स-ए-शोला-फ़िशाँ पर इसरार ही करेंगे
इफ़्तिख़ार आरिफ़
नज़्म
बक़ा के रस्ते में ख़ेमा-ज़न हैं, ख़ता के लश्कर, फ़ना के लश्कर
चलो मुसाफ़िर फ़ना के घर से