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नज़्म
ऐ ग़ाफ़िल तुझ से भी चढ़ता इक और बड़ा ब्योपारी है
क्या शक्कर मिस्री क़ंद गरी क्या सांभर मीठा खारी है
नज़ीर अकबराबादी
नज़्म
हर गाली, मिस्री, क़ंद-भरी, हर एक क़दम अटखेली का
दिल शाद किया और मोह लिया ये, जौबन पाया होली ने
नज़ीर अकबराबादी
नज़्म
जो मिस्री और के मुँह में दे फिर वो भी शक्कर खाता है
जो और तईं अब टक्कर दे फिर वो भी टक्कर खाता है
नज़ीर अकबराबादी
नज़्म
दूध के सागर में हों कूज़े की मिस्री के जहाज़
जिस में हों जासूस सीने में लिए टॉफ़ी के राज़
राजा मेहदी अली ख़ाँ
नज़्म
चाँदी जैसे बालों वाली कितनी अच्छी दादी अम्माँ
बातें उन की मिस्री जैसी क़ौल की पक्की दादी अमाँ
हैदर बयाबानी
नज़्म
जो भंग पिलाई थी तू ने उस भंग का नश्शा खुल न सका
कुछ मिस्री और बादाम कि साक़ी रात गुज़रने वाली है
ज़रीफ़ जबलपूरी
नज़्म
मुझ से पहली सी मोहब्बत मिरी महबूब न माँग
मैं ने समझा था कि तू है तो दरख़्शाँ है हयात
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
नज़्म
न तुम मेरी तरफ़ देखो ग़लत-अंदाज़ नज़रों से
न मेरे दिल की धड़कन लड़खड़ाए मेरी बातों से