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नज़्म
धार पर जिस की चमन-परवर शगूफ़ों का निज़ाम
शाम-ए-ज़ेर-ए-अर्ज़ को सुब्ह-ए-दरख़्शाँ का पयाम
जोश मलीहाबादी
नज़्म
अली सरदार जाफ़री
नज़्म
कुछ बिल्कुल मिट्टी के माधो कुछ ख़ंजर की धार मिले
कुछ मंजधार में कुछ साहिल पर कुछ दरिया के पार मिले
अख़्तरुल ईमान
नज़्म
नट बंजारन सन्यासी और खेल-तमाशे वाले लोग
खंडर वीराना जलती धूप फूली सरसों धान के खेत
अबु बक्र अब्बाद
नज़्म
कौन पोंछेगा मिरे बहते हुए अश्कों की धार
कौन पानी पढ़ के देगा होगा जब मुझ को बुख़ार
शहनाज़ परवीन शाज़ी
नज़्म
अभी दिमाग़ पे क़हबा-ए-सीम-ओ-ज़र है सवार
अभी रुकी ही नहीं तेशा-ज़न के ख़ून की धार
मख़दूम मुहिउद्दीन
नज़्म
इक ऐसी धार की तलवार है जिस पर गुज़रना है
मुझे और ज़िंदगी के ज़ख़्म को टाँके लगाना हैं
वसीम बरेलवी
नज़्म
जब लगाया हक़ का नारा दार पर खींचा गया
नख़्ल-ए-सनअ'त इस के ख़ूँ की धार पर सींचा गया
सय्यद मोहम्मद जाफ़री
नज़्म
दरिया थिरक रहा है तो बन दे रहा है ताल
मैं अफ़्रीक़ा हूँ धार लिया मैं ने तेरा रूप