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नज़्म
ख़ुदा-ए-इज़्ज़-ओ-जल की नेमतों का मो'तरिफ़ हूँ मैं
मुझे इक़रार है उस ने ज़मीं को ऐसे फैलाया
अख़्तरुल ईमान
नज़्म
तेरे जबीं से नूर-ए-हुस्न-ए-अज़ल अयाँ है
अल्लाह-रे ज़ेब-ओ-ज़ीनत क्या औज-ए-इज़्ज़-ओ-शाँ है
चकबस्त बृज नारायण
नज़्म
नाम को बाक़ी नहीं इस्लाम का इज़्ज़-ओ-वक़ार
तेरी आँखों से मगर जाता नहीं अब तक ख़ुमार
शहज़ादी कुलसूम
नज़्म
पाक दामन पे नहीं उस के ज़रा गर्द-ओ-ग़ुबार
चोर-बाज़ार में फिरती है ब-सद-इज़्ज़-ओ-वक़ार
सय्यद मोहम्मद जाफ़री
नज़्म
तेरी जबीं से नूर-ए-हुस्न-ए-अज़ल 'अयाँ है
अल्लह रे ज़ेब-ओ-ज़ीनत क्या औज-ए-‘इज़्ज़-ओ-शाँ है
चकबस्त बृज नारायण
नज़्म
इक तल्ख़ी से वो कहता है
हम से असफ़ल बे-तौक़ीरों को इज़्ज़-ओ-तकरीम से क्या है
मोहम्मद ओवैस मालिक
नज़्म
ये अमीन-ए-दोस्ताँ था दुश्मनों से बे-नियाज़
अज़म-ओ-इस्तिक़लाल का ले कर निशाँ बढ़ता गया
प्रेम लाल शिफ़ा देहलवी
नज़्म
यहीं पे शैख़-ए-अदब अपनी राह भूलते हैं
यहीं तो शैख़-ए-अदब 'इज़्ज़-ओ-जाह भूलते हैं
शारिब मौरान्वी
नज़्म
पामाल-ए-फ़क़्र-ओ-ज़िल्लत हैं इज़्ज़-ओ-शान वाले
सैद-ए-ग़म-ओ-अलम हैं तीर-ओ-कमान वाले
अहमक़ फफूँदवी
नज़्म
जुनून-ए-शौक़ के दम से है इज़्ज़-ओ-शान-ए-हयात
यही है रूह-ए-मोहब्बत यही है जान-ए-हयात
मंशाउर्रहमान ख़ाँ मंशा
नज़्म
पसंद आया जो टूटे दिलों का इज़्ज़-ओ-नियाज़
तो बस गया है ख़ुदा भी गुनहगारों में