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नज़्म
आशोब-ए-जहाँ की देवी से यूँ आँख चुराऊँगा कब तक
जिस फ़र्ज़ को पूरा करना है वो फ़र्ज़ भुलाऊँगा कब तक
आमिर उस्मानी
नज़्म
बंदर को सेहरा बाँध के हम दूल्हा न बनाएँगे अम्मी
अब घूँघट काढ़ बंदरिया को डोली में बिठाना छोड़ दिया