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नज़्म
तुम कस जगह के पंच हो क्या है बिरादरी
क्यूँ ढूँडते हो मुल्क में जो वोट हो फ़्री
सय्यद मोहम्मद जाफ़री
नज़्म
आ कि वाबस्ता हैं उस हुस्न की यादें तुझ से
जिस ने इस दिल को परी-ख़ाना बना रक्खा था
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
नज़्म
जिस की पीरी में है मानिंद-ए-सहर रंग-ए-शबाब
कह रहा है मुझ से ऐ जूया-ए-असरार-ए-अज़ल