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नज़्म
वक़्त-ए-सहर, ख़ामोश धुँदलका एक सितारा काँप रहा है
जैसे कोई बोसीदा कश्ती तूफ़ानों में डोल रही हो
रिफ़अत सरोश
नज़्म
कहीं गर दो मुकम्मल लफ़्ज़ इकट्ठे हो गए हों तो ये क़ुर्बत ग़ैर-फ़ितरी है
ज़रूरी है मुनासिब फ़ासला देना
साइमा इसमा
नज़्म
नील-गगन के सागर में ये चाँद की कश्ती डोल रही है
जैसे एक सुनहरी तितली उड़ने को पर तौल रही है