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नज़्म
तुम्हारी तहज़ीब अपने ख़ंजर से आप ही ख़ुद-कुशी करेगी
जो शाख़-ए-नाज़ुक पे आशियाना बनेगा ना-पाएदार होगा
अल्लामा इक़बाल
नज़्म
माह ओ अख़्तर हैं ख़जिल जिस से वो चिंगारी ज़रूर
इक न इक दिन आलम-ए-ज़ुल्मात में खो जाएगी
जगन्नाथ आज़ाद
नज़्म
सरिश्क-ए-याद ना-मुम्किन सही दुनिया की आँखों में
ज़बान-ए-हाल पर इक आलम-ए-तक़दीर बाक़ी है
राम प्रकाश राही
नज़्म
दिल के हर ज़र्रा में है इक आलम-ए-नौ जल्वा-गर
आँख वालो इस जहाँ का भी तमाशा क्यों न हो
ज़फ़र अहमद सिद्दीक़ी
नज़्म
अलम-ओ-रंज का दुख-दर्द का एहसास न हो
और तअ'स्सुब की किसी क़ौम में बू-बास न हो