aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair
jis ke hote hue hote the zamāne mere
परिणाम "aam"
भले दिनों की बात हैभली सी एक शक्ल थी
दिल से जो बात निकलती है असर रखती हैपर नहीं ताक़त-ए-परवाज़ मगर रखती है
चश्म-ए-नम जान-ए-शोरीदा काफ़ी नहींतोहमत-ए-इश्क़-ए-पोशीदा काफ़ी नहीं
ख़ून अपना हो या पराया होनस्ल-ए-आदम का ख़ून है आख़िर
सोचों में भँवर पड़ जाते थेजब एक तलातुम रहता था
सिलसिला-ए-रोज़-ओ-शब नक़्श-गर-ए-हादसातसिलसिला-ए-रोज़-ओ-शब अस्ल-ए-हयात-ओ-ममात
शा'इरसाहिल-ए-दरिया पे मैं इक रात था महव-ए-नज़र
अब मिरे दूसरे बाज़ू पे वो शमशीर है जोइस से पहले भी मिरा निस्फ़ बदन काट चुकी
ज़र्रा ज़र्रा दहर का ज़िंदानी-ए-तक़दीर हैपर्दा-ए-मजबूरी ओ बेचारगी तदबीर है
ज़माना आया है बे-हिजाबी का आम दीदार-ए-यार होगासुकूत था पर्दा-दार जिस का वो राज़ अब आश्कार होगा
फ़रिश्ते पढ़ते हैं जिस को वो नाम है तेराबड़ी जनाब तिरी फ़ैज़ आम है तेरा
ओ देस से आने वाला है बताओ देस से आने वाले बता
नामा न कोई यार का पैग़ाम भेजिएइस फ़स्ल में जो भेजिए बस आम भेजिए
लोग क्यों रात को उठ के रोते हैं सोते नहींतू ने अब तक कोई शब अगर जागते भी गुज़ारी
और दिलों के मरसिएइक दूसरे के नाम कर देते
हम-चू सब्ज़ा बार-हा रोईदा-एम(रूमी)
ज़िल्लत के जीने से मरना बेहतर हैमिट जाओ या क़स्र-ए-सितम पामाल करो
दयार-ए-हिन्द था गहवारा याद है हमदमबहुत ज़माना हुआ किस के किस के बचपन का
ऐ सिपहर-ए-बरीं के सय्यारोऐ फ़ज़ा-ए-ज़मीं के गुल-ज़ारो
वो एक तर्ज़-ए-सुख़न की ख़ुश्बूवो एक महका हुआ तकल्लुम
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