aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair
jis ke hote hue hote the zamāne mere
परिणाम "aamaada"
दिल से जो बात निकलती है असर रखती हैपर नहीं ताक़त-ए-परवाज़ मगर रखती हैक़ुदसी-उल-अस्ल है रिफ़अत पे नज़र रखती हैख़ाक से उठती है गर्दूं पे गुज़र रखती हैइश्क़ था फ़ित्नागर ओ सरकश ओ चालाक मिराआसमाँ चीर गया नाला-ए-बेबाक मिरापीर-ए-गर्दूं ने कहा सुन के कहीं है कोईबोले सय्यारे सर-ए-अर्श-ए-बरीं है कोईचाँद कहता था नहीं अहल-ए-ज़मीं है कोईकहकशाँ कहती थी पोशीदा यहीं है कोईकुछ जो समझा मिरे शिकवे को तो रिज़वाँ समझामुझ को जन्नत से निकाला हुआ इंसाँ समझाथी फ़रिश्तों को भी हैरत कि ये आवाज़ है क्याअर्श वालों पे भी खुलता नहीं ये राज़ है क्याता-सर-ए-अर्श भी इंसाँ की तग-ओ-ताज़ है क्याआ गई ख़ाक की चुटकी को भी परवाज़ है क्याग़ाफ़िल आदाब से सुक्कान-ए-ज़मीं कैसे हैंशोख़ ओ गुस्ताख़ ये पस्ती के मकीं कैसे हैंइस क़दर शोख़ कि अल्लाह से भी बरहम हैथा जो मस्जूद-ए-मलाइक ये वही आदम हैआलिम-ए-कैफ़ है दाना-ए-रुमूज़-ए-कम हैहाँ मगर इज्ज़ के असरार से ना-महरम हैनाज़ है ताक़त-ए-गुफ़्तार पे इंसानों कोबात करने का सलीक़ा नहीं नादानों कोआई आवाज़ ग़म-अंगेज़ है अफ़्साना तिराअश्क-ए-बेताब से लबरेज़ है पैमाना तिराआसमाँ-गीर हुआ नारा-ए-मस्ताना तिराकिस क़दर शोख़-ज़बाँ है दिल-ए-दीवाना तिराशुक्र शिकवे को किया हुस्न-ए-अदा से तू नेहम-सुख़न कर दिया बंदों को ख़ुदा से तू नेहम तो माइल-ब-करम हैं कोई साइल ही नहींराह दिखलाएँ किसे रह-रव-ए-मंज़िल ही नहींतर्बियत आम तो है जौहर-ए-क़ाबिल ही नहींजिस से तामीर हो आदम की ये वो गिल ही नहींकोई क़ाबिल हो तो हम शान-ए-कई देते हैंढूँडने वालों को दुनिया भी नई देते हैंहाथ बे-ज़ोर हैं इल्हाद से दिल ख़ूगर हैंउम्मती बाइस-ए-रुस्वाई-ए-पैग़म्बर हैंबुत-शिकन उठ गए बाक़ी जो रहे बुत-गर हैंथा ब्राहीम पिदर और पिसर आज़र हैंबादा-आशाम नए बादा नया ख़ुम भी नएहरम-ए-काबा नया बुत भी नए तुम भी नएवो भी दिन थे कि यही माया-ए-रानाई थानाज़िश-ए-मौसम-ए-गुल लाला-ए-सहराई थाजो मुसलमान था अल्लाह का सौदाई थाकभी महबूब तुम्हारा यही हरजाई थाकिसी यकजाई से अब अहद-ए-ग़ुलामी कर लोमिल्लत-ए-अहमद-ए-मुर्सिल को मक़ामी कर लोकिस क़दर तुम पे गिराँ सुब्ह की बेदारी हैहम से कब प्यार है हाँ नींद तुम्हें प्यारी हैतब-ए-आज़ाद पे क़ैद-ए-रमज़ाँ भारी हैतुम्हीं कह दो यही आईन-ए-वफ़ादारी हैक़ौम मज़हब से है मज़हब जो नहीं तुम भी नहींजज़्ब-ए-बाहम जो नहीं महफ़िल-ए-अंजुम भी नहींजिन को आता नहीं दुनिया में कोई फ़न तुम होनहीं जिस क़ौम को परवा-ए-नशेमन तुम होबिजलियाँ जिस में हों आसूदा वो ख़िर्मन तुम होबेच खाते हैं जो अस्लाफ़ के मदफ़न तुम होहो निको नाम जो क़ब्रों की तिजारत कर केक्या न बेचोगे जो मिल जाएँ सनम पत्थर केसफ़्हा-ए-दहर से बातिल को मिटाया किस नेनौ-ए-इंसाँ को ग़ुलामी से छुड़ाया किस नेमेरे काबे को जबीनों से बसाया किस नेमेरे क़ुरआन को सीनों से लगाया किस नेथे तो आबा वो तुम्हारे ही मगर तुम क्या होहाथ पर हाथ धरे मुंतज़िर-ए-फ़र्दा होक्या कहा बहर-ए-मुसलमाँ है फ़क़त वादा-ए-हूरशिकवा बेजा भी करे कोई तो लाज़िम है शुऊरअदल है फ़ातिर-ए-हस्ती का अज़ल से दस्तूरमुस्लिम आईं हुआ काफ़िर तो मिले हूर ओ क़ुसूरतुम में हूरों का कोई चाहने वाला ही नहींजल्वा-ए-तूर तो मौजूद है मूसा ही नहींमंफ़अत एक है इस क़ौम का नुक़सान भी एकएक ही सब का नबी दीन भी ईमान भी एकहरम-ए-पाक भी अल्लाह भी क़ुरआन भी एककुछ बड़ी बात थी होते जो मुसलमान भी एकफ़िरक़ा-बंदी है कहीं और कहीं ज़ातें हैंक्या ज़माने में पनपने की यही बातें हैंकौन है तारिक-ए-आईन-ए-रसूल-ए-मुख़्तारमस्लहत वक़्त की है किस के अमल का मेआरकिस की आँखों में समाया है शिआर-ए-अग़्यारहो गई किस की निगह तर्ज़-ए-सलफ़ से बे-ज़ारक़ल्ब में सोज़ नहीं रूह में एहसास नहींकुछ भी पैग़ाम-ए-मोहम्मद का तुम्हें पास नहींजा के होते हैं मसाजिद में सफ़-आरा तो ग़रीबज़हमत-ए-रोज़ा जो करते हैं गवारा तो ग़रीबनाम लेता है अगर कोई हमारा तो ग़रीबपर्दा रखता है अगर कोई तुम्हारा तो ग़रीबउमरा नश्शा-ए-दौलत में हैं ग़ाफ़िल हम सेज़िंदा है मिल्लत-ए-बैज़ा ग़ुरबा के दम सेवाइज़-ए-क़ौम की वो पुख़्ता-ख़याली न रहीबर्क़-ए-तबई न रही शोला-मक़ाली न रहीरह गई रस्म-ए-अज़ाँ रूह-ए-बिलाली न रहीफ़ल्सफ़ा रह गया तल्क़ीन-ए-ग़ज़ाली न रहीमस्जिदें मर्सियाँ-ख़्वाँ हैं कि नमाज़ी न रहेयानी वो साहिब-ए-औसाफ़-ए-हिजाज़ी न रहेशोर है हो गए दुनिया से मुसलमाँ नाबूदहम ये कहते हैं कि थे भी कहीं मुस्लिम मौजूदवज़्अ में तुम हो नसारा तो तमद्दुन में हुनूदये मुसलमाँ हैं जिन्हें देख के शरमाएँ यहूदयूँ तो सय्यद भी हो मिर्ज़ा भी हो अफ़्ग़ान भी होतुम सभी कुछ हो बताओ तो मुसलमान भी होदम-ए-तक़रीर थी मुस्लिम की सदाक़त बेबाकअदल उस का था क़वी लौस-ए-मराआत से पाकशजर-ए-फ़ितरत-ए-मुस्लिम था हया से नमनाकथा शुजाअत में वो इक हस्ती-ए-फ़ोक़-उल-इदराकख़ुद-गुदाज़ी नम-ए-कैफ़ियत-ए-सहबा-यश बूदख़ाली-अज़-ख़ेश शुदन सूरत-ए-मीना-यश बूदहर मुसलमाँ रग-ए-बातिल के लिए नश्तर थाउस के आईना-ए-हस्ती में अमल जौहर थाजो भरोसा था उसे क़ुव्वत-ए-बाज़ू पर थाहै तुम्हें मौत का डर उस को ख़ुदा का डर थाबाप का इल्म न बेटे को अगर अज़बर होफिर पिसर क़ाबिल-ए-मीरास-ए-पिदर क्यूँकर होहर कोई मस्त-ए-मय-ए-ज़ौक़-ए-तन-आसानी हैतुम मुसलमाँ हो ये अंदाज़-ए-मुसलमानी हैहैदरी फ़क़्र है ने दौलत-ए-उस्मानी हैतुम को अस्लाफ़ से क्या निस्बत-ए-रूहानी हैवो ज़माने में मुअज़्ज़िज़ थे मुसलमाँ हो करऔर तुम ख़्वार हुए तारिक-ए-क़ुरआँ हो करतुम हो आपस में ग़ज़बनाक वो आपस में रहीमतुम ख़ता-कार ओ ख़ता-बीं वो ख़ता-पोश ओ करीमचाहते सब हैं कि हों औज-ए-सुरय्या पे मुक़ीमपहले वैसा कोई पैदा तो करे क़ल्ब-ए-सलीमतख़्त-ए-फ़ग़्फ़ूर भी उन का था सरीर-ए-कए भीयूँ ही बातें हैं कि तुम में वो हमियत है भीख़ुद-कुशी शेवा तुम्हारा वो ग़यूर ओ ख़ुद्दारतुम उख़ुव्वत से गुरेज़ाँ वो उख़ुव्वत पे निसारतुम हो गुफ़्तार सरापा वो सरापा किरदारतुम तरसते हो कली को वो गुलिस्ताँ ब-कनारअब तलक याद है क़ौमों को हिकायत उन कीनक़्श है सफ़्हा-ए-हस्ती पे सदाक़त उन कीमिस्ल-ए-अंजुम उफ़ुक़-ए-क़ौम पे रौशन भी हुएबुत-ए-हिन्दी की मोहब्बत में बिरहमन भी हुएशौक़-ए-परवाज़ में महजूर-ए-नशेमन भी हुएबे-अमल थे ही जवाँ दीन से बद-ज़न भी हुएइन को तहज़ीब ने हर बंद से आज़ाद कियाला के काबे से सनम-ख़ाने में आबाद कियाक़ैस ज़हमत-कश-ए-तन्हाई-ए-सहरा न रहेशहर की खाए हवा बादिया-पैमा न रहेवो तो दीवाना है बस्ती में रहे या न रहेये ज़रूरी है हिजाब-ए-रुख़-ए-लैला न रहेगिला-ए-ज़ौर न हो शिकवा-ए-बेदाद न होइश्क़ आज़ाद है क्यूँ हुस्न भी आज़ाद न होअहद-ए-नौ बर्क़ है आतिश-ज़न-ए-हर-ख़िर्मन हैऐमन इस से कोई सहरा न कोई गुलशन हैइस नई आग का अक़्वाम-ए-कुहन ईंधन हैमिल्लत-ए-ख़त्म-ए-रसूल शोला-ब-पैराहन हैआज भी हो जो ब्राहीम का ईमाँ पैदाआग कर सकती है अंदाज़-ए-गुलिस्ताँ पैदादेख कर रंग-ए-चमन हो न परेशाँ मालीकौकब-ए-ग़ुंचा से शाख़ें हैं चमकने वालीख़स ओ ख़ाशाक से होता है गुलिस्ताँ ख़ालीगुल-बर-अंदाज़ है ख़ून-ए-शोहदा की लालीरंग गर्दूं का ज़रा देख तो उन्नाबी हैये निकलते हुए सूरज की उफ़ुक़-ताबी हैउम्मतें गुलशन-ए-हस्ती में समर-चीदा भी हैंऔर महरूम-ए-समर भी हैं ख़िज़ाँ-दीदा भी हैंसैकड़ों नख़्ल हैं काहीदा भी बालीदा भी हैंसैकड़ों बत्न-ए-चमन में अभी पोशीदा भी हैंनख़्ल-ए-इस्लाम नमूना है बिरौ-मंदी काफल है ये सैकड़ों सदियों की चमन-बंदी कापाक है गर्द-ए-वतन से सर-ए-दामाँ तेरातू वो यूसुफ़ है कि हर मिस्र है कनआँ तेराक़ाफ़िला हो न सकेगा कभी वीराँ तेराग़ैर यक-बाँग-ए-दारा कुछ नहीं सामाँ तेरानख़्ल-ए-शमा अस्ती ओ दर शोला दो-रेशा-ए-तूआक़िबत-सोज़ बवद साया-ए-अँदेशा-ए-तूतू न मिट जाएगा ईरान के मिट जाने सेनश्शा-ए-मय को तअल्लुक़ नहीं पैमाने सेहै अयाँ यूरिश-ए-तातार के अफ़्साने सेपासबाँ मिल गए काबे को सनम-ख़ाने सेकश्ती-ए-हक़ का ज़माने में सहारा तू हैअस्र-ए-नौ-रात है धुँदला सा सितारा तू हैहै जो हंगामा बपा यूरिश-ए-बुलग़ारी काग़ाफ़िलों के लिए पैग़ाम है बेदारी कातू समझता है ये सामाँ है दिल-आज़ारी काइम्तिहाँ है तिरे ईसार का ख़ुद्दारी काक्यूँ हिरासाँ है सहिल-ए-फ़रस-ए-आदा सेनूर-ए-हक़ बुझ न सकेगा नफ़स-ए-आदा सेचश्म-ए-अक़्वाम से मख़्फ़ी है हक़ीक़त तेरीहै अभी महफ़िल-ए-हस्ती को ज़रूरत तेरीज़िंदा रखती है ज़माने को हरारत तेरीकौकब-ए-क़िस्मत-ए-इम्काँ है ख़िलाफ़त तेरीवक़्त-ए-फ़ुर्सत है कहाँ काम अभी बाक़ी हैनूर-ए-तौहीद का इत्माम अभी बाक़ी हैमिस्ल-ए-बू क़ैद है ग़ुंचे में परेशाँ हो जारख़्त-बर-दोश हवा-ए-चमनिस्ताँ हो जाहै तुनक-माया तू ज़र्रे से बयाबाँ हो जानग़्मा-ए-मौज है हंगामा-ए-तूफ़ाँ हो जाक़ुव्वत-ए-इश्क़ से हर पस्त को बाला कर देदहर में इस्म-ए-मोहम्मद से उजाला कर देहो न ये फूल तो बुलबुल का तरन्नुम भी न होचमन-ए-दह्र में कलियों का तबस्सुम भी न होये न साक़ी हो तो फिर मय भी न हो ख़ुम भी न होबज़्म-ए-तौहीद भी दुनिया में न हो तुम भी न होख़ेमा-ए-अफ़्लाक का इस्तादा इसी नाम से हैनब्ज़-ए-हस्ती तपिश-आमादा इसी नाम से हैदश्त में दामन-ए-कोहसार में मैदान में हैबहर में मौज की आग़ोश में तूफ़ान में हैचीन के शहर मराक़श के बयाबान में हैऔर पोशीदा मुसलमान के ईमान में हैचश्म-ए-अक़्वाम ये नज़्ज़ारा अबद तक देखेरिफ़अत-ए-शान-ए-रफ़ाना-लका-ज़िक्र देखेमर्दुम-ए-चश्म-ए-ज़मीं यानी वो काली दुनियावो तुम्हारे शोहदा पालने वाली दुनियागर्मी-ए-मेहर की परवरदा हिलाली दुनियाइश्क़ वाले जिसे कहते हैं बिलाली दुनियातपिश-अंदोज़ है इस नाम से पारे की तरहग़ोता-ज़न नूर में है आँख के तारे की तरहअक़्ल है तेरी सिपर इश्क़ है शमशीर तिरीमिरे दरवेश ख़िलाफ़त है जहाँगीर तिरीमा-सिवा-अल्लाह के लिए आग है तकबीर तिरीतू मुसलमाँ हो तो तक़दीर है तदबीर तिरीकी मोहम्मद से वफ़ा तू ने तो हम तेरे हैंये जहाँ चीज़ है क्या लौह-ओ-क़लम तेरे हैं
इबलीसये अनासिर का पुराना खेल ये दुनिया-ए-दूँसाकिनान-ए-अर्श-ए-आज़म की तमन्नाओं का ख़ूँइस की बर्बादी पे आज आमादा है वो कारसाज़जिस ने इस का नाम रखा था जहान-ए-काफ़-अो-नूँमैं ने दिखलाया फ़रंगी को मुलूकियत का ख़्वाबमैं ने तोड़ा मस्जिद-ओ-दैर-ओ-कलीसा का फ़ुसूँमैं ने नादारों को सिखलाया सबक़ तक़दीर कामैं ने मुनइ'म को दिया सरमाया दारी का जुनूँकौन कर सकता है इस की आतिश-ए-सोज़ाँ को सर्दजिस के हंगामों में हो इबलीस का सोज़-ए-दरूँजिस की शाख़ें हों हमारी आबियारी से बुलंदकौन कर सकता है इस नख़्ल-ए-कुहन को सर-निगूँपहला मुशीरइस में क्या शक है कि मोहकम है ये इबलीसी निज़ामपुख़्ता-तर इस से हुए ख़ू-ए-ग़ुलामी में अवामहै अज़ल से इन ग़रीबों के मुक़द्दर में सुजूदइन की फ़ितरत का तक़ाज़ा है नमाज़-ए-बे-क़यामआरज़ू अव्वल तो पैदा हो नहीं सकती कहींहो कहीं पैदा तो मर जाती है या रहती है ख़ामये हमारी सई-ए-पैहम की करामत है कि आजसूफ़ी-ओ-मुल्ला मुलूकिय्यत के बंदे हैं तमामतब-ए-मशरिक़ के लिए मौज़ूँ यही अफ़यून थीवर्ना क़व्वाली से कुछ कम-तर नहीं इल्म-ए-कलामहै तवाफ़-ओ-हज का हंगामा अगर बाक़ी तो क्याकुंद हो कर रह गई मोमिन की तेग़-ए-बे-नियामकिस की नौ-मीदी पे हुज्जत है ये फ़रमान-ए-जदीदहै जिहाद इस दौर में मर्द-ए-मुसलमाँ पर हरामदूसरा मुशीरख़ैर है सुल्तानी-ए-जम्हूर का ग़ौग़ा कि शरतू जहाँ के ताज़ा फ़ित्नों से नहीं है बा-ख़बरपहला मुशीरहूँ मगर मेरी जहाँ-बीनी बताती है मुझेजो मुलूकियत का इक पर्दा हो क्या इस से ख़तरहम ने ख़ुद शाही को पहनाया है जमहूरी लिबासजब ज़रा आदम हुआ है ख़ुद-शनास-ओ-ख़ुद-निगरकारोबार-ए-शहरयारी की हक़ीक़त और हैये वजूद-ए-मीर-ओ-सुल्ताँ पर नहीं है मुनहसिरमज्लिस-ए-मिल्लत हो या परवेज़ का दरबार होहै वो सुल्ताँ ग़ैर की खेती पे हो जिस की नज़रतू ने क्या देखा नहीं मग़रिब का जमहूरी निज़ामचेहरा रौशन अंदरूँ चंगेज़ से तारीक-तरतीसरा मुशीररूह-ए-सुल्तानी रहे बाक़ी तो फिर क्या इज़्तिराबहै मगर क्या इस यहूदी की शरारत का जवाबवो कलीम-ए-बे-तजल्ली वो मसीह-ए-बे-सलीबनीस्त पैग़मबर व-लेकिन दर बग़ल दारद किताबक्या बताऊँ क्या है काफ़िर की निगाह-ए-पर्दा-सोज़मश्रिक-ओ-मग़रिब की क़ौमों के लिए रोज़-ए-हिसाबइस से बढ़ कर और क्या होगा तबीअ'त का फ़सादतोड़ दी बंदों ने आक़ाओं के ख़ेमों की तनाबचौथा मुशीरतोड़ इस का रुमत-उल-कुबरा के ऐवानों में देखआल-ए-सीज़र को दिखाया हम ने फिर सीज़र का ख़्वाबकौन बहर-ए-रुम की मौजों से है लिपटा हुआगाह बालद-चूँ-सनोबर गाह नालद-चूँ-रुबाबतीसरा मुशीरमैं तो इस की आक़िबत-बीनी का कुछ क़ाइल नहींजिस ने अफ़रंगी सियासत को क्या यूँ बे-हिजाबपाँचवाँ मुशीर इबलीस को मुख़ातब कर केऐ तिरे सोज़-ए-नफ़स से कार-ए-आलम उस्तुवारतू ने जब चाहा किया हर पर्दगी को आश्कारआब-ओ-गिल तेरी हरारत से जहान-ए-सोज़-अो-साज़़अब्लह-ए-जन्नत तिरी तालीम से दाना-ए-कारतुझ से बढ़ कर फ़ितरत-ए-आदम का वो महरम नहींसादा-दिल बंदों में जो मशहूर है पर्वरदिगारकाम था जिन का फ़क़त तक़्दीस-ओ-तस्बीह-ओ-तवाफ़तेरी ग़ैरत से अबद तक सर-निगूँ-ओ-शर्मसारगरचे हैं तेरे मुरीद अफ़रंग के साहिर तमामअब मुझे उन की फ़रासत पर नहीं है ए'तिबारवो यहूदी फ़ित्ना-गर वो रूह-ए-मज़दक का बुरूज़हर क़बा होने को है इस के जुनूँ से तार तारज़ाग़ दश्ती हो रहा है हम-सर-ए-शाहीन-अो-चर्ग़कितनी सुरअ'त से बदलता है मिज़ाज-ए-रोज़गारछा गई आशुफ़्ता हो कर वुसअ'त-ए-अफ़्लाक परजिस को नादानी से हम समझे थे इक मुश्त-ए-ग़ुबारफ़ितना-ए-फ़र्दा की हैबत का ये आलम है कि आजकाँपते हैं कोहसार-ओ-मुर्ग़-ज़ार-ओ-जूएबारमेरे आक़ा वो जहाँ ज़ेर-ओ-ज़बर होने को हैजिस जहाँ का है फ़क़त तेरी सियादत पर मदार
ये ज़मीं तब भी निगल लेने पे आमादा थीपाँव जब टूटती शाख़ों से उतारे हम नेउन मकानों को ख़बर है न मकीनों को ख़बरउन दिनों की जो गुफाओं में गुज़ारे हम ने
दुनिया के लिए तोहफ़ा-ए-नायाब है औरतअफ़्साना-ए-हस्ती का हसीं बाब है औरतदेखा था जो आदम ने वही ख़्वाब है औरतबे-मिस्ल है आईना-ए-आदाब है औरतक़ाएम उसी औरत से मोहब्बत की फ़ज़ा हैऔरत की अता असल में एहसान-ए-ख़ुदा हैहै माँ तो दिल-ओ-जाँ से लुटाती है सदा प्यारममता के लिए फिरती है दौलत सर-ए-बाज़ारआसान बनाती है दुआ से रह-ए-दुश्वारअपने ग़म-ओ-आलाम का करती नहीं इज़हारक़दमों में लिए रहती है जन्नत का ख़ज़ानाऔरत के तसव्वुर में है ता'मीर-ए-ज़मानाबीवी है तो ग़म-ख़्वार है पैकर है वफ़ा काआँचल को बना लेती है फ़ानूस हया कारुख़ देख के रखती है क़दम अपना हवा कागिरवीदा बनाती है तबस्सुम की अदा काख़्वाब-ए-निगह-ए-इश्क़ की ता'बीर है औरतमर्दों के लिए हुस्न की ज़ंजीर है औरतहै शक्ल में बेटी की बहार-ए-सहर-ओ-शामक़ुदरत का अतिया है ये क़ुदरत का है इनआ'मदेती है मसर्रत का दिल-ए-ज़ार को पैग़ामहै रूह को तस्कीन जिगर का है ये आरामदुख़्तर है तो अनमोल गुहर कहते हैं उस कोअल्लाह की रहमत का समर कहते हैं इस कोसूरत में बहन की है चमन का ये हसीं फूलईसार-ओ-मोहब्बत है शब-ओ-रोज़ का मा'मूलबे-कार की रंजिश को कभी देती नहीं तूलएहसास-ए-मुरव्वत में रहा करती है मशग़ूललिखी है हर इक रंग में औरत की कहानीकहते हैं उसे अज़्मत-ए-इंसाँ की निशानीमरियम है तो पाकीज़ा-ओ-शफ़्फ़ाफ़ हैं आ'मालबन जाए ज़ुलेख़ा तो हया को करे पामालगर है क्लियोपैट्रा तो सियासत की चले चाललैला है तो करती है ये दीवाना-ओ-बद-हालढल जाना हर इक रूप में आसान है उस कोबदले हुए हालात की पहचान है उस को'हिंदा' है तो सालारी का दिखलाती है जौहरहै 'राबिया-बसरी' तो ये वलियों की है हम-सरबैठी है अगर हुस्न का बाज़ार सजा करग़ैरत को बनाती है असीर-ए-हवस-ए-ज़रवाक़िफ़ है बहर-तौर ये जीने के हुनर सेबे-ख़ौफ़ गुज़र जाती है हर राहगुज़र सेइक पल में ये शो'ला है तो इक पल में है शबनमया'नी है कभी गुल तो कभी ख़ार-ए-मुजस्समहो सब्र पे आमादा तो सह जाए हर इक ग़महो जाए मुख़ालिफ़ तो पलट दे सफ़-ए-आलमपाबंद-ए-वफ़ा हो तो दिल-ओ-जान लुटा देआ जाए बग़ावत पे तो दुनिया को हिला दे
ये अँधेरी रात ये सारी फ़ज़ा सोई हुईपत्ती पत्ती मंज़र-ए-ख़ामोश में खोई हुईमौजज़न है बहर-ए-ज़ुल्मत तीरगी का जोश हैशाम ही से आज क़िंदील-ए-फ़लक ख़ामोश हैचंद तारे हैं भी तो बे-नूर पथराए हुएजैसे बासी हार में हों फूल कुम्हलाए हुएखप गया है यूँ घटा में चाँदनी का साफ़ रंगजिस तरह मायूसियों में दब के रह जाए उमंगउमडी है काली घटा दुनिया डुबोने के लिएया चली है बाल खोले राँड रोने के लिएजितनी है गुंजान बस्ती उतनी ही वीरान हैहर गली ख़ामोश है हर रास्ता सुनसान हैइक मकाँ से भी मकीं की कुछ ख़बर मिलती नहींचिलमनें उठती नहीं ज़ंजीर-ए-दर हिलती नहींसो रहे हैं मस्त-ओ-बे-ख़ुद घर के कुल पीर-ओ-जवाँहो गई हैं बंद हुस्न-ओ-इश्क़ में सरगोशियाँहाँ मगर इक सम्त इक गोशे में कोई नौहागरले रही है करवटों पर करवटें दिल थाम करदिल सँभलता ही नहिं है सीना-ए-सद-चाक मेंफूल सा चेहरा अटा है बेवगी की ख़ाक मेंउड़ चली है रंग-ए-रुख़ बन कर हयात-ए-मुस्तआरहो रहा है क़ल्ब-ए-मुर्दा में जवानी का फ़िशारहसरतें दम तोड़ती हैं यास की आग़ोश मेंसैकड़ों शिकवे मचलते हैं लब-ए-ख़ामोश मेंउम्र आमादा नहीं मुर्दा-परस्ती के लिएबार है ये ज़िंदा मय्यत दोश-ए-हस्ती के लिएचाहती है लाख क़ाबू दिल पे पाती ही नहींहाए-रे ज़ालिम जवानी बस में आती ही नहींथरथर्रा कर गिरती है जब सूने बिस्तर पर नज़रले के इक करवट पटक देती है वो तकिया पे सरजब खनक उठती हैं सोती लड़कियों की चूड़ियाँआह बन कर उठने लगता है कलेजा से धुआँहो गई बेवा की ख़ातिर नींद भी जैसे हराममुख़्तसर सा अहद-ए-वसलत दे गया सोज़-ए-दवामदोपहर की छाँव दौर-ए-शादमानी हो गयाप्यास भी बुझने न पाई ख़त्म पानी हो गयाले रही है करवटों पर करवटें बा-इज़तिरारआग में पारा है या बिस्तर पे जिस्म-ए-बे-क़रारपड़ गई इक आह कर के रो के उठ बैठी कभीउँगलियों में ले के ज़ुल्फ़-ए-ख़म-ब-ख़म एेंठी कभीआ के होंटों पर कभी मायूस आहें थम गईंऔर कभी सूनी कलाई पर निगाहें जम गईंइतनी दुनिया में कहीं अपनी जगह पाती नहींयास इस हद की कि शौहर की भी याद आती नहींआ रहे हैं याद पैहम सास ननदों के सुलूकफट रहा है ग़म से सीना उठ रही है दिल में हूकअपनी माँ बहनों का भी आँखें चुराना याद हैऐसी दुनिया में किसी का छोड़ जाना याद हैबाग़बाँ तो क़ब्र में है कौन अब देखे बहारख़ुद उसी को तीर उस के करने वाले हैं शिकारजब नज़र आता नहीं देता कोई बेकस का साथज़हर की शीशी की जानिब ख़ुद-ब-ख़ुद बढ़ता है हाथदिल तड़प कर कह रहा है जल्द इस दुनिया को छोड़चूड़ियाँ तोड़ीं तो फिर ज़ंजीर-ए-हस्ती को भी तोड़दम अगर निकला तो खोई ज़िंदगी मिल जाएगीये नहिं तो ख़ैर तन्हा क़ब्र ही मिल जाएगीवाँ तुझे ज़िल्लत की नज़रों से न देखेगा कोईचाहे हँसना चाहे रोना फिर न रोकेगा कोईवाँ सब अहल-ए-दर्द हैं सब साहब-ए-इंसाफ़ हैंरहबर आगे जा चुका राहें भी तेरी साफ़ हैंदिल इन्हीं बातों में उलझा था कि दम घबरा गयाहाथ ले कर ज़हर की शीशी लबों तक आ गयातिलमिलाती आँख झपकाती झिझकती हाँफतीपी गई कुल ज़हर आख़िर थरथराती काँपतीमौत ने झटका दिया कुल उज़्व ढीले हो गएसाँस उखड़ी, नब्ज़ डूबी, होंट नीले हो गएआँख झपकी अश्क टपका हिचकी आई खो गईमौत की आग़ोश में इक आह भर कर सो गईऔर कर इक आह सुलगे हिन्द की रस्मों का दामऐ जवाना-मर्ग बेवा तुझ पे 'कैफ़ी' का सलाम
बेज़ार फ़ज़ा दरपा-ए-आज़ार सबा हैयूँ है कि हर इक हमदम-ए-देरीना ख़फ़ा हैहाँ बादा-कशो आया है अब रंग पे मौसमअब सैर के क़ाबिल रविश-ए-आब-ओ-हवा हैउमडी है हर इक सम्त से इल्ज़ाम की बरसातछाई हुई हर दाँग मलामत की घटा हैवो चीज़ भरी है कि सुलगती है सुराहीहर कासा-ए-मय ज़हर-ए-हलाहल से सिवा हैहाँ जाम उठाओ कि ब-याद-ए-लब-ए-शीरींये ज़हर तो यारों ने कई बार पिया हैइस जज़्बा-ए-दिल की न सज़ा है न जज़ा हैमक़्सूद-ए-रह-ए-शौक़ वफ़ा है न जफ़ा हैएहसास-ए-ग़म-ए-दिल जो ग़म-ए-दिल का सिला हैउस हुस्न का एहसास है जो तेरी अता हैहर सुब्ह-ए-गुलिस्ताँ है तिरा रू-ए-बहारींहर फूल तिरी याद का नक़्श-ए-कफ़-ए-पा हैहर भीगी हुई रात तिरी ज़ुल्फ़ की शबनमढलता हुआ सूरज तिरे होंटों की फ़ज़ा हैहर राह पहुँचती है तिरी चाह के दर तकहर हर्फ़-ए-तमन्ना तिरे क़दमों की सदा हैताज़ीर-ए-सियासत है न ग़ैरों की ख़ता हैवो ज़ुल्म जो हम ने दिल-ए-वहशी पे किया हैजिंदान-ए-रह-ए-यार में पाबंद हुए हमज़ंजीर-ब-कफ़ है न कोई बंद-ए-बपा है''मजबूरी ओ दावा-ए-गिरफ़्तारी-ए-उलफ़तदस्त-ए-तह-ए-संग-आमदा पैमान-ए-वफ़ा है''
मिरा जुनून-ए-वफ़ा है ज़वाल-आमादाशिकस्त हो गया तेरा फ़ुसून-ए-ज़ेबाईउन आरज़ूओं पे छाई है गर्द-ए-मायूसीजिन्हों ने तेरे तबस्सुम में परवरिश पाईफ़रेब-ए-शौक़ के रंगीं तिलिस्म टूट गएहक़ीक़तों ने हवादिस से फिर जिला पाईसुकून-ओ-ख़्वाब के पर्दे सरकते जाते हैंदिमाग़-ओ-दिल में हैं वहशत की कार-फ़रमाईवो तारे जिनमें मोहब्बत का नूर ताबाँ थावो तारे डूब गए ले के रंग-ओ-रानाईसुला गई थीं जिन्हें तेरी मुल्तफ़ित नज़रेंवो दर्द जाग उठे फिर से ले के अंगड़ाईअजीब आलम-ए-अफ़्सुर्दगी है रू-बा-फ़रोग़न जब नज़र को तक़ाज़ा न दिल तमन्नाईतिरी नज़र तिरे गेसू तिरी जबीं तिरे लबमिरी उदास-तबीअत है सब से उकताईमैं ज़िंदगी के हक़ाएक़ से भाग आया थाकि मुझ को ख़ुद में छुपाए तिरी फ़ुसूँ-ज़ाईमगर यहाँ भी तआ'क़ुब किया हक़ाएक़ नेयहाँ भी मिल न सकी जन्नत-ए-शकेबाईहर एक हाथ में ले कर हज़ार आईनेहयात बंद दरीचों से भी गुज़र आईमिरे हर एक तरफ़ एक शोर गूँज उठाऔर उस में डूब गई इशरतों की शहनाईकहाँ तलक करे छुप-छुप के नग़्मा-पैराईवो देख सामने के पुर-शिकोह ऐवाँ सेकिसी किराए की लड़की की चीख़ टकराईवो फिर समाज ने दो प्यार करने वालों कोसज़ा के तौर पर बख़्शी तवील तन्हाईफिर एक तीरा-ओ-तारीक झोंपड़ी के तलेसिसकते बच्चे पे बेवा की आँख भर आईवो फिर बिकी किसी मजबूर की जवाँ बेटीवो फिर झुका किसी दर पर ग़ुरूर-ए-बरनाईवो फिर किसानों के मजमे' पे गन-मशीनों सेहुक़ूक़-याफ़ता तबक़े ने आग बरसाईसुकूत-ए-हल्क़ा-ए-ज़िंदाँ से एक गूँज उठीऔर इस के साथ मिरे साथियों की याद आईनहीं नहीं मुझे यूँ मुल्तफ़ित नज़र से न देखनहीं नहीं मुझे अब ताब-ए-नग़्मा-पैराईमिरा जुनून-ए-वफ़ा है ज़वाल-आमादाशिकस्त हो गया तेरा फुसून-ए-ज़ेबाई
जहाँ में हर तरफ़ है इल्म ही की गर्म-बाज़ारीज़मीं से आसमाँ तक बस इसी का फ़ैज़ है जारीयही सरचश्मा-ए-असली है तहज़ीब-ओ-तमद्दुन काबग़ैर इस के बशर होना भी है इक सख़्त बीमारीबनाता है यही इंसान को कामिल-तरीन इंसाँसिखाता है यही अख़्लाक़ ओ ईसार ओ रवा-दारीयही क़ौमों को पहुँचाता है बाम-ए-औज-ओ-रिफ़अत परयही मुल्कों के अंदर फूँकता है रूह-ए-बेदारीइसी के नाम का चलता है सिक्का सारे आलम मेंइसी के सर पे रहता है हमेशा ताज-ए-सरदारीइसी के सब करिश्मे ये नज़र आते हैं दुनिया मेंइसी के दम से रौनक़ आलम-ए-इम्काँ की है सारीये ला-सिलकी, ये टेलीफ़ोन ये रेलें, ये तय्यारेये ज़ेर-ए-आब ओ बाला-ए-फ़लक इंसाँ की तर्रारीहुदूद-ए-इस्तवा क़ुतबैन से यूँ हो गए मुदग़मकि है अब रुबअ मस्कों जैसे घर की चार-दीवारीसमुंदर हो गए पायाब सहरा बिन गए गुलशनकिया साइंस ने भी ए'तराफ़-ए-इज्ज़-ओ-नाचारीबुख़ार ओ बर्क़ का जर्रार लश्कर है अब आमादाउगलवा ले ज़मीन ओ आसमाँ की दौलतें सारीग़रज़ चारों तरफ़ अब इल्म ही की बादशाही हैकि उस के बाज़ूओं में क़ुव्वत-ए-दस्त-ए-इलाही हैनिगाह-ए-ग़ौर से देखो अगर हालात-ए-इंसानीतो हो सकता है हल ये उक़्दा-ए-मुश्किल ब-आसानीवही क़ौमें तरक़्क़ी के मदारिज पर हैं फाएक़-तरकि है जिन में तमद्दुन और सियासत की फ़रावानीइसी के ज़ोम में है जर्मनी चर्ख़-ए-तफ़ाख़ुर परइसी के ज़ोर पर मिर्रीख़ का हम-सर है जापानीइसी की क़ुव्वत-ए-बाज़ू पे है मग़रूर अमरीकाइसी के बिल पर लड़की हो रही है रुस्तम-ए-सानीइशारे पर इसी के नक़्ल-ओ-हरकत है सब इटली कीइसी के ताबा-ए-फ़रमान हैं रूसी ओ ईरानीइसी के जुम्बिश-ए-अबरू पे है इंग्लैण्ड का ग़र्राइसी के हैं सब आवुर्दे फ़्रांसीसी ओ एल्बानीकोई मुल्क अब नहीं जिन में ये जौहर हो न रख़्शंदान ग़ाफ़िल इस से चीनी हैं न शामी हैं न अफ़्ग़ानीबग़ैर इस के जो रहना चाहते हैं इस ज़माने मेंसमझ रक्खें फ़ना उन के लिए है हुक्म-ए-रब्बानीज़माना फेंक देगा ख़ुद उन्हें क़अ'र-ए-हलाकत मेंवो अपने हाथ से होंगे ख़ुद अपनी क़ब्र के बानीज़माने में जिसे हो साहिब-ए-फ़तह-ओ-ज़फ़र होनाज़रूरी है उसे इल्म-ओ-हुनर से बहरा-वर होनातरक़्क़ी की खुली हैं शाहराहें दहर में हर सूनज़र आता है तहज़ीब-ओ-तमद्दुन से जहाँ ममलूचले जाते हैं उड़ते शहसवारान-ए-फ़लक-पैमाख़िराज-ए-तहनियत लेते हुए करते हुए जादूगुज़रते जा रहे हैं दूसरों को छोड़ते पीछेकभी होता है सहरा मुस्तक़र उन का कभी टापूकमर बाँधे हुए दिन रात चलने पर हैं आमादादिमाग़ अफ़्कार से और दिल वुफ़ूर-ए-शौक़ से मलूलअलग रह कर ख़याल-ए-ज़हमत ओ एहसास-ए-राहत सेलगे हैं अपनी अपनी फ़िक्र में बा-ख़ातिर-ए-यकसूमगर हम हैं कि असलन हिस नहीं हम को कोई इस कीहमारे पा-ए-हिम्मत इन मराहिल में हैं बे-क़ाबूजहाँ पहला क़दम रक्खा था रोज़-ए-अव्वलीं हम नेनहीं सरके इस अपने असली मरकज़ से ब-क़द्र-ए-मूये हालत है कि हम पर बंद है हर एक दरवाज़ानज़र आता नहीं हरगिज़ कोई उम्मीद का पहलूमगर वा-हसरता फिर भी हम अपने ज़ोम-ए-बातिल मेंसमझते हैं ज़माने भर से आगे ख़ुद को मंज़िल मेंज़रूरत है कि हम में रौशनी हो इल्म की पैदानज़र आए हमें भी ताकि अस्ल-ए-हालत-ए-दुनियाहमें मालूम हो हालात अब क्या हैं ज़माने केहमारे साथ का जो क़ाफ़िला था वो कहाँ पहुँचाजो पस्ती में थे अब वो जल्वा-गर हैं बाम-ए-रिफ़अत परजो बालक बे-निशाँ थे आज है इन का अलम बरपाहमारी ख़ूबियाँ सब दूसरों ने छीन लीं हम सेज़माने ने हमें इतना झिंझोड़ा कर दिया नंगारवा-दारी, उख़ुव्वत, दोस्ती, ईसार, हमदर्दीख़्याल-ए-मुल्क-ओ-मिल्लत, दर्द-ए-क़ौम, अंदेशा-ए-फ़र्दाये सब जौहर हमारे थे कभी ऐ वाए-महरूमीबने हैं ख़ूबी-ए-क़िस्मत से जो अब ग़ैर का हिस्साअगर हो जाएँ राग़िब अब भी हम तालीम की जानिबतो कर सकते हैं अब भी मुल्क में हम ज़िंदगी पैदाबहुत कुछ वक़्त हम ने खो दिया है लेकिन इस पर भीअगर चाहें तो कर दें पेश-रौ को अपने हम पसपानिकम्मा कर दिया है काहिली ने गो हमें लेकिनरगों में है हमारी ख़ून अभी तक दौड़ता फिरताकोई मख़्फ़ी हरारत गर हमारे दिल को गरमा देहमारे जिस्म में फिर ज़िंदगी की रूह दौड़ा देवतन वालो बहुत ग़ाफ़िल रहे अब होश में आओउठो बे-दार हो अक़्ल-ओ-ख़िरद को काम में लाओतुम्हारे क़ौम के बच्चों में है तालीम का फ़ुक़्दाँये गुत्थी सख़्त पेचीदा है इस को जल्द सुलझाओयही बच्चे बिल-आख़िर तुम सभों के जा-नशीं होंगेतुम अपने सामने जैसा उन्हें चाहो बना जाओबहुत ही रंज-दह हो जाएगी उस वक़्त की ग़फ़लतकहीं ऐसा न हो मौक़ा निकल जाने पे पछताओये है कार-ए-अहम दो चार इस को कर नहीं सकतेख़ुदा-रा तुम भी अपने फ़र्ज़ का एहसास फ़रमाओये बोझ ऐसा नहीं जिस को उठा लें चार छे मिल करसहारा दो, सहारा दूसरों से इस में दिलवाओजो ज़ी-एहसास हैं हासिल करो तुम ख़िदमतें उन कीजो ज़ी-परवा हैं उन को जिस तरह हो उस तरफ़ लाओग़रज़ जैसे भी हो जिस शक्ल से भी हो ये लाज़िम हैतुम अपने क़ौम के बच्चों को अब तालीम दिलवाओअगर तुम मुस्तइ'द्दी को बना लोगे शिआर अपनायक़ीं जानो कि मुस्तक़बिल है बेहद शानदार अपनाख़ुदावंदा! दुआओं में हमारी हो असर पैदाशब-ए-ग़फ़लत हमारी फिर करे नूर-ए-सहर पैदाहमारे सारे ख़्वाबीदा क़वा बे-दार हो जाएँसर-ए-नौ हो फिर इन में ज़िंदगी की कर्र-ओ-फ़र्र पैदाहमें एहसास हो हम कौन थे और आज हम क्या हैंकरें माहौल-ए-मुल्की के लिए गहरी नज़र पैदामिला रक्खा है अपने जौहर-ए-कामिल को मिट्टी मेंहम अब भी ख़ाक से कर सकते हैं लाल-ओ-गुहर पैदाअगर चाहें तो हम मुश्किल वतन की दम में हल कर देंहज़ारों सूरतें कर सकते हैं हम कारगर पैदाब-ज़ाहिर गो हम इक तूदा हैं बिल्कुल राख का लेकिनअगर चाहें तो ख़ाकिस्तर से कर दें सौ शरर पैदावतन का नक्बत ओ अफ़्लास खो दें हम इशारे मेंजहाँ ठोकर लगा दें हो वहीं से कान-ए-ज़र पैदाहम इस मंज़िल के आख़िर पर पहुँच कर बिल-यक़ीं दम लेंअगर कुछ ताज़ा-दम हो जाएँ अपने हम-सफ़र पैदाजो कोशिश मुत्तहिद हो कर कहीं इक बार हो जाएयक़ीं है मुल्क की क़िस्मत का बेड़ा पार हो जाए
1यूँ तो मरने के लिए ज़हर सभी पीते हैंज़िंदगी तेरे लिए ज़हर पिया है मैं नेशम्अ जलती है पर इक रात में जल जाती हैयाँ तो एक उम्र इसी तरह से जलते गुज़रीकौन सी ख़ाक है ये जाने कहाँ का है ख़मीरइक नए साँचे में हर रोज़ ही ढलते गुज़रीकिस तरह मैं ने गुज़ारी हैं ये ग़म की घड़ियाँकाश मैं ऐसी कहानी को सुना भी सकतातअ'ना-ज़न हैं जो मिरे हाल पे अरबाब-ए-नशातउन को इक बार मैं ऐ काश रुला भी सकतामैं कि शाएर हूँ मैं पैग़ामबर-ए-फ़ितरत हूँमेरी तख़्ईल में है एक जहान-ए-बेदारदस्तरस में मिरी नज़्ज़ारा-ए-गुल-हा-ए-चमनमेरे इदराक में हैं कुन-फ़यकूँ के असरारमिरे अशआ'र में है क़ल्ब-ए-हज़ीं की धड़कनमेरी नज़्मों में मिरी रूह की दिल-दोज़ पुकारफिर भी रह रह के खटकती है मिरे दिल में ये बातकि मिरे पास तो अल्फ़ाज़ का इक पर्दा हैसिर्फ़ अल्फ़ाज़ से तस्वीर नहीं बन सकतीसिर्फ़ एहसास में हालात की तफ़्सीर कहाँसिर्फ़ फ़रियाद में ज़ख़्मों की वो ज़ंजीर कहाँऐसी ज़ंजीर कि एक एक कड़ी में जिस कीकितनी खोई हुई ख़ुशियों के मनाज़िर पिन्हाँकितनी भूली हुई यादों के पुर-असरार खंडरकितने उजड़े हुए लूटे हुए सुनसान नगरकितने आते हुए जाते हुए चेहरों के नुक़ूशकितने बनते हुए मिटते हुए लम्हात का राज़कितनी उलझी हुई राहों के नशेब और फ़राज़2क्या कहूँ मुझ को कहाँ लाई मिरी उम्र-ए-रवाँआँख खोली तो हर इक सम्त अँधेरों का समाँरेंगती ऊँघती मग़्मूम सी इक राहगुज़ारगर्द-ए-आलाम में खोया हुआ मंज़िल का निशाँगेसू-ए-शाम से लिपटी हुई ग़म की ज़ंजीरसीना-ए-शब से निकलती हुई फ़रियाद-ओ-फ़ुग़ाँठंडी ठंडी सी हवाओं में वो ग़ुर्बत की थकनदर-ओ-दीवार पे तारीक से साए लर्ज़ांकितनी खोई हुई बीमार ओ फ़सुर्दा आँखेंटिमटिमाते से दिए चार तरफ़ नौहा-कुनाँमुज़्महिल चेहरे मसाइब की गिराँ-बारी सेदिल-ए-मजरूह से उठता हुआ ग़मनाक धुआँयही तारीकी-ए-ग़म तो मिरा गहवारा हैमैं इसी कोख में था नूर-ए-सहर के मानिंदहर तरफ़ सोग में डूबा हुआ मेरा माहौलमेरा उजड़ा हुआ घर 'मीर' के घर के मानिंदइक तरफ़ अज़्मत-ए-अस्लाफ़ का माथे पे ग़ुरूरऔर इक सम्त वो इफ़्लास के फैले हुए जालभूक की आग में झुलसे हुए सारे अरमाँक़र्ज़ के बोझ से जीने की उमंगें पामालवक़्त की धुँद में लिपटे हुए कुछ प्यार के गीतमेहर ओ इख़्लास ज़माने की जफ़ाओं से निढालभाई भाई की मोहब्बत में निराले से शुकूकनिगह-ए-ग़ैर में जिस तरह अनोखे से सवाल''एक हंगामे पे मौक़ूफ़ थी घर की रौनक़''मुफ़्लिसी साथ लिए आई थी इक जंग-ओ-जिदालफ़ाक़ा-मस्ती में बिखरते हुए सारे रिश्तेतंग-दस्ती के सबब सारी फ़ज़ाएँ बेहालइक जहन्नम की तरह था ये मिरा गहवाराइस जहन्नम में मेरे बाप ने दम तोड़ दियाटूट कर रह गए बचपन के सुहाने सपनेमुझ से मुँह फेर लिया जैसे मिरी शोख़ी नेमेरे हँसते हुए चेहरे पे उदासी छाईजैसे इक रात भयानक मिरे सर पर आईराहें दुश्वार मगर राह-नुमा कोई न थासामने वुसअ'त-ए-अफ़्लाक ख़ुदा कोई न थामेरे अज्दाद की मीरास ये वीरान सा घरजिस को घेरे हुए हर सम्त तबाही के भँवरजिस की छत गिरती हुई टूटा हुआ दरवाज़ाहर तरफ़ जैसे बिखरता हुआ इक शीराज़ान कहीं अतलस-ओ-कमख़्वाब न दीबा-ओ-हरीरहर तरफ़ मुँह को बसोरे हुए जैसे तक़दीरमुझ को उस घर से मोहब्बत तो भला क्या होतीयाँ अगर दिल में न जीने की तमन्ना होतीये समझ कर कि यही है मिरी क़िस्मत का लिखाउस की दीवार के साए में लिपटा रहतालेकिन इस दिल की ख़लिश ने मुझे बेदार कियामुझ को हालात से आमादा-ए-पैकार कियाबे-कसी रख़्त-ए-सफ़र बन कर मिरे साथ चलीयाद आई थी मुझे गाँव की एक एक गलीलहलहाती हुई फ़सलें वो मिरे आम के बाग़वो मकानों में लरज़ते हुए धुँदले से चराग़दूर तक पानी में फैले हुए वो धान के खेतऔर तालाब-किनारे वो चमकती हुई रेतमेरे हम-उम्र वो साथी वो मिरे हम-जोलीमेरे स्कूल के वो दोस्त मिरी वो टोलीएक बार उन की निगाहों ने मुझे देखा थाजैसे इक बार मिरे दिल ने भी कुछ सोचा था''मैं ने जब वादी-ए-ग़ुर्बत में क़दम रक्खा थादूर तक याद-ए-वतन आई थी समझाने को''
एक है अपनी ज़मींएक है अपना गगनएक है अपना जहाँएक है अपना वतनअपने सभी सुख एक हैंअपने सभी ग़म एक हैंआवाज़ दो हम एक हैंये वक़्त खोने का नहींये वक़्त सोने का नहींजागो वतन ख़तरे में हैसारा चमन ख़तरे में हैफूलों के चेहरे ज़र्द हैंज़ुल्फ़ें फ़ज़ा की गर्द हैंउमड़ा हुआ तूफ़ान हैघर की हिफ़ाज़त फ़र्ज़ हैबेदार हो बेदार होआमादा-ए-पैकार होआवाज़ दो हम एक हैंये है हिमाला की ज़मींताज-ओ-अजंता की ज़मींसंगम हमारी आन हैचित्तोर अपनी शान हैगुल-मर्ग का महका चमनजमुना का तट गोकुल का बनगंगा के धारे अपने हैंये सब हमारे अपने हैंकह दो कोई दुश्मन-नज़रउट्ठे न भूले से इधरकह दो कि हम बेदार हैंकह दो कि हम तय्यार हैंआवाज़ दो हम एक हैंउट्ठो जवानान-ए-वतनबाँधे हुए सर से कफ़नउट्ठो दकन की ओर सेगंग-ओ-जमन की ओर सेपंजाब के दिल से उठोसतलुज के साहिल से उठोबंगाल से गुजरात सेकश्मीर के बाग़ात सेनेफ़ा से राजस्थान सेकुल ख़ाक-ए-हिन्दोस्तान सेआवाज़ दो हम एक हैंहम एक हैंहम एक हैं
इक मौलवी साहब से कहा मैं ने कि क्या आपकुछ हालत-ए-यूरोप से ख़बर-दार नहीं हैंआमादा-ए-इस्लाम हैं लंदन में हज़ारोंहर चंद अभी माइल-ए-इज़हार नहीं हैंतक़लीद के फंदों से हुए जाते हैं आज़ादवो लोग भी जो दाख़िल-ए-इसरार नहीं हैंजो नाम से इस्लाम के हो जाते हैं बरहमउन में भी तअ'स्सुब के वो आसार नहीं हैंअफ़्सोस मगर ये है कि वाइ'ज़ नहीं पैदाया हैं तो ब-क़ौल आप के दीं-दार नहीं हैंक्या आप के ज़ुमरे में किसी को नहीं ये दर्दक्या आप भी उस के लिए तय्यार नहीं हैंझल्ला के कहा ये कि ये क्या सू-ए-अदब हैकहते हो वो बातें जो सज़ा-वार नहीं हैंकरते हैं शब-ओ-रोज़ मुसलमानों की तकफ़ीरबैठे हुए कुछ हम भी तो बे-कार नहीं हैं
ये रामायनजो हिंदुस्तान की रग रग में शामिल हैजिसे इक बाल्मीकि नाम के शाइ'र ने लिक्खा थाबहुत ही ख़ूबसूरत एक एपिक हैफ़साना-दर-फ़साना बात कोई मुंजमिद हैइमोशन क़ैद हैं लाखों तरह केकई किरदार हैं जो साहब-ए-किरदार लगते हैंमगर इक बात हैजो मुद्दतों से मुझ को खलती हैकि अफ़्साने मेंसब के दर्द-ओ-ग़म का ज़िक्र मिलता हैमगर वो एक लड़कीफूल से भी सौ गुना नाज़ुकजो सीता की बहन थीऔर जिस की माँग में सिंदूर भरते वक़्त हीश्री राम के भाई लखन नेआग की मौजूदगी में ये कहा थामैं तुम से ज़िंदगी-भर इश्क़ फ़रमाया करूँगाऔर साए की तरह ही साथ में हर-दम रहूँगाजो लड़की एक पल मेंसात जन्मों के लिए बीवी लखन की हो गई थीवही लड़कीजिसे सब उर्मिला कह कर बुलाते थेजो अपने बाप के सीने से लग कर वक़्त-ए-रुख़्सत ख़ूब रोईउस के अश्कों सेफ़साने का कोई हिस्सा कहीं भीगा नहीं हैऔर उस के दर्द की कोई निशानी तक नहीं मिलतीमगर सच हैकि रामायन में वैसा ग़म-ज़दा किरदार कोई भी नहीं मिलतामैं उस किरदार से ख़ासा मुतअस्सिर हूँकि जब चौदह बरस के वास्ते श्री-राम को बन-वास जाना थाआमादा थे लखन भी भाई की सेवा में जाने कोज़रा सा भी नहीं सोचाकि जिस लड़की से पूरी ज़िंदगी का रब्त जोड़ा हैकि जिस ने ख़ूबसूरत नैन में कुछ ख़्वाब बोए हैंउसे किस के सहारे छोड़ कर वो जा रहे हैंमगर वो उर्मिला को छोड़ कर भाई के पीछे चल पड़ेकोई तड़पती आरज़ू सीउर्मिला के होंठ से गिर करकई टुकड़ों में नीचे फ़र्श पर बिखरी हुई थीज़ोर से आवाज़ नन्ही फड़फड़ाईऔर ज़ख़्मी हो गया था प्यार का वो एक दामनजो कभी फूलों की ख़ुश्बू में भिगोया थामहज़ काँटे ही काँटे हर तरफ़ थेइक इमारत बनने से पहले ही टूटी थीतो या'नी उर्मिला चौदह बरस तकख़ल्वतों के मौसमों से रोज़ लड़ती थीसहेली साथ थीलेकिन सभी ख़ुशियों को वो इग्नोर करती थीतमन्नाएँ अगर बादल की तरह घिरने लगती थींतमन्नाओं की बारिश में नहाने से वो बचती थीचुरा लेती थी वो आँखेंअगर ग़लती से कोई आइना तारीफ़ कर देताहवाएँ जिस्म में उस के अगर सिहरन जगा देतींतो ख़ुद को अपनी ही बाँहों में भर करख़ुद से ये कहतीलखन आएँगे जल्दी मान भी जाओ बहारोंऔर सो जाओ सितारों तुमकि मुझ को रात दिन जगने की आदत हो गई हैऔर मोहब्बत के लिए ये उम्र की दौलत पड़ी हैमगर जब ख़्वाहिशों के बाँध अक्सर टूटते होंगेतो फिर सैलाब मेंक्या क्या न बह कर खो गया होगाहज़ारों अध-खिले अरमान भी मुरझा गए होंगेतबस्सुम नेकिसी पल डस लिया होगा लबों को गरतो सारा ज़हर मौक़ा देख करउस के बदन में रक़्स करता फिर रहा होगाकभी कोयल की काली कूक गर कानों में पहुँची होतो शिरयानों में बहता ख़ून सारा जम गया होगापराए मर्द का कोई तसव्वुर छूने से पहलेवो लड़की डर गई होगीअचानक मर गई होगी
मेरी बन जाने पे आमादा है वो जान-ए-हयातजो किसी और से पैमान-ए-वफ़ा रखती हैमेरे आग़ोश में आने के लिए राज़ी हैजो किसी और को सीने में छुपा रखती है
मुसाफ़िर-ए-अबदी की नहीं कोई मंज़िलयहाँ क़याम किया या वहाँ क़याम कियातिरी वफ़ा ने बड़े मरहले किए आसाँफ़रोग़-ए-सुब्ह को तू ने फ़रोग़-ए-काम कियासनम-कदों में बढ़ा ए'तिबार-ए-अहल-ए-हरमहरम ने दैर-नशीनों का एहतिराम कियाहयात क्या है मोहब्बत की आग में जलनाये राज़ भी तिरे सोज़-ए-वफ़ा ने 'आम कियाउठा उठा के हिजाबात-ए-चेहरा-ए-मंज़िलमुसाफ़िरान-ए-सदाक़त को तेज़-गाम कियागुज़र के दानिश-ए-हाज़िर के आसमानों सेबुलंद सादगी-ए-इश्क़ का मक़ाम कियामिला जो दस्त-ए-हवादिस से ज़ह्र भी तुझ कोबड़े ख़ुलूस से तू ने शरीक-ए-जाम कियावो दर्द तेरी ख़मोशी में था निहाँ जिस नेसुकूत-ए-नाज़ को आमादा-ए-कलाम कियासिला था तेरी रियाज़त का सुब्ह-ए-आज़ादीवो सुब्ह जिस को ग़ुलामों ने नंग-ए-शाम कियाअभी तो गोश-बर-आवाज़ थी भरी महफ़िलकहाँ ये तू ने कहानी का इख़्तिताम कियाख़याल-ए-दोस्त का परतव थी काएनात तिरीइसी तलाश में गुम हो गई हयात तिरी
मुशाएरे में जो शाएर बुलाए जाते हैंबड़े सलीक़े से बूदम बनाए जाते हैंवसूल होते हैं पहले ये नामा-ओ-पैग़ामकि ऐ शहंशह-ए-अक़्लीम-ए-'हाफ़िज़'-ओ-'ख़य्याम'हमारी बज़्म-ए-अदब का है जश्न-ए-सालानाजली है शम्-ए-सुख़न रक़्स में है परवानाघटा जो शेरों की चारों तरफ़ से आई हैवो फ़िल्म के भी सितारे समेट लाई हैगुज़िश्ता साल सुना जिस ने आप को ये कहान शोले में ये करिश्मा, न बर्क़ में अदाऔर अब के साल भी ख़ुद देख लेंगे ये सरकारकि गूँजते हैं अक़ीदत से कूचा-ओ-बाज़ाररवाना कर दें किराए की गर ज़रूरत है''वो आएँ घर में हमारे ख़ुदा की क़ुदरत है''हमारे शहर में उर्दू अदब का दंगल हैये शहर शेर का और शायरों का जंगल हैअब इस पे शाएर-ए-शीरीं-नवा को है ये गुमाँकि मेरे शोले से रौशन हुई है शम्अ-ए-बयाँइधर से मुन्तज़िम इक सोच और विचार में हैउसे ख़बर है कि शाएर किस इंतिज़ार में हैबुलाने के लिए इसरार भी वो करता हैकिराया ले कि न फिर आए इस से डरता हैबना के लिखता है दावत का इस तरह मक्तूबमुशाएरे में दिया जाएगा जो है मतलूबग़रज़ बुलाते हैं वो शायरों को हीले सेपयाम आते हैं अहबाब के वसीले सेजो शेर सुनने को अपने घरों से आते हैंवो सब बटेर लड़ाने का लुत्फ़ उठाते हैंवो जानते हैं कि शाएर है एक मुर्ग़-ए-अजीबअगर गला है तो शाएर, नहीं गला तो अदीबये सोचता है चलो क़िस्मत आज़मा देखेंसुलूक होता है औरों के साथ क्या देखेंबहुत से और भी शाएर वहाँ पर आएँगेचलो कि मर्ग-ए-रक़ीबाँ का लुत्फ़ उठाएँगेहैं कुछ पले हुए शाएर कुछ इन में ख़ुद-रौ हैंपुराने घाग हैं कुछ इन में शाएर-ए-नौ हैंवो दीदनी है अगर हो कुछ इन में हंगामाकि इस अखाड़े का हर पहलवाँ है अल्लामासताते रहते हैं शाएर को ऐसे अंदेशेयहाँ तलक कि निकल आएँ रिश्ते और रेशेतअल्लुक़ात से आख़िर को हो के वो मजबूरमुशाएरे को चला जैसे काम पर मज़दूरकिसी से क़र्ज़ लिया और किसी की मिन्नत कीग़रज़ कि शाएर-ए-आतिश-नवा ने रहलत कीफँसा है इस लिए फंदे में शाएर-ए-सादाकि मुन्तज़िम भी थे हुशियार ये भी आमादावो आ गया है उठा कर हज़ार दुश्वारीचले जिलौ में उसे ले के उस के दरबारीकिसी के हाथ में पान और किसी के हाथ में हारहर इक ये कहता है ज़हमत बहुत हुई सरकारमुशाएरे में क़दम-रंजा आप फ़रमाएँतो अहल-ए-ज़ौक़ नाशिस्तों में आ के भर जाएँतड़प रहे थे जो सुनने के वास्ते अशआरमुशाएरे के लिए उन के पास हैं दरकारटिकट ख़रीद के जो अहल-ए-ज़ौक़ आए हैंवो आख़िरी सफ़ों में ख़ुद-बख़ुद समाए हैंमोअज़्ज़ेज़ीन जो ज़ौक़-ए-अदब से ख़ाली हैंरिज़र्व उन के लिए अगली सफ़ करा ली हैंये इस लिए कि नज़र में वो आप की भी रहेंजो शेर वो न समझ पाएँ आप वो न पढ़ेंमुशाएरे में ख़्वातीन बुनती हैं स्वेटरसँभल के बैठे हैं शाएर की ताक में हूटरपढ़ा मुशाएरा शाएर ने एहतिमाम के साथग़ज़ल सुनाई तरन्नुम की धूम-धाम के साथकिसी ने वाह कहा और किसी ने हूट कियामुशाएरे को ये समझा कि मैं ने लूट लियाइसी पे फूला हुआ है वाह-वाह हुईतमाम रात कटी नींद भी तबाह हुईये महफ़िल आ ही गई रोज़-ओ-शब की सरहद परजनाब-ए-सद्र भी अब सो चुके हैं मसनद परजो सामईन हैं उन पर भी नींद तारी हैसवारी उस को मिली जिस पे फ़ज़्ल-ए-बारी हैजो मुन्तज़िम थे सितारों के साथ डूब गएगए वो शायरों से छुप के और ख़ूब गएनुमूद-ए-सुब्ह से जब मुंतशिर हुई महफ़िलअकेला रह गया शाएर ग़रीब-ए-शहर ओ ख़जिलमुशाएरा ब-जुज़ अंदाज़-ए-हाव-हू क्या है''तुम्हारे शहर में 'ग़ालिब' की आबरू क्या है''
लोग कहते हैं कि आमादा-ए-इस्लाह है लीगये अगर सच है तो हम को भी कोई जंग नहींसग़ा-ए-राज़ से कुछ कुछ ये भनक आती हैकि हम-आहंगी-ए-अहबाब से अब नंग नहींफ़र्क़ इतना तो ब-ज़ाहिर नज़र आता है ज़रूरअब ख़ुशामद का हर इक बात में वो रंग नहींअर्ज़-ए-मतलब में ज़बाँ कुछ तो है खुलती जातीगरचे अब तक भी हरीफ़ों से हम-आहंग नहींवो भी अब नक़्द-ए-हुकूमत को परखते हैं ज़रूरजिन को अब तक भी तमीज़-ए-गुहर-ओ-संग नहींक़ौम में फूँकते रहते हैं जो अफ़्सून-ए-वफ़ाउन की अफ़्साना-तराज़ा का भी वो ढंग नहींवो भी कहते हैं कि इस जिंस-ए-वफ़ा की क़ीमतजिस क़दर मिलती है ज़र्रे के भी हम संग नहींआगे थे हल्क़ा-ए-तक़्लीद में जो लोग असीरसुस्त-रफ़्तार तो अब भी हैं मगर लंग नहींआप लिबरल जो नहीं हैं तो बला से न सहीयाँ किसी को तलब-ए-अफ़्सर-ओ-औरंग नहींकाम करने के बहुत से हैं जो करना चाहेंअब भी ये दाएरा-ए-साई-ओ-अमल तंग नहींसाल में ये जो तमाशा सा हुआ करता हैकाम करने का ये अंदाज़ नहीं ढंग नहींकुछ तो नज़्म-ओ-नक़्श-ए-मुल्क में भी दीजिए दख़्लशेवा-ए-हक़-तलबी है ये कोई जंग नहींकुछ न कुछ नज़्म-ए-हुकूमत में है इस्लाह ज़रूरहम न मानेंगे कि इस आईना में ज़ंग नहींकम से कम हाकिम-ए-इज़ला तो हों अहल-ए-वतनक्या हज़ारों में कोई साहिब-ए-फ़रहंग नहीं
मुझे मग़्लूब करने कोमिरे जज़्बात के अंदोख़्ता हीलों को उकसा कर वो कहते हैंतिरी आँखों तिरी बाँहों मेंजन्नत के शगूफ़ों की महकआसाइशों की लज़्ज़तों का लम्स रचता हैमगर अब ख़्वाहिशें पाँव पकडती हैंनए ख़्वाबों के जालों में उलझते साँस कहते हैंकभी तो फैले हाथों के तमव्वुज में सिमट जाने की तरग़ीब-ओ-इशारत कोगुज़रती साअ'तों से मावरा ऐसे ज़मानों कीफ़ज़ा समझोजहाँ साए सिमट कर एक हूँतस्लीम-ए-जाँ तक की हुमक जागेकभी ठहरोकभी बढ़ती हुई मौजों से हम-आग़ोश होतीतेज़ लहरों की फ़ज़ा होने मेंयक-जानी की पिन्हाँ सरख़ुशी देखोकभी उस जब्र-ए-बे-अंदाज़ के फंदे से निकलोऔर रचो उस में कि वो ख़ुद तुम में रचने के लिए बेताब दाइम हैरचाओ हाथ में इस तरह मेहंदीलोग कह उठींउसे चाहत की बे-पायाँ तपिश की हिद्दतें गुलज़ार करती हैंरचाओ हाथ में इस तरह मेहंदीये तपाँ नंगी हथेली अपना पैकरसुर्ख़ियों से ढाँप ले ऐसेकि दिल के तिश्नगी आसार जज़्बे भीतज़ब्ज़ुब के धुँदलकों से निकल कररोज़-ओ-शब की नग़्मगी को जज़्ब करने पर हूँ आमादामगर रंगों को आख़िरजब्र-ए-बे-रंगी का ख़म्याज़ा मुक़द्दर हैअगर यूँ अपने हाथों से लगाई मेहँदियों के रंग उड़ जाएँतो हसरत-ज़दा आँखें किसे चाहेंकिसे पाबंद-ए-दर समझेंकिसे ढूँडें
सड़कों पे सन्नाटा है औरजिन उम्रों मेंमाएँ बेटों के सिगरेट से सुलगे कपड़ों की जेबों मेंकोई महकता ख़त देखें तोहँस कर वापस रख देती थींइन उम्रों मेंअब माओं कोजिस्मों में बारूद की बू और लाशों में सिक्के के छेद रुला देते हैंदिल पर ज़ख़्म उठाने वाली उम्र में लड़केकमरे की दीवार के घावबंदूक़ों की तस्वीरों से ढक देने परआमादा कैसे होते हैंफ़तवों की धारें ज़ेहनों कोआख़िर कैसे कुंद करती हैंजन्नत में जो कुछ भी होगाइस दुनिया को कौन जहन्नुम कर देता हैमाओं की गोदों से उठ करमौत की गोद में सोने वालोकुछ तो बोलो
है कोई तो बात जो वो आवाज़ दबाने पे आमादा हैलगा ले जितना दम हो अपना भी मज़बूत इरादा हैकिफ़ायती ता'लीम-ओ-इलाज की हक़दार है अवामरक़म वहाँ से निकाले जिन के पास ज़रूरत से ज़ियादा हैआगे चल कर यही पढ़ने वाले लोग देश को आगे ले जाएँगेये क्या तहज़ीब कि ज़रूरत-मंद को कहते हो हराम-ज़ादा हैकुर्सी पे बैठ के ख़ुद को वज़ीर समझ रहा है वो बद-गुमाँउस को ये बता दो कि वो बिसात का बस एक पियादा है
इन ग़रीबों की मदद पर कोई आमादा नहींएक शाएर है यहाँ लेकिन वो शहज़ादा नहीं
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