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नज़्म
मैं शहीद-ए-जुस्तुजू था यूँ सुख़न-गुस्तर हुआ
ऐ तिरी चश्म-ए-जहाँ-बीं पर वो तूफ़ाँ आश्कार
अल्लामा इक़बाल
नज़्म
हम ने इन आली बिनाओं से किया अक्सर सवाल
आश्कारा जिन से उन के बानियों का है जलाल
अल्ताफ़ हुसैन हाली
नज़्म
मिरा दर्द-ए-निहाँ है आश्कारा मेरी सूरत से
ख़मोशी भी मिरी 'नजमा' फ़ुग़ाँ मालूम होती है
नजमा तसद्दुक़
नज़्म
तू ने फ़ितरत के सबक़ को फिर से दोहराया यहाँ
आश्कारा कर दिए जो राज़ थे अब तक निहाँ
साक़िब कानपुरी
नज़्म
तू ने रम्ज़-ए-क़ल्ब-ए-मख़्फ़ी आश्कारा कर दिए
मा'नी-ए-इल्म-ओ-अमल पर्दा से बे-पर्दा किए
बिलक़ीस जमाल बरेलवी
नज़्म
ब-मुश्ताक़ाँ हदीस-ए-ख़्वाजा-ए-बदरौ हुनैन आवर
तसर्रुफ़-हा-ए-पिन्हानश ब-चश्म-ए-आश्कार आमद
अल्लामा इक़बाल
नज़्म
नूर-ए-फ़ितरत ज़ुल्मत-ए-पैकर का ज़िंदानी नहीं
तंग ऐसा हल्क़ा-ए-अफ़कार-ए-इंसानी नहीं
अल्लामा इक़बाल
नज़्म
ज़माना आया है बे-हिजाबी का आम दीदार-ए-यार होगा
सुकूत था पर्दा-दार जिस का वो राज़ अब आश्कार होगा
अल्लामा इक़बाल
नज़्म
आश्कार उस ने किया जो ज़िंदगी का राज़ था
हिन्द को लेकिन ख़याली फ़ल्सफ़ा पर नाज़ था