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नज़्म
मुझ को कल रात उस की हथेली में मेहंदी लगानी थी
मेहंदी से बेलें बनानी थीं बूटे सजाने थे
अमित गोस्वामी
नज़्म
जैसे कम-‘उम्र हाथों से फिसला हुआ फ़ैसला हो कोई
मुंतशिर सर्द बे-साख़्ता तीरा संगीं अमिट
मुबारक हैदर
नज़्म
चलो इक बार फिर से अजनबी बन जाएँ हम दोनों
न मैं तुम से कोई उम्मीद रखूँ दिल-नवाज़ी की