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नज़्म
गुल करो शमएँ बढ़ा दो मय ओ मीना ओ अयाग़
अपने बे-ख़्वाब किवाड़ों को मुक़फ़्फ़ल कर लो
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
नज़्म
गुमाँ ये है कि शायद बहर से ख़ारिज नहीं हूँ मैं
ज़रा भी हाल के आहंग में हारिज नहीं हूँ
जौन एलिया
नज़्म
अख़्तर शीरानी
नज़्म
जौन एलिया
नज़्म
इस अर्ज़-ए-पाक पर ईमान ये हम-आहंगी
हर आदमी से हर इक ख़्वाब ओ ज़ीस्त से ये लगाव