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नज़्म
इक महल की आड़ से निकला वो पीला माहताब
जैसे मुल्ला का अमामा जैसे बनिए की किताब
असरार-उल-हक़ मजाज़
नज़्म
साक़ी फ़ारुक़ी
नज़्म
क्या बधिया भैंसा बैल शुतुर क्या गौनें पल्ला सर-भारा
क्या गेहूँ चाँवल मोठ मटर क्या आग धुआँ और अँगारा
नज़ीर अकबराबादी
नज़्म
इंसान की क़िस्मत गिरने लगी अजनास के भाव चढ़ने लगे
चौपाल की रौनक़ घुटने लगी भरती के दफ़ातिर बढ़ने लगे
साहिर लुधियानवी
नज़्म
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
नज़्म
कुछ ख़्वाब हैं आज़ाद मगर बढ़ते हुए नूर से मरऊब
ने हौसला-ए-ख़ूब है ने हिम्मत-ए-ना-ख़ूब
नून मीम राशिद
नज़्म
कितने ख़ुशी से बैठे खाते हैं ख़ुश महल में
कितने चले हैं लेने बनिए से क़र्ज़ पल में
नज़ीर अकबराबादी
नज़्म
हल्की टोपी सर पे रखते हैं तो चकराता है सर
और जूते की तरफ़ बढ़िए तो झुक जाता है सर