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नज़्म
देखा तो एक दर में है बैठी वो ख़स्ता-हाल
सकता सा हो गया है ये है शिद्दत-ए-मलाल
चकबस्त बृज नारायण
नज़्म
हर जानिब बे-नूर खड़ी है हिज्र की शहर-पनाह
थक कर हर सू बैठ रही है शौक़ की मांद सिपाह
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
नज़्म
है इम्तिहाँ सर पर खड़ा मेहनत करो मेहनत करो
बाँधो कमर बैठे हो क्या मेहनत करो मेहनत करो
मोहम्मद हुसैन आज़ाद
नज़्म
ऐ मर्द-ए-ख़ुदा तुझ को वो क़ुव्वत नहीं हासिल
जा बैठ किसी ग़ार में अल्लाह को कर याद