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नज़्म
फूल क्या ख़ार भी हैं आज गुलिस्ताँ-ब-कनार
संग-रेज़े हैं निगाहों में गुहर आज की रात
असरार-उल-हक़ मजाज़
नज़्म
बंदर को सेहरा बाँध के हम दूल्हा न बनाएँगे अम्मी
अब घूँघट काढ़ बंदरिया को डोली में बिठाना छोड़ दिया
राजा मेहदी अली ख़ाँ
नज़्म
हज़रत-ए-इक़बाल का इब्लीस-ए-कोचक ख़ौफ़ से
लरज़ा-बर-अंदाम यूँ शैताँ से करता है ख़िताब
वामिक़ जौनपुरी
नज़्म
वो ठोकर जिस से गीती लर्ज़ा-बर-अंदाम रहती है
वो धारा जिस के सीने पर अमल की नाव बहती है
मख़दूम मुहिउद्दीन
नज़्म
लेकिन अब नाचेगा वो ज़ालिम कि जो है बद-लगाम
बाँस के बल पर दिखाए जैसे बंदर अपना काम