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नज़्म
दाम इक छोटे से कूज़े के हैं सौ जाम-ए-बिलूर
मोल लेने जाएँ इक क़तरा तो दें नहर-ओ-क़ुसूर
जोश मलीहाबादी
नज़्म
फ़रेब-ए-बे-ख़ुदी देते हुए बिल्लोर के साग़र
मगर मैं अपनी मंज़िल की तरफ़ बढ़ता ही जाता हूँ
असरार-उल-हक़ मजाज़
नज़्म
सर-बर-आवुर्दा सनोबर की घनी शाख़ों में
चाँद बिल्लोर की टूटी हुई चूड़ी की तरह अटका है
अहमद नदीम क़ासमी
नज़्म
वो जाम-ए-बिलोरीं हैं न वो गौहर-ए-नायाब
वो चिलमनें ज़र-तार न वो बिस्तर-ए-कम-ख़्वाब