aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair
jis ke hote hue hote the zamāne mere
परिणाम "bithaa"
अपने दिल को दोनों आलम से उठा सकता हूँ मैंक्या समझती हो कि तुम को भी भुला सकता हूँ मैंकौन तुम से छीन सकता है मुझे क्या वहम हैख़ुद ज़ुलेख़ा से भी तो दामन बचा सकता हूँ मैंदिल में तुम पैदा करो पहले मिरी सी जुरअतेंऔर फिर देखो कि तुम को क्या बना सकता हूँ मैंदफ़्न कर सकता हूँ सीने में तुम्हारे राज़ कोऔर तुम चाहो तो अफ़्साना बना सकता हूँ मेंमें क़सम खाता हूँ अपने नुत्क़ के ए'जाज़ कीतुम को बज़्म-ए-माह-ओ-अंजुम में बिठा सकता हूँ मैंसर पे रख सकता हूँ ताज-ए-किश्वर-ए-नूरानियाँमहफ़िल-ए-ख़ुर्शीद को नीचा दिखा सकता हूँ मैंमैं बहुत सरकश हूँ लेकिन इक तुम्हारे वास्तेदिल बुझा सकता हूँ मैं आँखें बचा सकता हूँ मैंतुम अगर रूठो तो इक तुम को मनाने के लिएगीत गा सकता हूँ मैं आँसू बहा सकता हूँ मैंजज़्ब है दिल में मिरे दोनों जहाँ का सोज़-ओ-साज़बरबत-ए-फ़ितरत का हर नग़्मा सुना सकता हूँ मैंतुम समझती हो कि हैं पर्दे बहुत से दरमियाँमैं ये कहता हूँ कि हर पर्दा उठा सकता हूँ मैंतुम कि बन सकती हो हर महफ़िल में फ़िरदौस-ए-नज़रमुझ को ये दावा कि हर महफ़िल पे छा सकता हूँ मैंआओ मिल कर इंक़लाब-ए-ताज़ा-तर पैदा करेंदहर पर इस तरह छा जाएँ कि सब देखा करें
मैं ये सोच कर उस के दर से उठा थाकि वो रोक लेगी मना लेगी मुझ कोहवाओं में लहराता आता था दामनकि दामन पकड़ कर बिठा लेगी मुझ कोक़दम ऐसे अंदाज़ से उठ रहे थेकि आवाज़ दे कर बुला लेगी मुझ को
नेट फ़रहाद को शीरीं से मिला देता हैइश्क़ इंसान को गूगल पे बिठा देता है
मैं रूठा हूँ मेरा कांधा छुओफिर मुस्कुराओ और खाने पर बुला लोमुझे डर लग रहा है आजमुझ को अपने बिस्तर पर सुला लोमैं इस मेले में चल कर थक गया हूँअपने काँधे पर बिठा लोक़दम फिर लड़खड़ाते हैंमुझे उँगली दो गिरता हूँ सँभालोमुझे सर-दर्द है सर छू केअपने लम्स की उम्दा दवाई दो
ये जी चाहता है कि तुम एक नन्ही सी लड़की हो और हम तुम्हें गोद में ले के अपनी बिठा लेंयूँही चीख़ो चिल्लाओ हँस दो यूँही हाथ उठाओ हवा में हिलाओ हिला कर गिरा दोकभी ऐसे जैसे कोई बात कहने लगी होकभी ऐसे जैसे न बोलेंगे तुम सेकभी मुस्कुराते हुए शोर करते हुए फिर गले से लिपट कर करो ऐसी बातेंहमें सरसराती हवा याद आएजो गुंजान पेड़ों की शाख़ों से टकराए दिल को अनोखी पहेली बुझाए मगर वो पहेली समझ में न आए
ये भी हिम्मत न हुई पास बिठा के पूछेंदिल ये कहता था कोई दर्द का मारा होगालौट आया है जो आवाज़ न उस की पाईजाने किस दर पे किसे जा के पुकारा होगायाँ तो हर रोज़ की बातें हैं ये जीतें मातेंये भी चाहत के किसी खेल में हारा होगा
'हाफ़िज़' के तरन्नुम को बसा क़ल्ब-ओ-नज़र में'रूमी' के तफ़क्कुर को सजा क़ल्ब-ओ-नज़र में'सादी' के तकल्लुम को बिठा क़ल्ब-ओ-नज़र मेंदे नग़्मा-ए-'ख़य्याम' को जा क़ल्ब-ओ-नज़र में
ये भी हिम्मत न हुई पास बिठा के पूछेंदिल ये कहता था कोई दर्द का मारा होगा
जब चाहा मुझ को एक तवाइफ़ बना दियामक़्सद ही मेरे जन्म का दिल से भुला दियाफूलों की सेज दी कभी मुझ को जला दियासीता बना के शो'लों में मुझ को बिठा दिया
वो गुड्डे मियाँ घर बुलाए गएबिठा कर वो नौशा बनाए गएहथेली पे मेहंदी रचाई गईवो नौशा को अचकन पहनाई गईवो गाँव का माली 'अतीक़' आ गयावो सरसों के फूलों का सहरा बँधाहर इक रस्म से जब फ़राग़त हुईतो मिर्चों के फूलों की बध्धी पड़ीवो हम-जोलियों में लगा क़हक़हामरासन जो बन कर उठीं 'हाशिमा'मरासन भी ढोलक बजाने लगीख़ुशी के तराने सुनाने लगीमरासन को मुँह माँगा हक़ जब मिलाब-मुश्किल मरासन से पीछा छुटा
बिछड़ के तुझ से कई अजनबी दयारों नेमुझे गले से लगाया मुझे तसल्ली दीमुझे बताए शब-ए-तीरा-ओ-सियाह के राज़मिरे बदन को सिखाए हज़ार इस्तिलज़ाज़कुछ इस तरह मिरे पहलू में आए ज़ोहरा-ओ-शम्समैं मुद्दतों यही समझा किया कि जिस्म का लम्सअज़ल से ता-ब-अबद एक ही मसर्रत हैकि सब फ़रेब है मेरा बदन हक़ीक़त हैऔर इस तरह भी हुआ है कि मेरी तन्हाईसमुंदरों से लिपट कर हवा से टकरा करकभी समेट के मुझ को नए जज़ीरों मेंकभी पहाड़ के झरने की तरह बिखरा करकभी बिठा के मुझे आसमाँ के दोश-ब-दोशकभी ज़मीं की तहों में जड़ों में फैला करकुछ इस तरह मिरे एहसास में समाई हैकि मुझ को ज़ात से बाहर निकाल लाई हैकुछ ऐसा ख़्वाब सा ना-ख़्वाबियाँ सी तारी थींबदन तो क्या मुझे परछाइयाँ भी भारी थीं
ये औरत हैइसे तुम सात पर्दों में छुपाओइसे तुम बाँध कर रक्खोये बकरी से ज़्यादा क़ीमती हैकि बकरी दूध देती हैमगर जब काट कर खा लोतो फिर कुछ भी नहीं रहताये औरत है उसे कच्चा चबा लोफिर भी ये ज़िंदा रहेगीऔर तुम्हारे काम आएगीतुम इस के ज़ेहन ओ दिल परऔर इस के जिस्म केएक एक हिस्से परख़ला में पलने वाले ख़ौफ़ कापहरा बिठा दोये माँ हो या बहनबीवी हो महबूबा हो बेटी होतुम्हारी ख़ादिमा हो या तवाइफ़ होतुम्हारे काम आएगी
दीवार पे मज़दूर की तस्वीर सजा करअख़बार के कोने में ख़बर एक लगा करकुछ कार्ड भी मज़दूर के हाथों में उठा करदो-चार ग़रीबों को भी धरती पे बिठा करउन में से किसी एक को स्टेज पर ला करफिर उस की कहानी सभी लोगों को सुना करतक़रीर करा कर तो कभी ताली बजा करमज़दूर को मज़दूर का इरफ़ान दिला करऔर अपने तईं कार-ए-मुक़द्दस को निभा करहर साल ये एहसान जताते हैं बड़े लोगमज़दूर का फिर जश्न मनाते हैं बड़े लोग
सोचता हूँआसमाँ से छीन करजलते हुए सूरज की थालीएक कश्ती की तरहगहरे समुंदर में चलाऊँऔर उस पर सारी दुनिया को बिठा करग़र्क़ कर दूँ
ऐ हिन्द के बाशिंदो आओ उजड़ा गुलज़ार सजा डालेंअब दौर-ए-ग़ुलामी ख़त्म हुआ इक ताज़ा जहाँ की बिना डालेंअब हिन्द की असली ईद हुई जो आज़ादी की दीद हुईपढ़ पढ़ के नमाज़-ए-आज़ादी अब रूठे हुओं को मना डालेंकश्ती भी नई दरिया भी नया साहिल भी नया मल्लाह भी नएअब कर के भरोसा हिम्मत पर तूफ़ान में राह बना डालेंहैं रंज-ओ-ख़ुसूमत इक रोड़ा राह-ए-आज़ादी में अब भीहम रंज पुराने दूर करें बिछड़ों को गले से लगा डालेंजो मुल्क था सोने की चिड़िया बंधन ने उसे पामाल कियाग़ुर्बत को यहाँ से दूर करें फिर दूध की नहरें बना डालेंफिर बोस से योद्धा पैदा हों जो हिन्द की क़िस्मत जाग उठेइक बार ज़माने पर सिक्का फिर मादर-ए-हिन्द बिठा डालेंइस बूढ़े हिमाला पर्बत से फिर नूर का चश्मा-ए-अहल उठेइस मेल-ओ-मुहब्बत के जल से हर बाशी को नहला डालेंये हिन्द की आज़ादी गोया कुल मशरिक़ की आज़ादी हैफिर मशरिक़ मशरिक़ बन जाए जो ज़ुल्म के दौर मिटा डालें'अनवर' की दुआ है ऐ मौला फिर हिन्द की क़िस्मत जाग उठेबिछड़े आपस में मिल जाएँ हम रूठे हुए को मना डालें
आएँ न ‘ऐब मेरे जहाँ से नज़र मुझेमसनद पे ऐसी मुझ को तू मौला बिठा न दे
जमीला शकीला की थी इक सहेलीसहेली भी इक उम्र की साथ खेलीबहुत ही था इख़्लास और प्यार उन मेंहुई थी न झूटों भी तकरार उन मेंथी यूँ तो हर इक खेल से उन को रग़बतमगर सब से बढ़ कर थी गुड़ियों की चाहतजमीला की गुड़िया थी चीनी की मूरतशकीला का गुड्डा भी था ख़ूबसूरतशकीला ने सोचा कि शादी रचाएँजमीला सहेली को समधन बनाएँशकीला बड़े चाव से चल के आईवो गुड्डे की मंगनी का पैग़ाम लाईकई लड़कियाँ और भी साथ आईंजमीला के घर आ के बातें बनाईंइधर की उधर की हुईं ख़ूब बातेंये मंगनी की बातें रहीं चंद रातेंये बात और वो बात और कभी हाँ कभी नाँकई दिन रहीं बी शकीला परेशाँपर आख़िर वो आ ही गई नेक साअ'तन बाक़ी रही कोई झगड़े की सूरतजमीला ने मंज़ूर कर ली ये शादीख़बर सारे बच्चों को इस की सुना दीइजाज़त उन्हों ने बड़ों से भी ले लीफिर अच्छी सी तारीख़ शादी की तय कीक़रीब आए शादी की तक़रीब के दिनतो काटे ये दिन सारे बच्चों ने गिन गिनवो शादी की तारीख़ जिस रोज़ आईमसर्रत ने दुनिया में नौबत बजाईशकीला ने गुड्डे को दूल्हा बनायाउसे एक बढ़िया सा जोड़ा पहनायावो कुर्ता वो अचकन वो पगड़ी वो पटकावो रेशम की शलवार वस्ली का जूतावो मुन्ना सा रूमाल मोज़े टसर केझमकती कला उस के सलमे सितारेजड़ाव अँगूठी वो मोती की मालावो रंगीन जामा वो फूलों का सहराबिठा उस को घोड़े पे वो साथ लाईबरात उस ने गुड्डे की अपनी सजाईचले साथ बन बन के बच्चे बरातीचली पार्टी एक गाती बजातीतड़ातड़ वो ताशों की बाजों की टें-टेंमजीरे की टन टन नफ़ीरी की पें-पेंवो लोगों का चलना पटाख़ों का छुटनाहवा में अनारों के फूलों का लुटनाइसी ठाठ से चल के बारात आईदुल्हन की तरफ़ से हुई पेशवाईजमीला ने सब का क्या ख़ैर मुक़द्दममिले हो के बाहम वो सब शाद-ओ-ख़ुर्रमजहाँ फ़र्श इक चाँदनी का बिछा थाथी मसनद नई गाव तकिया नया थावहाँ मेहमानों को लॉकर बिठायादिए पान और सब को शर्बत पिलायाबुलाए गए शहर से एक क़ाज़ीदुल्हन और दूल्हा हुए दोनों राज़ीज़रा देर में हो गई उन की शादीसभी अहल-ए-महफ़िल ने दिल से दुआ दीछुवारे लुटे फिर बटी कुछ मिठाईमिठाई ये सब ने मज़े ले के खाईहुए शाद मेहमान छोटे बड़े कुलमुबारक सलामत का पस मच गया ग़ुलहुआ वक़्त गुड़िया की रुख़्सत का जिस दमजमीला के चेहरे पे था ग़म का आलमशकीला ने झट पालकी इक मँगाईबिठा उस में गुड़िया को घर अपने लाईहुई ख़ूब शोहरत हुआ ख़ूब ख़र्चारहा शहर में मुद्दतों इस का चर्चाग़रज़ ब्याह गुड्डे का गुड़िया का जैसाहुआ ये हुआ होगा 'नय्यर' न ऐसा
कोई शाम की आहट से पहलेकोई शाम की आहट से पहलेढलती हुई सह-पहर मेंफ़ोन कर के बुलाए मुझेकहीं किसीसरसब्ज़ लॉन में बिठा करअच्छी सी चाय पिलाए मुझेऔरचाय के साथइक महफ़िल जमेकुछ नग़्मे बरसेंकुछ शेर उड़ेंकुछ खट्टी मीठी सीधीमी धीमी सीबातें बनेंऔर बातों बातों मेंथाम कर हाथ मेरावो धीमे से इक सरगोशी करेमुझ से मोहब्बत का दम भरेमैं उलझा उलझा सोचे जाऊँउस पल को सदियाँ सौंपे जाऊँफिर सोच कर कुछ कहूँ उस सेजो कहा हैफिर से दोहराओगेसच कहो मेरे हो जाओगेवो दबा कर निचला लब अपनाभर के आँखों मेंसब कुछ अपनाधीमे से सर हिलाएहौले से मेरा हाथ दबाएऔरमुस्कुरा कर कहेहाँ मुझे तुम से मोहब्बत हैऔर इस इक़रार के बाद अचानक सेकाले बादल घिर कर छाएँठंडी सी पुरवाई चलेऔरआसमान इस इक़रार के सदक़ेहम पेभीगे भीगे फूल बरसाएऔर उस तेज़ बारिश मेंहम दोनोंदूर किसी बाग़ के गोशे मेंभीगे भीगे लिपटे खड़े होंकोई तो ऐसा भी शख़्स आएशाम की आहट से पहलेढलती हुई सह-पहर मेंफ़ोन कर के बुलाए मुझे
मोहर होंटों पेसमाअत पे बिठा लें पहरेऔर आँखों कोकिसी आहनी ताबूत में रख देंकि हमेंज़िंदगी करने की क़ीमत भी चुकानी है यहाँ
चलो घर की तरफ़ चलते हैंबाहर बर्फ़-बारी हैमैं तुम पर नज़्म लिखूँगामोहब्बत लड़कियों को अस्तबल में छोड़ आती हैमैं तुम को बीच खिड़की में बिठा कर नज़्म लिखूँगातुम्हें आता तो होगा दरमियाँ से लौटनामैं लौटने पर नज़्म लिखूँगा
Devoted to the preservation & promotion of Urdu
A Trilingual Treasure of Urdu Words
Online Treasure of Sufi and Sant Poetry
World of Hindi language and literature
The best way to learn Urdu online
Best of Urdu & Hindi Books