आपकी खोज से संबंधित
परिणाम "bodh"
नज़्म के संबंधित परिणाम "bodh"
नज़्म
वो बोध और कृष्न का जा-नशीं हमा-तन अमल हमा-तन यक़ीं
वो तबस्सुम-ए-सहर-आफ़रीं कि चमन लबों से खिला दिया
इक़बाल सुहैल
नज़्म
तआ'रुफ़ रोग हो जाए तो उस का भूलना बेहतर
त'अल्लुक़ बोझ बन जाए तो उस को तोड़ना अच्छा
साहिर लुधियानवी
नज़्म
बढ़ रही हैं गोद फैलाए हुए रुस्वाइयाँ
ऐ ग़म-ए-दिल क्या करूँ ऐ वहशत-ए-दिल क्या करूँ
असरार-उल-हक़ मजाज़
नज़्म
तिरे इल्म ओ मोहब्बत की नहीं है इंतिहा कोई
नहीं है तुझ से बढ़ कर साज़-ए-फ़ितरत में नवा कोई
अल्लामा इक़बाल
नज़्म
बद-हाल घरों की बद-हाली बढ़ते बढ़ते जंजाल बनी
महँगाई बढ़ कर काल बनी सारी बस्ती कंगाल बनी
साहिर लुधियानवी
नज़्म
क्यूँ जी पर बोझ उठाता है इन गौनों भारी भारी के
जब मौत का डेरा आन पड़ा फिर दूने हैं ब्योपारी के
नज़ीर अकबराबादी
नज़्म
मश्रिक-ओ-मग़रिब की क़ौमों के लिए रोज़-ए-हिसाब
इस से बढ़ कर और क्या होगा तबीअ'त का फ़साद
अल्लामा इक़बाल
नज़्म
बुरा मुझ से बढ़ कर न कोई भी होगा ख़ुदाया ख़ुदाया
कभी एक सिसकी कभी इक तबस्सुम कभी सिर्फ़ तेवरी