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नज़्म
शीशा-ए-मह से छलक कर मय-ए-तुंद-ओ-बे-दर्द
उस के माथे से चुरा लेती है सोने की डलक
मुख़्तार सिद्दीक़ी
नज़्म
पहले ही बचना था 'नख़शब' उस बुत-ए-बे-मेहर से
अब भला मर्द-ए-ख़ुदा होता है पछताने से क्या
नख़्शब जार्चवि
नज़्म
जिस की नवा-ए-दिल-सिताँ ज़ख़्मा-ए-साज़-ए-शौक़ थी
कोई बताओ उस बुत-ए-ग़ुंचा-दहन को क्या हुआ
असरार-उल-हक़ मजाज़
नज़्म
था हूर का टुकड़ा बुत-ए-तन्नाज़ का मुखड़ा
इक शम्अ' थी फ़ानूस में जो नूर-फ़िशाँ थी
चंद्रभान कैफ़ी देहल्वी
नज़्म
सरापा नाला-ए-बेदाद-ए-सोज़-ए-ज़िंदगी हो जा
सपंद-आसा गिरह में बाँध रक्खी है सदा तू ने
अल्लामा इक़बाल
नज़्म
बर्क़ बन कर बुत-ए-माज़ी को गिराने दे मुझे
रस्म-ए-कोहना को तह-ए-ख़ाक मिलाने दे मुझे
मख़दूम मुहिउद्दीन
नज़्म
अग़्यार हूँ कहीं बुत-ए-शोरीदा-सर कहीं
सब कुछ हो आह में तो हो अपनी असर कहीं
राज्य बहादुर सकसेना औज
नज़्म
इक निगार-ए-नाज़ की फिरने लगीं आँखें 'मजाज़'
इक बुत-ए-काफ़िर का दिल दर्द-आश्ना होने लगा