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नज़्म
रास्ते में रुक के दम ले लूँ मिरी आदत नहीं
लौट कर वापस चला जाऊँ मिरी फ़ितरत नहीं
असरार-उल-हक़ मजाज़
नज़्म
शराब आँखों से ढल रही है, नज़र से मस्ती उबल रही है
छलक रही है उछल रही है, पिए हुए हैं पिला रहे हैं
जिगर मुरादाबादी
नज़्म
सुनो ये ग़ौर से माएँ बिलक रही हैं कहीं
ये देखो बच्चों की आँखें छलक रही हैं कहीं
शिफ़ा कजगावन्वी
नज़्म
अकबर इलाहाबादी
नज़्म
मिरी जवानी के दिन गुज़रते थे वहश-आलूद इशरतों में
मिरी जवानी के मय-कदों में गुनाह की मय छलक रही थी