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नज़्म
ले जानी अब अपने मन के पैराहन की गिर्हें खोल
ले जानी अब आधी शब है, चार तरफ़ सन्नाटा है
इब्न-ए-इंशा
नज़्म
जब चार निगाहें कर के कोई महव-ए-तबस्सुम होता है
जब कोई मोहब्बत का मारा उस कैफ़ में पड़ कर खोता है
बहज़ाद लखनवी
नज़्म
ये चार-दीवारियाँ ये चादर गली सड़ी लाश को मुबारक
खुली फ़ज़ाओं में बादबाँ खोल कर बढ़ेगा मिरा सफ़ीना