aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair
jis ke hote hue hote the zamāne mere
परिणाम "chehra"
नाम भूले से जो मेरा कहीं आया होगाग़ैर-महसूस तरीक़े से वो चौंका होगाएक जुमले को कई बार सुनाया होगाबात करते हुए सौ बार वो भूला होगाये जो लड़की नई आई है कहीं वो तो नहींउस ने हर चेहरा यही सोच के देखा होगाजान-ए-महफ़िल है मगर आज फ़क़त मेरे बग़ैरहाए किस दर्जा वही बज़्म में तन्हा होगाकभी सन्नाटों से वहशत जो हुई होगी उसेउस ने बे-साख़्ता फिर मुझ को पुकारा होगाचलते चलते कोई मानूस सी आहट पा करदोस्तों को भी किस उज़्र से रोका होगायाद कर के मुझे नम हो गई होंगी पलकें''आँख में पड़ गया कुछ'' कह के ये टाला होगाऔर घबरा के किताबों में जो ली होगी पनाहहर सतर में मिरा चेहरा उभर आया होगाजब मिली होगी उसे मेरी अलालत की ख़बरउस ने आहिस्ता से दीवार को थामा होगासोच कर ये कि बहल जाए परेशानी-ए-दिलयूँही बे-वज्ह किसी शख़्स को रोका होगा!
ये सर्दी ये गर्मी ये बारिश ये धूपये चेहरा ये क़द और ये रंग-रूप
दो पाँव बने हरियाली परएक तितली बैठी डाली परकुछ जगमग जुगनू जंगल सेकुछ झूमते हाथी बादल सेये एक कहानी नींद भरीइक तख़्त पे बैठी एक परीकुछ गिन गिन करते परवानेदो नन्हे नन्हे दस्तानेकुछ उड़ते रंगीं ग़ुबारेबब्बू के दुपट्टे के तारेये चेहरा बन्नो बूढ़ी काये टुकड़ा माँ की चूड़ी काये मुझ से मिलने आए हैंमैं ख़ुद न जिन्हें पहचान सकूँकुछ इतने धुँदले साए हैं
बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुमकभी मैं जो कह दूँ मोहब्बत है तुम सेतो मुझ को ख़ुदा रा ग़लत मत समझनाकि मेरी ज़रूरत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुमहैं फूलों की डाली पे बाँहें तुम्हारीहैं ख़ामोश जादू निगाहें तुम्हारीजो काँटे हूँ सब अपने दामन में रख लूँसजाऊँ मैं कलियों से राहें तुम्हारीनज़र से ज़माने की ख़ुद को बचानाकिसी और से देखो दिल मत लगानाकि मेरी अमानत हो तुमबहुत ख़ूब-सूरत हो तुमहै चेहरा तुम्हारा कि दिन है सुनहराहै चेहरा तुम्हारा कि दिन है सुनहराऔर इस पर ये काली घटाओं का पहरागुलाबों से नाज़ुक महकता बदन हैये लब हैं तुम्हारे कि खिलता चमन हैबिखेरो जो ज़ुल्फ़ें तो शरमाए बादलफ़रिश्ते भी देखें तो हो जाएँ पागलवो पाकीज़ा मूरत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुमजो बन के कली मुस्कुराती है अक्सरशब-ए-हिज्र में जो रुलाती है अक्सरजो लम्हों ही लम्हों में दुनिया बदल देजो शाइ'र को दे जाए पहलू ग़ज़ल केछुपाना जो चाहें छुपाई न जाएभुलाना जो चाहें भुलाई न जाएवो पहली मोहब्बत हो तुम बहुत ख़ूब-सूरत हो तुम
ये किस तरह याद आ रही हो ये ख़्वाब कैसा दिखा रही होकि जैसे सच-मुच निगाह के सामने खड़ी मुस्कुरा रही होये जिस्म-ए-नाज़ुक, ये नर्म बाहें, हसीन गर्दन, सिडौल बाज़ूशगुफ़्ता चेहरा, सलोनी रंगत, घनेरा जूड़ा, सियाह गेसूनशीली आँखें, रसीली चितवन, दराज़ पलकें, महीन अबरूतमाम शोख़ी, तमाम बिजली, तमाम मस्ती, तमाम जादूहज़ारों जादू जगा रही होये ख़्वाब कैसा दिखा रही हो
ये चाँद बीते ज़मानों का आइना होगाभटकते अब्र में चेहरा कोई बना होगा
इबलीसये अनासिर का पुराना खेल ये दुनिया-ए-दूँसाकिनान-ए-अर्श-ए-आज़म की तमन्नाओं का ख़ूँइस की बर्बादी पे आज आमादा है वो कारसाज़जिस ने इस का नाम रखा था जहान-ए-काफ़-अो-नूँमैं ने दिखलाया फ़रंगी को मुलूकियत का ख़्वाबमैं ने तोड़ा मस्जिद-ओ-दैर-ओ-कलीसा का फ़ुसूँमैं ने नादारों को सिखलाया सबक़ तक़दीर कामैं ने मुनइ'म को दिया सरमाया दारी का जुनूँकौन कर सकता है इस की आतिश-ए-सोज़ाँ को सर्दजिस के हंगामों में हो इबलीस का सोज़-ए-दरूँजिस की शाख़ें हों हमारी आबियारी से बुलंदकौन कर सकता है इस नख़्ल-ए-कुहन को सर-निगूँपहला मुशीरइस में क्या शक है कि मोहकम है ये इबलीसी निज़ामपुख़्ता-तर इस से हुए ख़ू-ए-ग़ुलामी में अवामहै अज़ल से इन ग़रीबों के मुक़द्दर में सुजूदइन की फ़ितरत का तक़ाज़ा है नमाज़-ए-बे-क़यामआरज़ू अव्वल तो पैदा हो नहीं सकती कहींहो कहीं पैदा तो मर जाती है या रहती है ख़ामये हमारी सई-ए-पैहम की करामत है कि आजसूफ़ी-ओ-मुल्ला मुलूकिय्यत के बंदे हैं तमामतब-ए-मशरिक़ के लिए मौज़ूँ यही अफ़यून थीवर्ना क़व्वाली से कुछ कम-तर नहीं इल्म-ए-कलामहै तवाफ़-ओ-हज का हंगामा अगर बाक़ी तो क्याकुंद हो कर रह गई मोमिन की तेग़-ए-बे-नियामकिस की नौ-मीदी पे हुज्जत है ये फ़रमान-ए-जदीदहै जिहाद इस दौर में मर्द-ए-मुसलमाँ पर हरामदूसरा मुशीरख़ैर है सुल्तानी-ए-जम्हूर का ग़ौग़ा कि शरतू जहाँ के ताज़ा फ़ित्नों से नहीं है बा-ख़बरपहला मुशीरहूँ मगर मेरी जहाँ-बीनी बताती है मुझेजो मुलूकियत का इक पर्दा हो क्या इस से ख़तरहम ने ख़ुद शाही को पहनाया है जमहूरी लिबासजब ज़रा आदम हुआ है ख़ुद-शनास-ओ-ख़ुद-निगरकारोबार-ए-शहरयारी की हक़ीक़त और हैये वजूद-ए-मीर-ओ-सुल्ताँ पर नहीं है मुनहसिरमज्लिस-ए-मिल्लत हो या परवेज़ का दरबार होहै वो सुल्ताँ ग़ैर की खेती पे हो जिस की नज़रतू ने क्या देखा नहीं मग़रिब का जमहूरी निज़ामचेहरा रौशन अंदरूँ चंगेज़ से तारीक-तरतीसरा मुशीररूह-ए-सुल्तानी रहे बाक़ी तो फिर क्या इज़्तिराबहै मगर क्या इस यहूदी की शरारत का जवाबवो कलीम-ए-बे-तजल्ली वो मसीह-ए-बे-सलीबनीस्त पैग़मबर व-लेकिन दर बग़ल दारद किताबक्या बताऊँ क्या है काफ़िर की निगाह-ए-पर्दा-सोज़मश्रिक-ओ-मग़रिब की क़ौमों के लिए रोज़-ए-हिसाबइस से बढ़ कर और क्या होगा तबीअ'त का फ़सादतोड़ दी बंदों ने आक़ाओं के ख़ेमों की तनाबचौथा मुशीरतोड़ इस का रुमत-उल-कुबरा के ऐवानों में देखआल-ए-सीज़र को दिखाया हम ने फिर सीज़र का ख़्वाबकौन बहर-ए-रुम की मौजों से है लिपटा हुआगाह बालद-चूँ-सनोबर गाह नालद-चूँ-रुबाबतीसरा मुशीरमैं तो इस की आक़िबत-बीनी का कुछ क़ाइल नहींजिस ने अफ़रंगी सियासत को क्या यूँ बे-हिजाबपाँचवाँ मुशीर इबलीस को मुख़ातब कर केऐ तिरे सोज़-ए-नफ़स से कार-ए-आलम उस्तुवारतू ने जब चाहा किया हर पर्दगी को आश्कारआब-ओ-गिल तेरी हरारत से जहान-ए-सोज़-अो-साज़़अब्लह-ए-जन्नत तिरी तालीम से दाना-ए-कारतुझ से बढ़ कर फ़ितरत-ए-आदम का वो महरम नहींसादा-दिल बंदों में जो मशहूर है पर्वरदिगारकाम था जिन का फ़क़त तक़्दीस-ओ-तस्बीह-ओ-तवाफ़तेरी ग़ैरत से अबद तक सर-निगूँ-ओ-शर्मसारगरचे हैं तेरे मुरीद अफ़रंग के साहिर तमामअब मुझे उन की फ़रासत पर नहीं है ए'तिबारवो यहूदी फ़ित्ना-गर वो रूह-ए-मज़दक का बुरूज़हर क़बा होने को है इस के जुनूँ से तार तारज़ाग़ दश्ती हो रहा है हम-सर-ए-शाहीन-अो-चर्ग़कितनी सुरअ'त से बदलता है मिज़ाज-ए-रोज़गारछा गई आशुफ़्ता हो कर वुसअ'त-ए-अफ़्लाक परजिस को नादानी से हम समझे थे इक मुश्त-ए-ग़ुबारफ़ितना-ए-फ़र्दा की हैबत का ये आलम है कि आजकाँपते हैं कोहसार-ओ-मुर्ग़-ज़ार-ओ-जूएबारमेरे आक़ा वो जहाँ ज़ेर-ओ-ज़बर होने को हैजिस जहाँ का है फ़क़त तेरी सियादत पर मदार
सिलसिला-ए-रोज़-ओ-शब नक़्श-गर-ए-हादसातसिलसिला-ए-रोज़-ओ-शब अस्ल-ए-हयात-ओ-ममातसिलसिला-ए-रोज़-ओ-शब तार-ए-हरीर-ए-दो-रंगजिस से बनाती है ज़ात अपनी क़बा-ए-सिफ़ातसिलसिला-ए-रोज़-ओ-शब साज़-ए-अज़ल की फ़ुग़ाँजिस से दिखाती है ज़ात ज़ेर-ओ-बम-ए-मुम्किनाततुझ को परखता है ये मुझ को परखता है येसिलसिला-ए-रोज़-ओ-शब सैरफ़ी-ए-काएनाततू हो अगर कम अयार मैं हूँ अगर कम अयारमौत है तेरी बरात मौत है मेरी बराततेरे शब-ओ-रोज़ की और हक़ीक़त है क्याएक ज़माने की रौ जिस में न दिन है न रातआनी-ओ-फ़ानी तमाम मोजज़ा-हा-ए-हुनरकार-ए-जहाँ बे-सबात कार-ए-जहाँ बे-सबातअव्वल ओ आख़िर फ़ना बातिन ओ ज़ाहिर फ़नानक़्श-ए-कुहन हो कि नौ मंज़िल-ए-आख़िर फ़नाहै मगर इस नक़्श में रंग-ए-सबात-ए-दवामजिस को किया हो किसी मर्द-ए-ख़ुदा ने तमाममर्द-ए-ख़ुदा का अमल इश्क़ से साहब फ़रोग़इश्क़ है अस्ल-ए-हयात मौत है उस पर हरामतुंद ओ सुबुक-सैर है गरचे ज़माने की रौइश्क़ ख़ुद इक सैल है सैल को लेता है थामइश्क़ की तक़्वीम में अस्र-ए-रवाँ के सिवाऔर ज़माने भी हैं जिन का नहीं कोई नामइश्क़ दम-ए-जिब्रईल इश्क़ दिल-ए-मुस्तफ़ाइश्क़ ख़ुदा का रसूल इश्क़ ख़ुदा का कलामइश्क़ की मस्ती से है पैकर-ए-गिल ताबनाकइश्क़ है सहबा-ए-ख़ाम इश्क़ है कास-उल-किरामइश्क़ फ़क़ीह-ए-हराम इश्क़ अमीर-ए-जुनूदइश्क़ है इब्नुस-सबील इस के हज़ारों मक़ामइश्क़ के मिज़राब से नग़्मा-ए-तार-ए-हयातइश्क़ से नूर-ए-हयात इश्क़ से नार-ए-हयातऐ हरम-ए-क़ुर्तुबा इश्क़ से तेरा वजूदइश्क़ सरापा दवाम जिस में नहीं रफ़्त ओ बूदरंग हो या ख़िश्त ओ संग चंग हो या हर्फ़ ओ सौतमोजज़ा-ए-फ़न की है ख़ून-ए-जिगर से नुमूदक़तरा-ए-ख़ून-ए-जिगर सिल को बनाता है दिलख़ून-ए-जिगर से सदा सोज़ ओ सुरूर ओ सुरूदतेरी फ़ज़ा दिल-फ़रोज़ मेरी नवा सीना-सोज़तुझ से दिलों का हुज़ूर मुझ से दिलों की कुशूदअर्श-ए-मोअल्ला से कम सीना-ए-आदम नहींगरचे कफ़-ए-ख़ाक की हद है सिपहर-ए-कबूदपैकर-ए-नूरी को है सज्दा मयस्सर तो क्याउस को मयस्सर नहीं सोज़-ओ-गुदाज़-ए-सजूदकाफ़िर-ए-हिन्दी हूँ मैं देख मिरा ज़ौक़ ओ शौक़दिल में सलात ओ दुरूद लब पे सलात ओ दुरूदशौक़ मिरी लय में है शौक़ मिरी नय में हैनग़्मा-ए-अल्लाह-हू मेरे रग-ओ-पय में हैतेरा जलाल ओ जमाल मर्द-ए-ख़ुदा की दलीलवो भी जलील ओ जमील तू भी जलील ओ जमीलतेरी बिना पाएदार तेरे सुतूँ बे-शुमारशाम के सहरा में हो जैसे हुजूम-ए-नुख़ीलतेरे दर-ओ-बाम पर वादी-ए-ऐमन का नूरतेरा मिनार-ए-बुलंद जल्वा-गह-ए-जिब्रीलमिट नहीं सकता कभी मर्द-ए-मुसलमाँ कि हैउस की अज़ानों से फ़ाश सिर्र-ए-कलीम-ओ-ख़लीलउस की ज़मीं बे-हुदूद उस का उफ़ुक़ बे-सग़ूरउस के समुंदर की मौज दजला ओ दनयूब ओ नीलउस के ज़माने अजीब उस के फ़साने ग़रीबअहद-ए-कुहन को दिया उस ने पयाम-ए-रहीलसाक़ी-ए-रबाब-ए-ज़ौक़ फ़ारस-ए-मैदान-ए-शौक़बादा है उस का रहीक़ तेग़ है उस की असीलमर्द-ए-सिपाही है वो उस की ज़िरह ला-इलाहसाया-ए-शमशीर में उस की पनह ला-इलाहतुझ से हुआ आश्कार बंदा-ए-मोमिन का राज़उस के दिनों की तपिश उस की शबों का गुदाज़उस का मक़ाम-ए-बुलंद उस का ख़याल-ए-अज़ीमउस का सुरूर उस का शौक़ उस का नियाज़ उस का नाज़हाथ है अल्लाह का बंदा-ए-मोमिन का हाथग़ालिब ओ कार-आफ़रीं कार-कुशा कारसाज़ख़ाकी ओ नूरी-निहाद बंदा-ए-मौला-सिफ़ातहर दो-जहाँ से ग़नी उस का दिल-ए-बे-नियाज़उस की उमीदें क़लील उस के मक़ासिद जलीलउस की अदा दिल-फ़रेब उस की निगह दिल-नवाज़आज भी इस देस में आम है चश्म-ए-ग़ज़ालऔर निगाहों के तीर आज भी हैं दिल-नशींबू-ए-यमन आज भी उस की हवाओं में हैरंग-ए-हिजाज़ आज भी उस की नवाओं में हैदीदा-ए-अंजुम में है तेरी ज़मीं आसमाँआह कि सदियों से है तेरी फ़ज़ा बे-अज़ाँकौन सी वादी में है कौन सी मंज़िल में हैइश्क़-ए-बला-ख़ेज़ का क़ाफ़िला-ए-सख़्त-जाँदेख चुका अल्मनी शोरिश-ए-इस्लाह-ए-दींजिस ने न छोड़े कहीं नक़्श-ए-कुहन के निशाँहर्फ़-ए-ग़लत बन गई इस्मत-ए-पीर-ए-कुनिश्तऔर हुई फ़िक्र की कश्ती-ए-नाज़ुक रवाँचश्म-ए-फ़िराँसिस भी देख चुकी इंक़लाबजिस से दिगर-गूँ हुआ मग़रबियों का जहाँमिल्लत-ए-रूमी-निज़ाद कोहना-परस्ती से पीरलज़्ज़त-ए-तज्दीदा से वो भी हुई फिर जवाँरूह-ए-मुसलमाँ में है आज वही इज़्तिराबराज़-ए-ख़ुदाई है ये कह नहीं सकती ज़बाँनर्म दम-ए-गुफ़्तुगू गर्म दम-ए-जुस्तुजूरज़्म हो या बज़्म हो पाक-दिल ओ पाक-बाज़नुक़्ता-ए-परकार-ए-हक़ मर्द-ए-ख़ुदा का यक़ींऔर ये आलम तमाम वहम ओ तिलिस्म ओ मजाज़अक़्ल की मंज़िल है वो इश्क़ का हासिल है वोहल्क़ा-ए-आफ़ाक़ में गर्मी-ए-महफ़िल है वोकाबा-ए-अरबाब-ए-फ़न सतवत-ए-दीन-ए-मुबींतुझ से हरम मर्तबत उंदुलुसियों की ज़मींहै तह-ए-गर्दूं अगर हुस्न में तेरी नज़ीरक़ल्ब-ए-मुसलमाँ में है और नहीं है कहींआह वो मरदान-ए-हक़ वो अरबी शहसवारहामिल-ए-ख़ल्क़-ए-अज़ीम साहब-ए-सिद्क-ओ-यक़ींजिन की हुकूमत से है फ़ाश ये रम्ज़-ए-ग़रीबसल्तनत-ए-अहल-ए-दिल फ़क़्र है शाही नहींजिन की निगाहों ने की तर्बियत-ए-शर्क़-ओ-ग़र्बज़ुल्मत-ए-यूरोप में थी जिन की ख़िरद-राह-बींजिन के लहू के तुफ़ैल आज भी हैं उंदुलुसीख़ुश-दिल ओ गर्म-इख़्तिलात सादा ओ रौशन-जबींदेखिए इस बहर की तह से उछलता है क्यागुम्बद-ए-नीलोफ़री रंग बदलता है क्यावादी-ए-कोह-सार में ग़र्क़-ए-शफ़क़ है सहाबलाल-ए-बदख़्शाँ के ढेर छोड़ गया आफ़्ताबसादा ओ पुर-सोज़ है दुख़्तर-ए-दहक़ाँ का गीतकश्ती-ए-दिल के लिए सैल है अहद-ए-शबाबआब-ए-रवान-ए-कबीर तेरे किनारे कोईदेख रहा है किसी और ज़माने का ख़्वाबआलम-ए-नौ है अभी पर्दा-ए-तक़दीर मेंमेरी निगाहों में है उस की सहर बे-हिजाबपर्दा उठा दूँ अगर चेहरा-ए-अफ़्कार सेला न सकेगा फ़रंग मेरी नवाओं की ताबजिस में न हो इंक़लाब मौत है वो ज़िंदगीरूह-ए-उमम की हयात कश्मकश-ए-इंक़िलाबसूरत-ए-शमशीर है दस्त-ए-क़ज़ा में वो क़ौमकरती है जो हर ज़माँ अपने अमल का हिसाबनक़्श हैं सब ना-तमाम ख़ून-ए-जिगर के बग़ैरनग़्मा है सौदा-ए-ख़ाम ख़ून-ए-जिगर के बग़ैर
मैं दोनों से दूरदरीचे के नज़दीकअपनी हथेली पर अपना चेहरा रखेखिड़की से बाहर का मंज़र देख रही हूँसोच रही हूँगए दिनों में हम भी यूँही हँसते थे
आँखों में भी चितवन में भी चाँद ही चाँद झलकते हैंचाँद ही टीका चाँद ही झूमर चेहरा चाँद और माथा चाँद
गए बरस की ईद का दिन क्या अच्छा थाचाँद को देख के उस का चेहरा देखा थाफ़ज़ा में 'कीट्स' के लहजे की नरमाहट थीमौसम अपने रंग में 'फ़ैज़' का मिस्रा थादुआ के बे-आवाज़ उलूही लम्हों मेंवो लम्हा भी कितना दिलकश लम्हा थाहाथ उठा कर जब आँखों ही आँखों मेंउस ने मुझ को अपने रब से माँगा थाफिर मेरे चेहरे को हाथों में ले करकितने प्यार से मेरा माथा चूमा था!
तुम्हारे हैं कहो इक दिनकहो इक दिनकि जो कुछ भी हमारे पास है सब कुछ तुम्हारा हैकहो इक दिनजिसे तुम चाँद सा कहते हो वो चेहरा तुम्हारा थासितारा सी जिन्हें कहते हो वो आँखें तुम्हारी हैंजिन्हें तुम शाख़ सी कहते हो वो बाँहें तुम्हारी हैंकबूतर तोलते हैं पर तो परवाज़ें तुम्हारी हैंजिन्हें तुम फूल सी कहते हो वो बातें तुम्हारी हैंक़यामत सी जिन्हें कहते हो रफ़्तारें तुम्हारी हैंकहो इक दिनकहो इक दिनकि जो कुछ भी हमारे पास है सब कुछ तुम्हारा हैअगर सब कुछ ये मेरा है तो सब कुछ बख़्श दो इक दिनवजूद अपना मुझे दे दो मोहब्बत बख़्श दो इक दिनमिरे होंटों पे अपने होंट रख कर रूह मेरी खींच लो इक दिन
उस ने इतनी किताबें चाट डालींकि उस की औरत के पैर काग़ज़ की तरह हो गएवो रोज़ काग़ज़ पे अपना चेहरा लिखता और गंदा होताउस की औरत जो ख़ामोशी काढ़े बैठी थीकाग़ज़ों के भूँकने पर सारतर के पास गईतुम रैम्बो और फ़्राइड से भी मिल आए हो क्यासैफ़ू मेरी सैफ़ू मीराबाई की तरह मत बोलोमैं समझ गई अब उस की आँखेंकीट्स की आँखें हुई जाती हैंमैं जो सोहनी का घड़ा उठाए हुए थीअपना नाम लैला बता चुकी थीमैं ने कहालैला मजमे की बातें मेरे सामने मत दोहराया करोतन्हाई भी कोई चीज़ होती हैशेक्सपियर के ड्रामों से चुन चुन कर उस ने ठुमके लगाएमुझे तन्हा देख करसारतर फ़्राइड के कमरे में चला गयावो अपनी थ्योरी से गिर गिर पड़तामैं समझ गई उस की किताब कितनी हैलेकिन बहर हाल सारतर थाऔर कल को मजमे में भी मिलना थामैं ने भीड़ की तरफ़ इशारा किया तो बोलाइतने सारे सार्त्रों से मिल कर तुम्हें क्या करना हैअगर ज़ियादा ज़िद करती हो तो अपने वारिस 'शाह'हीर सय्याल के कमरों में चले चलते हैंसारतर से इस्तिआरा मिलते हीमैं ने एक तन्क़ीदी नशिस्त रक्खीमैं ने आधा कमरा भी बड़ी मुश्किल से हासिल किया थासो पहले आधे फ़्राइड को बुलायाफिर आधे रैम्बो को बुलायाआधी आधी बात पूछनी शुरूअ कीजॉन डन क्या कर रहा हैसैकेंड हैंड शाइरों से नजात चाहता हैचोरों से सख़्त नालाँ हैदाँते इस वक़्त कहाँ हैवो जहन्नम से भी फ़रार हो चुका हैउस को शुबहा थावो ख़्वाजा-सराओं से ज़ियादा देर मुक़ाबला नहीं कर सकताअपने पस-मंज़र मेंएक कुत्ता मुसलसल भूँकने के लिए छोड़ गया हैइस कुत्ते की ख़सलत क्या हैबियातर्चे की याद में भूँक रहा हैतुम्हारा तसव्वुर क्या कहता हैसार्त्रों की तसव्वुर के लिहाज़ सेअब उस का रुख़ गोएटे के घर की तरफ़ हो गया है
क्या हिन्द का ज़िंदाँ काँप रहा है गूँज रही हैं तक्बीरेंउकताए हैं शायद कुछ क़ैदी और तोड़ रहे हैं ज़ंजीरेंदीवारों के नीचे आ आ कर यूँ जम्अ हुए हैं ज़िंदानीसीनों में तलातुम बिजली का आँखों में झलकती शमशीरेंभूखों की नज़र में बिजली है तोपों के दहाने ठंडे हैंतक़दीर के लब को जुम्बिश है दम तोड़ रही हैं तदबीरेंआँखों में गदा की सुर्ख़ी है बे-नूर है चेहरा सुल्ताँ कातख़रीब ने परचम खोला है सज्दे में पड़ी हैं तामीरेंक्या उन को ख़बर थी ज़ेर-ओ-ज़बर रखते थे जो रूह-ए-मिल्लत कोउबलेंगे ज़मीं से मार-ए-सियह बरसेंगी फ़लक से शमशीरेंक्या उन को ख़बर थी सीनों से जो ख़ून चुराया करते थेइक रोज़ इसी बे-रंगी से झलकेंगी हज़ारों तस्वीरेंक्या उन को ख़बर थी होंटों पर जो क़ुफ़्ल लगाया करते थेइक रोज़ इसी ख़ामोशी से टपकेंगी दहकती तक़रीरेंसंभलों कि वो ज़िंदाँ गूँज उठा झपटो कि वो क़ैदी छूट गएउट्ठो कि वो बैठीं दीवारें दौड़ो कि वो टूटी ज़ंजीरें
मुद्दतें बीत गईंतुम नहीं आईं अब तकरोज़ सूरज के बयाबाँ मेंभटकती है हयातचाँद के ग़ार मेंथक-हार के सो जाती है रातफूल कुछ देर महकता हैबिखर जाता हैहर नशालहर बनाने में उतर जाता हैवक़्त!बे-चेहरा हवाओं सा गुज़र जाता हैकिसी आवाज़ के सब्ज़े में लहक जैसी तुमकिसी ख़ामोश तबस्सुम में चमक जैसी तुमकिसी चेहरे में महकती हुई आँखों जैसीकहीं अबरू कहीं गेसू कहीं बाँहों जैसीचाँद सेफूल तलकयूँ तो तुम्हीं तुम हो मगरतुम कोई चेहरा कोई जिस्म कोई नाम नहींतुम जहाँ भी होअधूरी हो हक़ीक़त की तरहतुम कोई ख़्वाब नहीं होजो मुकम्मल होगी
जहाँ-ज़ाद कैसे हज़ारों बरस बादइक शहर-ए-मदफ़ून की हर गली मेंमेरे जाम ओ मीना ओ गुल-दाँ के रेज़े मिले हैंकि जैसे वो इस शहर-ए-बर्बाद का हाफ़िज़ा होंहसन नाम का इक जवाँ कूज़ा-गर इक नए शहर मेंअपने कूज़े बनाता हुआ इश्क़ करता हुआअपने माज़ी के तारों में हम से पिरोया गया हैहमीं में कि जैसे हमीं हों समोया गया हैकि हम तुम वो बारिश के क़तरे थे जो रात भर सेहज़ारों बरस रेंगती रात भरइक दरीचे के शीशों पे गिरते हुए साँप लहरेंबनाते रहे हैंऔर अब इस जगह वक़्त की सुब्ह होने से पहलेये हम और ये नौजवाँ कूज़ा-गरएक रूया में फिर से पिरोए गए हैंजहाँ-ज़ादये कैसा कोहना-परस्तों का अम्बोहकूज़ों की लाशों में उतरा हैदेखोये वो लोग हैं जिन की आँखेंकभी जाम ओ मीना की लिम तक न पहुँचींयही आज इस रंग ओ रोग़न की मख़्लूक़-ए-बे-जाँको फिर से उलटने पलटने लगे हैंये उन के तले ग़म की चिंगारियाँ पा सकेंगेजो तारीख़ को खा गई थींवो तूफ़ान वो आँधियाँ पा सकेंगेजो हर चीख़ को खा गई थींउन्हें क्या ख़बर किस धनक से मेरे रंग आएमेरे और इस नौजवाँ कूज़ा-गर केउन्हें क्या ख़बर कौन सी तितलियों के परों सेउन्हें क्या ख़बर कौन से हुस्न सेकौन सी ज़ात से किस ख़द्द-ओ-ख़ाल सेमैं ने कूजों के चेहरे उतारेये सब लोग अपने असीरों में हैंज़माना जहाँ-ज़ाद अफ़्सूँ-ज़दा बुर्ज हैऔर ये लोग उस के असीरों में हैंजवाँ कूज़ा-गर हँस रहा हैये मासूम वहशी कि अपने ही क़ामत से ज़ोलीदा-दामनहैं जूया किसी अज़्मत-ए-ना-रसा केउन्हें क्या ख़बर कैसा आसेब-ए-मुबरम मेरे ग़ार सीने पे थाजिस ने मुझ से और उस कूज़ा-गर से कहाऐ हसन कूज़ा-गर जागदर्द-ए-रिसालत का रोज़-ए-बशारत तिरे जाम ओ मीनाकी तिश्ना-लबी तक पहुँचने लगा हैयही वो निदा के पीछे हसन नाम काये जवाँ कूज़ा-गर भीप्यापे रवाँ है ज़माँ से ज़माँ तकख़िज़ाँ से ख़िज़ाँ तक
कभी तस्वीर से बाहर निकल कर बोल भी उट्ठोहमेशा एक सा चेहरा लिए क्यूँ तकते रहते होज़रा होंटों को जुम्बिश और लफ़्ज़ों को रिहाई दोअकेला पड़ गया हूँ मैं ज़रा मेरी सफ़ाई दो
होता है मह-वशों का वो आलम तिरे हुज़ूरजैसे चराग़-ए-मुर्दा सर-ए-बज़्म-ए-शम-ए-तूरआ कर तिरी जनाब में ऐ कार-साज़-ए-नूरपलकों में मुँह छुपाते हैं झेंपे हुए ग़ुरूरआती है एक लहर सी चेहरों पर आह कीआँखों में छूट जाती हैं नब्ज़ें निगाह की
मिरे ख़ुदाया मैं ज़िंदगी के अज़ाब लिक्खूँ कि ख़्वाब लिक्खूँये मेरा चेहरा ये मेरी आँखेंबुझे हुए से चराग़ जैसेजो फिर से चलने के मुंतज़िर होंवो चाँद-चेहरा सितारा-आँखेंवो मेहरबाँ साया-दार ज़ुल्फ़ेंजिन्हों ने पैमाँ किए थे मुझ सेरफ़ाक़तों के मोहब्बतों केकहा था मुझ से कि ऐ मुसाफ़िर रह-ए-वफ़ा केजहाँ भी जाएगा हम भी आएँगे साथ तेरेबनेंगे रातों में चाँदनी हम तो दिन में साए बिखेर देंगेवो चाँद-चेहरा सितारा-आँखेंवो मेहरबाँ साया-दार ज़ुल्फ़ेंवो अपने पैमाँ रफ़ाक़तों के मोहब्बतों केशिकस्त कर केन जाने अब किस की रहगुज़र का मनारा-ए-रौशनी हुए हैंमगर मुसाफ़िर को क्या ख़बर हैवो चाँद-चेहरा तो बुझ गया हैसितारा-आँखें तो सो गई हैंवो ज़ुल्फ़ें बे-साया हो गई हैंवो रौशनी और वो साए मिरी अता थेसो मेरी राहों में आज भी हैंकि मैं मुसाफ़िर रह-ए-वफ़ा कावो चाँद-चेहरा सितारा-आँखेंवो मेहरबाँ साया-दार ज़ुल्फ़ेंहज़ारों चेहरों हज़ारों आँखोंहज़ारों ज़ुल्फ़ों का एक सैलाब-ए-तुंद ले करमिरे तआक़ुब में आ रहे हैंहर एक चेहरा है चाँद-चेहराहैं सारी आँखें सितारा-आँखेंतमाम हैंमेहरबाँ साया-दार ज़ुल्फ़ेंमैं किस को चाहूँ मैं किस को चूमूँमैं किस के साए में बैठ जाऊँबचूँ कि तूफ़ाँ में डूब जाऊँन मेरा चेहरा न मेरी आँखेंमिरे ख़ुदाया मैं ज़िंदगी के अज़ाब लिक्खूँ कि ख़्वाब लिक्खूँ
आँख खुल गई मेरीहो गया मैं फिर ज़िंदापेट के अंधेरों सेज़ेहन के धुँदलकों तकएक साँप के जैसारेंगता ख़याल आयाआज तीसरा दिन है...... आज तीसरा दिन हैइक अजीब ख़ामोशीमुंजमिद है कमरे मेंएक फ़र्श और इक छतऔर चार दीवारेंमुझ से बे-तअल्लुक़ सबसब मिरे तमाशाईसामने की खिड़की सेतेज़ धूप की किरनेंआ रही हैं बिस्तर परचुभ रही हैं चेहरे मेंइस क़दर नुकीली हैंजैसे रिश्ते-दारों केतंज़ मेरी ग़ुर्बत परआँख खुल गई मेरीआज खोखला हूँ मैंसिर्फ़ ख़ोल बाक़ी हैआज मेरे बिस्तर मेंलेटा है मिरा ढाँचाअपनी मुर्दा आँखों सेदेखता है कमरे कोआज तीसरा दिन हैआज तीसरा दिन है
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