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नज़्म
पहलू-ए-ख़ातून-ए-मशरिक़ में ब-सद तमकीन ओ नाज़
मुंतक़िल हो जा उलूहियत के सीने के गुदाज़
जोश मलीहाबादी
नज़्म
उरूक़-मुर्दा-ए-मशरिक़ में ख़ून-ए-ज़िंदगी दौड़ा
समझ सकते नहीं इस राज़ को सीना ओ फ़ाराबी
अल्लामा इक़बाल
नज़्म
मुश्तइल, बे-बाक मज़दूरों का सैलाब-ए-अज़ीम!
अर्ज़-ए-मश्रिक, एक मुबहम ख़ौफ़ से लर्ज़ां हूँ मैं
नून मीम राशिद
नज़्म
सियह-मस्ती की देता हूँ सला रिंदान-ए-मशरिक़ को
ख़ुमिस्तान-ए-अरब के नश्शे में हो कर मैं चूर आया
ज़फ़र अली ख़ाँ
नज़्म
ज़ह्न-ए-मशरिक़ पे वही ख़्वाब-ए-गिराँ आज भी है
चश्म-ए-मग़रिब ब-हिक़ारत निगराँ आज भी है
मुस्लिम शमीम
नज़्म
जैसे पेशानी-ए-मशरिक़ पे हो सुब्ह-ए-काज़िब
जैसे तारीक ख़लाओं में शहाब-ए-साक़िब
मसूद मैकश मुरादाबादी
नज़्म
डूबता सूरज वो चढ़ती धूप वो दिलकश समाँ
सुर्ख़ी-ए-मशरिक़ से वो उठता हुआ शब का धुआँ
सयय्द महमूद हसन क़ैसर अमरोही
नज़्म
हिन्द के बाँके सिपाही अज़्म के कोह-ए-गिराँ
ज़िंदाबाद ऐ फ़ख़्र-ए-मशरिक़ नाज़िश-ए-हिन्दोस्ताँ