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नज़्म
वो माँ कि सीने से जिस के कभी चिमट न सका
हुमक के गोद में जिस की कभी मैं चढ़ न सका
फ़िराक़ गोरखपुरी
नज़्म
सलाख़ों से चिमट कर जो खड़े हैं पाएदानों पर
हैं उन की ख़ाना-बरबादी के क़िस्से आसमानों पर
असद जाफ़री
नज़्म
माथे पर इन शोरीदा जश्नों की मोहरें सब्त हुई हैं
कड़वे ज़ाइक़े जोंकें बन कर तालू से अब चिमट गए हैं
तबस्सुम काश्मीरी
नज़्म
ये चमन-ज़ार ये जमुना का किनारा ये महल
ये मुनक़्क़श दर ओ दीवार ये मेहराब ये ताक़