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नज़्म
अकबर इलाहाबादी
नज़्म
चुस्त नुकीला ब्रज़िअर ये चीख़ रहा है
शर्म नहीं आती कुत्तों को चर्च के आगे खड़े हुए हैं
अज़ीज़ क़ैसी
नज़्म
छिड़ गई है जो कभी पैरहन-ए-चुस्त की बात
फिर गई है मिरी आँखों में शगूफ़े की ज़ात
नियाज़ गुलबर्गवी
नज़्म
चुस्त क़बा का ये 'आलम है तन का इक इक तिल है नुमायाँ
'उर्यां 'उर्यां बाहें जैसे लचकीली शाख़ें संदल की
कामिल चाँदपुरी
नज़्म
जो मरहलों में साथ थे वो मंज़िलों पे छुट गए
जो रात में लुटे न थे वो दोपहर में लुट गए