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नज़्म
तकते तकते गोया एक हयूला सा बन जाती थी
समपर दायाँ पाँव ज़मीं पर मार के वो रुक जाती थी
ख़ातिर ग़ज़नवी
नज़्म
मैं और डायन साँप और बिच्छू सब कुछ उस में डूब रहे थे
लेकिन ऊँट वो प्यासा मेरा हम से डर कर भाग गया
अली अकबर नातिक़
नज़्म
अज़ीज़ क़ैसी
नज़्म
हाथ में ख़ंजर निगाहों में लिए कुछ मसअले
हर बशर पर ख़ंदा-ज़न ये कोई डायन है कि रात