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नज़्म
दफ़्तर-ए-हस्ती में थी ज़र्रीं वरक़ तेरी हयात
थी सरापा दीन ओ दुनिया का सबक़ तेरी हयात
अल्लामा इक़बाल
नज़्म
और दाएँ पहलू में इक मंज़िल का है मकाँ वो ख़ाली है
और बाएँ जानिब इक अय्याश है जिस के हाँ इक दाश्ता है
मीराजी
नज़्म
इक दफ़्तर-ए-मज़ालिम-ए-चर्ख़-ए-कुहन खुला
वा था दहान-ए-ज़ख़्म कि बाब-ए-सुख़न खुला
चकबस्त बृज नारायण
नज़्म
यादों के बे-म'अनी दफ़्तर ख़्वाबों के अफ़्सुर्दा शहाब
सब के सब ख़ामोश ज़बाँ से कहते हैं ऐ ख़ाना-ख़राब
अख़्तरुल ईमान
नज़्म
मैं कितना अपने दफ़्तर में हूँ कितना घर की ख़ल्वत में
वो मुझ को मुझ पे ही तक़्सीम कर के देखती होगी
अब्बास ताबिश
नज़्म
मिस्र ओ बाबुल मिट गए बाक़ी निशाँ तक भी नहीं
दफ़्तर-ए-हस्ती में उन की दास्ताँ तक भी नहीं
अल्लामा इक़बाल
नज़्म
पलटे हैं जिस ने दहर के दफ़्तर वो क़ौम है
पैदा किए हैं जिस ने पयम्बर वो क़ौम है