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नज़्म
वादियों में तू, बयाबानों में तू, बस्ती में तू
रौनक़-ए-हर-महफ़िल ओ ज़ीनत-दह-ए-हर-अंजुमन
मुईन अहसन जज़्बी
नज़्म
पयाम-ए-ज़िंदगी कुछ हौसला-सामाँ भी होता हो
बहार-ए-ज़िंदगी ग़ैरत-दह-ए-जन्नत तो हो लेकिन
सलाम मछली शहरी
नज़्म
तेरा ग़म है तो ग़म-ए-दहर का झगड़ा क्या है
तेरी सूरत से है आलम में बहारों को सबात
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
नज़्म
जिस की उल्फ़त में भुला रक्खी थी दुनिया हम ने
दहर को दहर का अफ़्साना बना रक्खा था
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
नज़्म
सीना-ए-दहर के नासूर हैं कोहना नासूर
जज़्ब है उन में तिरे और मिरे अज्दाद का ख़ूँ
साहिर लुधियानवी
नज़्म
तुम्हें बहका न पाए और बैरूनी न कर डाले
मैं सारी ज़िंदगी के दुख भुगत कर तुम से कहता हूँ