aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair
jis ke hote hue hote the zamāne mere
परिणाम "dandaan"
एक शब हल्की सी जुम्बिश मुझे महसूस हुईमैं ये समझा मिरे शानों को हिलाता है कोईआँख उठाई तो ये देखा कि ज़मीं हिलती हैजिस जगह शय कोई रक्खी है वहीं हिलती हैसहन-ओ-दीवार की जुम्बिश है तो दर हिलते हैंबाहर आया तो ये देखा कि शजर हिलते हैंकोई शय जुम्बिश-ए-पैहम से नहीं है महरूमएक ताक़त है पस-ए-पर्दा मगर ना-मालूमचंद लम्हे भी ये नैरंगी-ए-आलम न रहीज़लज़ला ख़त्म हुआ जुम्बिश-ए-पैहम न रहीहैरत-ए-दीद से अंगुश्त-ब-दंदाँ था मैंशाहिद-ए-जल्वा-ए-क़हहारी-ए-यज़्दाँ था मैंदफ़अतन एक सदा आह-ओ-फ़ुग़ाँ की आईमेरे अल्लाह ये घड़ी किस पे मुसीबत लाईगुल किया ज़लज़ला-ए-क़हर ने किस घर का चराग़किस पे ढाया ये सितम किस को दिया हिज्र का दाग़जा के नज़दीक ये नज़्ज़ारा-ए-हिरमाँ देखाएक हसीना को ब-सद हाल-ए-परेशाँ देखाबैज़वी शक्ल में थे हुस्न के जल्वे पिन्हाँआँख में सेहर भरा था मगर आँसू थे रवाँमैं ने घबरा के ये पूछा कि ये हालत क्यूँ हैतेरी हस्ती हदफ़-ए-रंज-ओ-मुसीबत क्यूँ हैबोली ऐ शाएर-ए-रंगीन-तबीअत मत पूछरोज़-ओ-शब दिल पे गुज़रती है क़यामत मत पूछलोग दुनिया को तिरी मुझ को ज़मीं कहते हैंअहल-ए-ज़र मुझ को मोहब्बत में हसीं कहते हैंमैं उन्हीं हुस्न-परस्तों की हूँ तड़पाई हुईतुझ से कहने को ये राज़ आई हूँ घबराई हुईज़र-परस्तों से हैं बद-दिल मिरी दुनिया के ग़रीबहैं गिरफ़्तार-ए-सलासिल मिरी दुनिया के ग़रीबमुझ से ये ताज़ा बलाएँ नहीं देखी जातीज़ालिमों की ये जफ़ाएँ नहीं देखी जातींचाहती हूँ मिरे उश्शाक़ में कुछ फ़र्क़ न होमुफ़्त में कश्ती-ए-एहसास-ए-वफ़ा ग़र्क़ न होएक वो जिस को मयस्सर हों इमारात-ओ-नक़ीबएक वो जिस को न हो फूँस का छप्पर भी नसीबसाहब-ए-दौलत-ओ-ज़ी-रुत्बा-ओ-ज़रदार हो एकबे-नवा ग़म-ज़दा-ओ-बेकस-ओ-लाचार हो एकएक मुख़्तार हो, औरंग-ए-जहाँबानी काइक मुरक़्क़ा हो ग़म-ओ-रंज-ओ-परेशानी कासख़्त नफ़रत है मुझे अपने परस्तारों सेछीन लेते हैं मुझे मेरे तलब-गारों सेचीरा-दस्ती का मिटा देती हैं सब जाह-ओ-जलालहैफ़-सद-हैफ़ कि हाइल है ग़रीबों का ख़यालये न होते तो दिखाती मैं क़यामत का समाँये न होते तो मिटाती मैं ग़ुरूर-ए-इंसाँएक करवट में बदल देती निज़ाम-ए-आलमइक इशारे ही में हो जाती है ये महफ़िल बरहमइक तबस्सुम से जहाँ बर्क़-ब-दामाँ होतान ये आराइशें होतीं न ये सामाँ होताहर अदा पूछती सरमाया-परस्तों के मिज़ाजकुछ तो फ़रमाइए हज़रत कि हैं किस हाल में आजलख-पति संख-पती बे-सर-ओ-सामाँ होतेजान बच जाए बस इस बात के ख़्वाहाँ होतेबरसर-ए-ख़ाक नज़र आते हैं क़स्र-ओ-ऐवाँअश्क-ए-ख़ूनीं से मिरे और भी उठते तूफ़ाँमेरी आग़ोश में सब अहल-ए-सितम आ जातेमेरे बरताव से बस नाक में दम आ जातेबाज़ के मुँह ग़म-ए-आलाम से काले करतीबाज़ को मौत की देवी के हवाले करतीख़ून-ए-ज़रदार ही मज़दूर की मज़दूरी हैमैं जो ख़ामोश हूँ ये बाइस-ए-मजबूरी हैमेरी आग़ोश में जाबिर भी हैं मजबूर भी हैंमेरे दामन ही से वाबस्ता ये मज़दूर भी हैंज़ब्त करती हूँ जो ग़म आता है सह जाती हूँजोश आता है मगर काँप के रह जाती हूँ
मैं ने क्या सोच के सहरा में दुकाँ खोली हैलब-ए-लालीं के तसव्वुर में मंगाए याक़ूतनज्म लाया हूँ कि तरतीब हो सिल्क-ए-दंदाँमह-ए-यक-रू भी तो दरकार है अबरू के लिएदूर उफ़ुक़ पार से थोड़ी सी शफ़क़ लाया हूँख़ून में गूँध के भट्टी में तपाऊँगा उसेतब कहीं सुर्ख़ी-ए-रुख़्सार हुवैदा होगीमैं ने तय्यार किया ख़ाक-ए-कवाकिब से ख़मीर
सिगरेट ने ये इक पान के बीड़े से कहातू हमेशा से परी-रूयों के झुरमुट में रहाकौन सी ऐसी हैं ख़िदमात तिरी बेश-बहाख़ूँ-बहा क्यूँ लब-ओ-दंदान-ए-हसीनाँ से लियातुझ में क्या ल'अल लगे हैं कि तू इतराता हैबे-हिजाबाना हर इक बज़्म में आ जाता है
मुस्लिम से तनफ़्फ़ुर और कुफ़्फ़ार से यारानाआख़िर ये क़ला-बाज़ी क्यूँ खा गए मौलानालक्ष्मी की मोहब्बत ने दिल मोह लिया इतनामुँह मोड़ के का'बे से पहुँचे सू-ए-बुत-ख़ानाइस्लाम तअ'ज्जुब से अंगुश्त ब-दंदाँ हैमरघट में जले शम्अ' तौहीद का परवानाथाली में सियासत की बैंगन की तरह लुंढकेऔर इस को समझते हैं इक चाल हरीफ़ानापब्लिक के फँसाने को सब जाल के फंदे थेये देश ये अमामा और सुब्हा-ए-सद-दाना
कभी ये भी ख़्वाहिश परेशान करती है मुझ कोकि मैं अपने भीतर के मैं को निकालूँमगर मेरे मैं की तो सूरत बहुत ही बुरी हैख़बासत का अम्बार जिस में निहाँ हैसराफ़ा से जिस की कराहत अयाँ हैजबीं पर ख़तरनाक सोचों के जंगल उगे हैंभयानक इरादों के वहशी छुपे हैंनिगाहों में जिस की हवसनाकियों के मनाज़िर भरे हैंमनाज़िर भी ऐसे कि जिन मेंज़िना ऐसे लोगों के हमराह करने को सोचा गया हैबदन जिन के जिंसी बुलूग़त को पहुँचे नहीं हैंया वो जो बुलूग़त की सारी कशिश खो चुके हैंया वो जिन से कोई मुक़द्दस सा रिश्ता जुड़ा हैमिरे मैं की सूरत बुरी हैकि दंदाँ दरिंदों की सूरतकिसी सहमे सिमटे कुँवारे बदन में गड़े हैंकि मातम-कदे में भी आँखें किसी जिस्म की बुर्जियों पर टिकी हैंकि बीवी बग़ल में मगर ज़ेहन में और ही कोई तन-मन खिला हैकि पगली भिकारन के तन और अंधे भिकारी के कश्कोल पर भी नज़र हैबुरी है बहुत ही बुरी हैकि दिल में अइज़्ज़ा की अम्वात की ख़्वाहिशें भी दबी हैंकई बे-गुनह गर्दनें उँगलियों में फँसी हैंकि लफ़्ज़-ए-अयादत में बीमार की मौत की भी दुआ हैबुरी है बुरी हैकि अहबाब की जीत पर दिल दुखी हैकि औलाद की बरतरी से चुभन हैकि भाई के रौशन जहाँ से जबीं पर शिकन हैबुरी है बुरी हैकि जो पालता है उसी की नफ़ी हैकि जो पूजता है उसी से दग़ा हैअजब ऊबड़-खाबड़ सी मैं की ज़मीं हैकि उस में कहीं भी तवाज़ुन नहीं हैकिसी भी तरह का तनासुब नहीं हैजहाँ चाहिए हौसला बुज़दिली हैजहाँ रास्ती की ज़रूरत कजी हैजहाँ चाहिए अमन ग़ारत-गरी हैजहाँ चाहिए क़ुर्ब वाँ फ़ासला हैजहाँ सुल्ह-ए-कुल चाहिए गर्मियाँ सर्दियाँ हैंअगर मेरे मैं की ये सूरत मिरे ख़ोल की बाहर सत्ह पर आ गईतो ज़माना मुझे क्या कहेगायही सोच कर अपनी इस आरज़ू के बदन मेंतबर भौंक देता हूँ अक्सरमगर ये तमन्नाकि मैं अपने भीतर के मैं को निकालूँमिरे दिल में रह रह के क्यूँ जागती हैसबब उस का ये तो नहीं हैकि मैं अपने अंदर की शफ़्फ़ाफ़ मकरूह सूरत दिखा करज़माने की आँखों में ख़ुद को बड़ा देखना चाहता हूँया ये कि मुसलसल शराफ़त के नाटक से तंग आ चुका हूँया फिर ये कि अबबाहरी शक्ल-ओ-सूरत में मेरीकशिश कोईबाक़ीनहीं है
आह ऐ शबनम के क़तरे तेरी हालत देख करपानी हो हो कर बहे जाते हैं मेरे दिल जिगरउम्र कम को साथ ऐ नादान क्यों लाया है तूएक शब के वास्ते दुनिया में क्या आया है तूहाए मिल जाएँगे सब अरमान तेरे ख़ाक मेंसुब्ह अब नज़दीक है सूरज है तेरी ताक मेंबे-सबाती और फिर ऐसी हज़ार अफ़्सोस हैज़िंदगी-ए-मुख़्तसर पर लाख बार अफ़्सोस हैदेख कर तुझ को निकल आए ये आँसू किस लिएचल गया दिल पर हमारे तेरा जादू किस लिएआब-दारी में है बढ़-चढ़ कर दुर-ए-ग़लताँ से तूक्या मुशाबह है किसी के गौहर-ए-दंदाँ से तूया पसीना है किसी माशूक़ के रुख़्सार काया कोई क़तरा है दूद-ए-आह-ए-आतिश-बार कातुझ में ये दिल-बस्तगी आई कहाँ से क्या है तूबाग़ में जा कर जो देखो हुस्न का दरिया है तूगोद में लेते हैं तुझ को जान तू फूलों की हैतेरे दम से तेरे बाइ'स आबरू फूलों की हैज़र्द पत्ता हो गया था रो-ए-पुर-अनवार-ए-गुलशर्म रख ली तू ने बन कर ग़ाज़ा-ए-रुख़्सार-ए-गुललैला-ए-शब बाग़ में आती है दिन को टाल करमोतियों का तेरे हार अपने गले में डाल करफूल पत्ते सब्ज़ा-ए-ख़्वाबीदा की तू जान हैआब-दारी तुझ पे सदक़े ताज़गी क़ुर्बान हैपलती है हर इक कली तेरी बग़ल में रात भररहती बस्ती है तिरे मोती-महल में रात भरअल-ग़रज़ बालीदगी पौदों की तेरा काम हैचश्मा-ए-आब-ए-ख़िज़र तेरी तरी का नाम हैसारी रौनक़ गुलशन-ए-आलम की तेरे दम से हैताज़गी-ए-सब्ज़ा-ओ-गुल क़तरा-ए-शबनम से है
ज़िंदगी फिर भी परेशाँ सी नज़र आती हैअज़्मत-ए-हुस्न पशेमाँ सी नज़र आती हैदेख कर ख़ल्वत-ए-हस्ती की ख़मोशी यारोमौत अंगुश्त-ब-दंदाँ सी नज़र आती हैशिद्दत-ए-दर्द का एहसास सिवा है अब भीशम-ए-ग़म और फ़रोज़ाँ सी नज़र आती हैग़ाज़ा-ए-गुल लिए रुख़्सार-ए-ख़िज़ाँ आज भी हैअंदलीबों का वही तर्ज़-ए-फ़ुग़ाँ आज भी हैशम्अ-ए-बे-नूर यक़ीं ता-ब-सहर जलती हैज़ीस्त शर्मिंदा-ए-साहब-नज़राँ आज भी हैज़ह्न-ए-मशरिक़ पे वही ख़्वाब-ए-गिराँ आज भी हैचश्म-ए-मग़रिब ब-हिक़ारत निगराँ आज भी है
फ़िक्र की दौड़ मेंतुम दूर निकल आए होअपनी मंज़िल को बहुत पीछे ही छोड़ आए होकहीं ऐसा न होकल तुम कोपलटना पड़े मंज़िल की तरफ़और फिरताब-ओ-तवाँ साथ न देहुस्न-ए-बयाँ साथ न देख़ामा अंगुश्त-ब-दंदाँ रह जाएउँगलियाँ साकित-ओ-जामिद हो जाएँपाँव थर्राने लगेंऔर मंज़िल तो कुजानक़्श-ए-कफ़-ए-पा न मिले
ऐ ज़मींनाज़नीं माह-जबींऐ मरी गुलफ़ाम परीतेरा हुस्न-ओ-शबाब क्या कहनाजिस्म तेरा है जैसे ताज-महलतेरा चेहरा शफ़क़ की लाली हैतेरी आँखें हैं चाँद और सूरजतेरे अबरू हैं मिस्ल-ए-क़ौस-ओ-क़ुज़हशाख़-ए-संदल हैं मरमरीं बाहेंतेरे दंदाँ दमकते मोती हैंतेरी पेशानी पे दमकता हुआकाहकशाँ का झूमरलब हैं तेरे गुलाब की पत्तीनग़्मा-ए-आबशार तेरी सदातेरा लहराता हुआ आँचल हैंआसमाँ पर ये तेरे बादलऔर तेरी चालजैसे लहराए नदी बल खाएऐ ज़मींजब तलक न मौत आएक्यों न मैं टूट कर तुझे चाहूँ
एक 'अर्सा हुआतारीकी-ए-शब मुझ पे हुई इतनी मुहीतपरतव-ए-मेहर भी साया सा नज़र आता हैऔर तन्हाई की काली नागिनडसती है इस तरह हर आनकि गोया मैं हूँआप ख़ुद अपना रक़ीबऔर एहसास है अंगुश्त-ब-दंदाँ या'नीहमा-तन एक सवाल
कअ'र-ए-दरिया को जो चाहूँ तो किनारा कर दूँग़ैज़ में आऊँ तो पानी को शरारा कर दूँमिस्ल-ए-सीमाब समुंदर को दो-पारा कर दूँचाँद टुकड़े हो जो उँगली से इशारा कर दूँअपनी क़ुव्वत पे ख़ुद अंगुश्त-ब-दंदाँ हूँ मैं
दिल से जो बात निकलती है असर रखती हैपर नहीं ताक़त-ए-परवाज़ मगर रखती हैक़ुदसी-उल-अस्ल है रिफ़अत पे नज़र रखती हैख़ाक से उठती है गर्दूं पे गुज़र रखती हैइश्क़ था फ़ित्नागर ओ सरकश ओ चालाक मिराआसमाँ चीर गया नाला-ए-बेबाक मिरापीर-ए-गर्दूं ने कहा सुन के कहीं है कोईबोले सय्यारे सर-ए-अर्श-ए-बरीं है कोईचाँद कहता था नहीं अहल-ए-ज़मीं है कोईकहकशाँ कहती थी पोशीदा यहीं है कोईकुछ जो समझा मिरे शिकवे को तो रिज़वाँ समझामुझ को जन्नत से निकाला हुआ इंसाँ समझाथी फ़रिश्तों को भी हैरत कि ये आवाज़ है क्याअर्श वालों पे भी खुलता नहीं ये राज़ है क्याता-सर-ए-अर्श भी इंसाँ की तग-ओ-ताज़ है क्याआ गई ख़ाक की चुटकी को भी परवाज़ है क्याग़ाफ़िल आदाब से सुक्कान-ए-ज़मीं कैसे हैंशोख़ ओ गुस्ताख़ ये पस्ती के मकीं कैसे हैंइस क़दर शोख़ कि अल्लाह से भी बरहम हैथा जो मस्जूद-ए-मलाइक ये वही आदम हैआलिम-ए-कैफ़ है दाना-ए-रुमूज़-ए-कम हैहाँ मगर इज्ज़ के असरार से ना-महरम हैनाज़ है ताक़त-ए-गुफ़्तार पे इंसानों कोबात करने का सलीक़ा नहीं नादानों कोआई आवाज़ ग़म-अंगेज़ है अफ़्साना तिराअश्क-ए-बेताब से लबरेज़ है पैमाना तिराआसमाँ-गीर हुआ नारा-ए-मस्ताना तिराकिस क़दर शोख़-ज़बाँ है दिल-ए-दीवाना तिराशुक्र शिकवे को किया हुस्न-ए-अदा से तू नेहम-सुख़न कर दिया बंदों को ख़ुदा से तू नेहम तो माइल-ब-करम हैं कोई साइल ही नहींराह दिखलाएँ किसे रह-रव-ए-मंज़िल ही नहींतर्बियत आम तो है जौहर-ए-क़ाबिल ही नहींजिस से तामीर हो आदम की ये वो गिल ही नहींकोई क़ाबिल हो तो हम शान-ए-कई देते हैंढूँडने वालों को दुनिया भी नई देते हैंहाथ बे-ज़ोर हैं इल्हाद से दिल ख़ूगर हैंउम्मती बाइस-ए-रुस्वाई-ए-पैग़म्बर हैंबुत-शिकन उठ गए बाक़ी जो रहे बुत-गर हैंथा ब्राहीम पिदर और पिसर आज़र हैंबादा-आशाम नए बादा नया ख़ुम भी नएहरम-ए-काबा नया बुत भी नए तुम भी नएवो भी दिन थे कि यही माया-ए-रानाई थानाज़िश-ए-मौसम-ए-गुल लाला-ए-सहराई थाजो मुसलमान था अल्लाह का सौदाई थाकभी महबूब तुम्हारा यही हरजाई थाकिसी यकजाई से अब अहद-ए-ग़ुलामी कर लोमिल्लत-ए-अहमद-ए-मुर्सिल को मक़ामी कर लोकिस क़दर तुम पे गिराँ सुब्ह की बेदारी हैहम से कब प्यार है हाँ नींद तुम्हें प्यारी हैतब-ए-आज़ाद पे क़ैद-ए-रमज़ाँ भारी हैतुम्हीं कह दो यही आईन-ए-वफ़ादारी हैक़ौम मज़हब से है मज़हब जो नहीं तुम भी नहींजज़्ब-ए-बाहम जो नहीं महफ़िल-ए-अंजुम भी नहींजिन को आता नहीं दुनिया में कोई फ़न तुम होनहीं जिस क़ौम को परवा-ए-नशेमन तुम होबिजलियाँ जिस में हों आसूदा वो ख़िर्मन तुम होबेच खाते हैं जो अस्लाफ़ के मदफ़न तुम होहो निको नाम जो क़ब्रों की तिजारत कर केक्या न बेचोगे जो मिल जाएँ सनम पत्थर केसफ़्हा-ए-दहर से बातिल को मिटाया किस नेनौ-ए-इंसाँ को ग़ुलामी से छुड़ाया किस नेमेरे काबे को जबीनों से बसाया किस नेमेरे क़ुरआन को सीनों से लगाया किस नेथे तो आबा वो तुम्हारे ही मगर तुम क्या होहाथ पर हाथ धरे मुंतज़िर-ए-फ़र्दा होक्या कहा बहर-ए-मुसलमाँ है फ़क़त वादा-ए-हूरशिकवा बेजा भी करे कोई तो लाज़िम है शुऊरअदल है फ़ातिर-ए-हस्ती का अज़ल से दस्तूरमुस्लिम आईं हुआ काफ़िर तो मिले हूर ओ क़ुसूरतुम में हूरों का कोई चाहने वाला ही नहींजल्वा-ए-तूर तो मौजूद है मूसा ही नहींमंफ़अत एक है इस क़ौम का नुक़सान भी एकएक ही सब का नबी दीन भी ईमान भी एकहरम-ए-पाक भी अल्लाह भी क़ुरआन भी एककुछ बड़ी बात थी होते जो मुसलमान भी एकफ़िरक़ा-बंदी है कहीं और कहीं ज़ातें हैंक्या ज़माने में पनपने की यही बातें हैंकौन है तारिक-ए-आईन-ए-रसूल-ए-मुख़्तारमस्लहत वक़्त की है किस के अमल का मेआरकिस की आँखों में समाया है शिआर-ए-अग़्यारहो गई किस की निगह तर्ज़-ए-सलफ़ से बे-ज़ारक़ल्ब में सोज़ नहीं रूह में एहसास नहींकुछ भी पैग़ाम-ए-मोहम्मद का तुम्हें पास नहींजा के होते हैं मसाजिद में सफ़-आरा तो ग़रीबज़हमत-ए-रोज़ा जो करते हैं गवारा तो ग़रीबनाम लेता है अगर कोई हमारा तो ग़रीबपर्दा रखता है अगर कोई तुम्हारा तो ग़रीबउमरा नश्शा-ए-दौलत में हैं ग़ाफ़िल हम सेज़िंदा है मिल्लत-ए-बैज़ा ग़ुरबा के दम सेवाइज़-ए-क़ौम की वो पुख़्ता-ख़याली न रहीबर्क़-ए-तबई न रही शोला-मक़ाली न रहीरह गई रस्म-ए-अज़ाँ रूह-ए-बिलाली न रहीफ़ल्सफ़ा रह गया तल्क़ीन-ए-ग़ज़ाली न रहीमस्जिदें मर्सियाँ-ख़्वाँ हैं कि नमाज़ी न रहेयानी वो साहिब-ए-औसाफ़-ए-हिजाज़ी न रहेशोर है हो गए दुनिया से मुसलमाँ नाबूदहम ये कहते हैं कि थे भी कहीं मुस्लिम मौजूदवज़्अ में तुम हो नसारा तो तमद्दुन में हुनूदये मुसलमाँ हैं जिन्हें देख के शरमाएँ यहूदयूँ तो सय्यद भी हो मिर्ज़ा भी हो अफ़्ग़ान भी होतुम सभी कुछ हो बताओ तो मुसलमान भी होदम-ए-तक़रीर थी मुस्लिम की सदाक़त बेबाकअदल उस का था क़वी लौस-ए-मराआत से पाकशजर-ए-फ़ितरत-ए-मुस्लिम था हया से नमनाकथा शुजाअत में वो इक हस्ती-ए-फ़ोक़-उल-इदराकख़ुद-गुदाज़ी नम-ए-कैफ़ियत-ए-सहबा-यश बूदख़ाली-अज़-ख़ेश शुदन सूरत-ए-मीना-यश बूदहर मुसलमाँ रग-ए-बातिल के लिए नश्तर थाउस के आईना-ए-हस्ती में अमल जौहर थाजो भरोसा था उसे क़ुव्वत-ए-बाज़ू पर थाहै तुम्हें मौत का डर उस को ख़ुदा का डर थाबाप का इल्म न बेटे को अगर अज़बर होफिर पिसर क़ाबिल-ए-मीरास-ए-पिदर क्यूँकर होहर कोई मस्त-ए-मय-ए-ज़ौक़-ए-तन-आसानी हैतुम मुसलमाँ हो ये अंदाज़-ए-मुसलमानी हैहैदरी फ़क़्र है ने दौलत-ए-उस्मानी हैतुम को अस्लाफ़ से क्या निस्बत-ए-रूहानी हैवो ज़माने में मुअज़्ज़िज़ थे मुसलमाँ हो करऔर तुम ख़्वार हुए तारिक-ए-क़ुरआँ हो करतुम हो आपस में ग़ज़बनाक वो आपस में रहीमतुम ख़ता-कार ओ ख़ता-बीं वो ख़ता-पोश ओ करीमचाहते सब हैं कि हों औज-ए-सुरय्या पे मुक़ीमपहले वैसा कोई पैदा तो करे क़ल्ब-ए-सलीमतख़्त-ए-फ़ग़्फ़ूर भी उन का था सरीर-ए-कए भीयूँ ही बातें हैं कि तुम में वो हमियत है भीख़ुद-कुशी शेवा तुम्हारा वो ग़यूर ओ ख़ुद्दारतुम उख़ुव्वत से गुरेज़ाँ वो उख़ुव्वत पे निसारतुम हो गुफ़्तार सरापा वो सरापा किरदारतुम तरसते हो कली को वो गुलिस्ताँ ब-कनारअब तलक याद है क़ौमों को हिकायत उन कीनक़्श है सफ़्हा-ए-हस्ती पे सदाक़त उन कीमिस्ल-ए-अंजुम उफ़ुक़-ए-क़ौम पे रौशन भी हुएबुत-ए-हिन्दी की मोहब्बत में बिरहमन भी हुएशौक़-ए-परवाज़ में महजूर-ए-नशेमन भी हुएबे-अमल थे ही जवाँ दीन से बद-ज़न भी हुएइन को तहज़ीब ने हर बंद से आज़ाद कियाला के काबे से सनम-ख़ाने में आबाद कियाक़ैस ज़हमत-कश-ए-तन्हाई-ए-सहरा न रहेशहर की खाए हवा बादिया-पैमा न रहेवो तो दीवाना है बस्ती में रहे या न रहेये ज़रूरी है हिजाब-ए-रुख़-ए-लैला न रहेगिला-ए-ज़ौर न हो शिकवा-ए-बेदाद न होइश्क़ आज़ाद है क्यूँ हुस्न भी आज़ाद न होअहद-ए-नौ बर्क़ है आतिश-ज़न-ए-हर-ख़िर्मन हैऐमन इस से कोई सहरा न कोई गुलशन हैइस नई आग का अक़्वाम-ए-कुहन ईंधन हैमिल्लत-ए-ख़त्म-ए-रसूल शोला-ब-पैराहन हैआज भी हो जो ब्राहीम का ईमाँ पैदाआग कर सकती है अंदाज़-ए-गुलिस्ताँ पैदादेख कर रंग-ए-चमन हो न परेशाँ मालीकौकब-ए-ग़ुंचा से शाख़ें हैं चमकने वालीख़स ओ ख़ाशाक से होता है गुलिस्ताँ ख़ालीगुल-बर-अंदाज़ है ख़ून-ए-शोहदा की लालीरंग गर्दूं का ज़रा देख तो उन्नाबी हैये निकलते हुए सूरज की उफ़ुक़-ताबी हैउम्मतें गुलशन-ए-हस्ती में समर-चीदा भी हैंऔर महरूम-ए-समर भी हैं ख़िज़ाँ-दीदा भी हैंसैकड़ों नख़्ल हैं काहीदा भी बालीदा भी हैंसैकड़ों बत्न-ए-चमन में अभी पोशीदा भी हैंनख़्ल-ए-इस्लाम नमूना है बिरौ-मंदी काफल है ये सैकड़ों सदियों की चमन-बंदी कापाक है गर्द-ए-वतन से सर-ए-दामाँ तेरातू वो यूसुफ़ है कि हर मिस्र है कनआँ तेराक़ाफ़िला हो न सकेगा कभी वीराँ तेराग़ैर यक-बाँग-ए-दारा कुछ नहीं सामाँ तेरानख़्ल-ए-शमा अस्ती ओ दर शोला दो-रेशा-ए-तूआक़िबत-सोज़ बवद साया-ए-अँदेशा-ए-तूतू न मिट जाएगा ईरान के मिट जाने सेनश्शा-ए-मय को तअल्लुक़ नहीं पैमाने सेहै अयाँ यूरिश-ए-तातार के अफ़्साने सेपासबाँ मिल गए काबे को सनम-ख़ाने सेकश्ती-ए-हक़ का ज़माने में सहारा तू हैअस्र-ए-नौ-रात है धुँदला सा सितारा तू हैहै जो हंगामा बपा यूरिश-ए-बुलग़ारी काग़ाफ़िलों के लिए पैग़ाम है बेदारी कातू समझता है ये सामाँ है दिल-आज़ारी काइम्तिहाँ है तिरे ईसार का ख़ुद्दारी काक्यूँ हिरासाँ है सहिल-ए-फ़रस-ए-आदा सेनूर-ए-हक़ बुझ न सकेगा नफ़स-ए-आदा सेचश्म-ए-अक़्वाम से मख़्फ़ी है हक़ीक़त तेरीहै अभी महफ़िल-ए-हस्ती को ज़रूरत तेरीज़िंदा रखती है ज़माने को हरारत तेरीकौकब-ए-क़िस्मत-ए-इम्काँ है ख़िलाफ़त तेरीवक़्त-ए-फ़ुर्सत है कहाँ काम अभी बाक़ी हैनूर-ए-तौहीद का इत्माम अभी बाक़ी हैमिस्ल-ए-बू क़ैद है ग़ुंचे में परेशाँ हो जारख़्त-बर-दोश हवा-ए-चमनिस्ताँ हो जाहै तुनक-माया तू ज़र्रे से बयाबाँ हो जानग़्मा-ए-मौज है हंगामा-ए-तूफ़ाँ हो जाक़ुव्वत-ए-इश्क़ से हर पस्त को बाला कर देदहर में इस्म-ए-मोहम्मद से उजाला कर देहो न ये फूल तो बुलबुल का तरन्नुम भी न होचमन-ए-दह्र में कलियों का तबस्सुम भी न होये न साक़ी हो तो फिर मय भी न हो ख़ुम भी न होबज़्म-ए-तौहीद भी दुनिया में न हो तुम भी न होख़ेमा-ए-अफ़्लाक का इस्तादा इसी नाम से हैनब्ज़-ए-हस्ती तपिश-आमादा इसी नाम से हैदश्त में दामन-ए-कोहसार में मैदान में हैबहर में मौज की आग़ोश में तूफ़ान में हैचीन के शहर मराक़श के बयाबान में हैऔर पोशीदा मुसलमान के ईमान में हैचश्म-ए-अक़्वाम ये नज़्ज़ारा अबद तक देखेरिफ़अत-ए-शान-ए-रफ़ाना-लका-ज़िक्र देखेमर्दुम-ए-चश्म-ए-ज़मीं यानी वो काली दुनियावो तुम्हारे शोहदा पालने वाली दुनियागर्मी-ए-मेहर की परवरदा हिलाली दुनियाइश्क़ वाले जिसे कहते हैं बिलाली दुनियातपिश-अंदोज़ है इस नाम से पारे की तरहग़ोता-ज़न नूर में है आँख के तारे की तरहअक़्ल है तेरी सिपर इश्क़ है शमशीर तिरीमिरे दरवेश ख़िलाफ़त है जहाँगीर तिरीमा-सिवा-अल्लाह के लिए आग है तकबीर तिरीतू मुसलमाँ हो तो तक़दीर है तदबीर तिरीकी मोहम्मद से वफ़ा तू ने तो हम तेरे हैंये जहाँ चीज़ है क्या लौह-ओ-क़लम तेरे हैं
बोल कि लब आज़ाद हैं तेरेबोल ज़बाँ अब तक तेरी हैतेरा सुत्वाँ जिस्म है तेराबोल कि जाँ अब तक तेरी हैदेख कि आहन-गर की दुकाँ मेंतुंद हैं शोले सुर्ख़ है आहनखुलने लगे क़ुफ़्लों के दहानेफैला हर इक ज़ंजीर का दामनबोल ये थोड़ा वक़्त बहुत हैजिस्म ओ ज़बाँ की मौत से पहलेबोल कि सच ज़िंदा है अब तकबोल जो कुछ कहना है कह ले
ज़िंदगी से डरते हो!ज़िंदगी तो तुम भी हो ज़िंदगी तो हम भी हैं!ज़िंदगी से डरते हो?आदमी से डरते होआदमी तो तुम भी हो आदमी तो हम भी हैंआदमी ज़बाँ भी है आदमी बयाँ भी हैउस से तुम नहीं डरते!हर्फ़ और मअनी के रिश्ता-हा-ए-आहन से आदमी है वाबस्ताआदमी के दामन से ज़िंदगी है वाबस्ताउस से तुम नहीं डरते''अन-कही'' से डरते होजो अभी नहीं आई उस घड़ी से डरते होउस घड़ी की आमद की आगही से डरते हो
हाँ दिल का दामन फैला हैक्यूँ गोरी का दिल मैला हैहम कब तक पीत के धोके मेंतुम कब तक दूर झरोके मेंकब दीद से दिल को सेरी हो
ये दाग़ दाग़ उजाला ये शब-गज़ीदा सहरवो इंतिज़ार था जिस का ये वो सहर तो नहींये वो सहर तो नहीं जिस की आरज़ू ले करचले थे यार कि मिल जाएगी कहीं न कहींफ़लक के दश्त में तारों की आख़िरी मंज़िलकहीं तो होगा शब-ए-सुस्त-मौज का साहिलकहीं तो जा के रुकेगा सफ़ीना-ए-ग़म दिलजवाँ लहू की पुर-असरार शाह-राहों सेचले जो यार तो दामन पे कितने हाथ पड़ेदयार-ए-हुस्न की बे-सब्र ख़्वाब-गाहों सेपुकारती रहीं बाहें बदन बुलाते रहेबहुत अज़ीज़ थी लेकिन रुख़-ए-सहर की लगनबहुत क़रीं था हसीनान-ए-नूर का दामनसुबुक सुबुक थी तमन्ना दबी दबी थी थकन
दुनिया की महफ़िलों से उक्ता गया हूँ या रबक्या लुत्फ़ अंजुमन का जब दिल ही बुझ गया होशोरिश से भागता हूँ दिल ढूँडता है मेराऐसा सुकूत जिस पर तक़रीर भी फ़िदा होमरता हूँ ख़ामुशी पर ये आरज़ू है मेरीदामन में कोह के इक छोटा सा झोंपड़ा होआज़ाद फ़िक्र से हूँ उज़्लत में दिन गुज़ारूँदुनिया के ग़म का दिल से काँटा निकल गया होलज़्ज़त सरोद की हो चिड़ियों के चहचहों मेंचश्मे की शोरिशों में बाजा सा बज रहा होगुल की कली चटक कर पैग़ाम दे किसी कासाग़र ज़रा सा गोया मुझ को जहाँ-नुमा होहो हाथ का सिरहाना सब्ज़े का हो बिछौनाशरमाए जिस से जल्वत ख़ल्वत में वो अदा होमानूस इस क़दर हो सूरत से मेरी बुलबुलनन्हे से दिल में उस के खटका न कुछ मिरा होसफ़ बाँधे दोनों जानिब बूटे हरे हरे होंनद्दी का साफ़ पानी तस्वीर ले रहा होहो दिल-फ़रेब ऐसा कोहसार का नज़ारापानी भी मौज बन कर उठ उठ के देखता होआग़ोश में ज़मीं की सोया हुआ हो सब्ज़ाफिर फिर के झाड़ियों में पानी चमक रहा होपानी को छू रही हो झुक झुक के गुल की टहनीजैसे हसीन कोई आईना देखता होमेहंदी लगाए सूरज जब शाम की दुल्हन कोसुर्ख़ी लिए सुनहरी हर फूल की क़बा होरातों को चलने वाले रह जाएँ थक के जिस दमउम्मीद उन की मेरा टूटा हुआ दिया होबिजली चमक के उन को कुटिया मिरी दिखा देजब आसमाँ पे हर सू बादल घिरा हुआ होपिछले पहर की कोयल वो सुब्ह की मोअज़्ज़िनमैं उस का हम-नवा हूँ वो मेरी हम-नवा होकानों पे हो न मेरे दैर ओ हरम का एहसाँरौज़न ही झोंपड़ी का मुझ को सहर-नुमा होफूलों को आए जिस दम शबनम वज़ू करानेरोना मिरा वज़ू हो नाला मिरी दुआ होइस ख़ामुशी में जाएँ इतने बुलंद नालेतारों के क़ाफ़िले को मेरी सदा दिरा होहर दर्दमंद दिल को रोना मिरा रुला देबेहोश जो पड़े हैं शायद उन्हें जगा दे
नहीं मालूम 'ज़रयून' अब तुम्हारी उम्र क्या होगीवो किन ख़्वाबों से जाने आश्ना ना-आश्ना होगीतुम्हारे दिल के इस दुनिया से कैसे सिलसिले होंगेतुम्हें कैसे गुमाँ होंगे तुम्हें कैसे गिले होंगेतुम्हारी सुब्ह जाने किन ख़यालों से नहाती होतुम्हारी शाम जाने किन मलालों से निभाती होन जाने कौन दोशीज़ा तुम्हारी ज़िंदगी होगीन जाने उस की क्या बायसतगी शाइस्तगी होगीउसे तुम फ़ोन करते और ख़त लिखते रहे होगेन जाने तुम ने कितनी कम ग़लत उर्दू लिखी होगीये ख़त लिखना तो दक़यानूस की पीढ़ी का क़िस्सा हैये सिंफ़-ए-नस्र हम ना-बालिग़ों के फ़न का हिस्सा हैवो हँसती हो तो शायद तुम न रह पाते हो हालों मेंगढ़ा नन्हा सा पड़ जाता हो शायद उस के गालों मेंगुमाँ ये है तुम्हारी भी रसाई ना-रसाई होवो आई हो तुम्हारे पास लेकिन आ न पाई होवो शायद माइदे की गंद बिरयानी न खाती होवो नान-ए-बे-ख़मीर-ए-मैदा कम-तर ही चबाती होवो दोशीज़ा भी शायद दास्तानों की हो दिल-दादाउसे मालूम होगा 'ज़ाल' था 'सोहराब' का दादातहमतन यानी 'रुस्तम' था गिरामी 'साम' का वारिसगिरामी 'साम' था सुल्ब-ए-नर-ए-'मानी' का ख़ुश-ज़ादा(ये मेरी एक ख़्वाहिश है जो मुश्किल है)वो 'नज्म'-आफ़ंदि-ए-मरहूम को तो जानती होगीवो नौहों के अदब का तर्ज़ तो पहचानती होगीउसे कद होगी शायद उन सभी से जो लपाड़ी होंन होंगे ख़्वाब उस का जो गवय्ये और खिलाड़ी हों
कोई ये कैसे बताए कि वो तन्हा क्यूँ हैवो जो अपना था वही और किसी का क्यूँ हैयही दुनिया है तो फिर ऐसी ये दुनिया क्यूँ हैयही होता है तो आख़िर यही होता क्यूँ हैइक ज़रा हाथ बढ़ा दें तो पकड़ लें दामनउन के सीने में समा जाए हमारी धड़कनइतनी क़ुर्बत है तो फिर फ़ासला इतना क्यूँ हैदिल-ए-बर्बाद से निकला नहीं अब तक कोईइस लुटे घर पे दिया करता है दस्तक कोईआस जो टूट गई फिर से बंधाता क्यूँ हैतुम मसर्रत का कहो या इसे ग़म का रिश्ताकहते हैं प्यार का रिश्ता है जनम का रिश्ताहै जनम का जो ये रिश्ता तो बदलता क्यूँ है
कुछ उजड़ी माँगें शामों कीआवाज़ शिकस्ता जामों कीकुछ टुकड़े ख़ाली बोतल केकुछ घुँगरू टूटी पायल केकुछ बिखरे तिनके चिलमन केकुछ पुर्ज़े अपने दामन केये तारे कुछ थर्राए हुएये गीत कभी के गाए हुएकुछ शेर पुरानी ग़ज़लों केउनवान अधूरी नज़्मों केटूटी हुई इक अश्कों की लड़ीइक ख़ुश्क क़लम इक बंद घड़ीमत रोको इन्हें पास आने दोये मुझ से मिलने आए हैंमैं ख़ुद न जिन्हें पहचान सकूँकुछ इतने धुँदले साए हैं
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