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नज़्म
ये क़ुर्ब-ए-रूह भी कितना 'अजब मु'अम्मा है
सुकून-ए-दिल भी है और दर्द-ए-बे-मुदावा है
बनो ताहिरा सईद
नज़्म
आओ अपने दिल में दर्द-ए-ला-दवा पैदा करें
शिद्दत-ए-ग़म में मसर्रत का मज़ा पैदा करें
मंशाउर्रहमान ख़ाँ मंशा
नज़्म
दवा-ए-दर्द-ए-दिल के तुम न मिन्नत-कश हुए चूँकि
तुम्हारे 'इश्क़ में तुम पर रही अपनी ख़ुदी ग़ालिब
हसन नवाब हसन
नज़्म
ये दर्द-ए-ला-दवा दिल में जगाया किस लिए तू ने
ख़िरद इदराक अक़्ल-ओ-फ़हम सब बेगार हों जैसे
सलमान अंसारी
नज़्म
थे बहुत बेदर्द लम्हे ख़त्म-ए-दर्द-ए-इश्क़ के
थीं बहुत बे-मेहर सुब्हें मेहरबाँ रातों के बा'द
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
नज़्म
कहते हैं अहल-ए-जहाँ दर्द-ए-अजल है ला-दवा
ज़ख़्म-ए-फ़ुर्क़त वक़्त के मरहम से पाता है शिफ़ा
अल्लामा इक़बाल
नज़्म
बे-नियाज़-ए-'ऐश-ओ-'इशरत आश्ना-ए-दर्द-ओ-ग़म
एक मुश्त-ए-उस्तुख़्वाँ आशुफ़्ता-रौ बा-चश्म-ए-तर