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नज़्म
सर्व-क़द मिट्टी के बौनों के क़दम चूमेंगे
फ़र्श पर आज दर-ए-सिदक़-ओ-सफ़ा बंद हुआ
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
नज़्म
दर-ए-ज़िंदाँ से देखें या उरूज-ए-दार से देखें
तुम्हें रुस्वा सर-ए-बाज़ार-ए-आलम हम भी देखेंगे
साहिर लुधियानवी
नज़्म
गुदाज़-ए-इश्क़ से लबरेज़ था क़ल्ब-ए-हज़ीं उस का
मगर आईना-दार-ए-शर्म था रू-ए-हसीं इस का
अख़्तर शीरानी
नज़्म
कि हम मेहराब-ए-अबरू में सितारे टाँकने वाले
दर-ए-लब बोसा-ए-इज़हार की दस्तक से अक्सर खोलने वाले
सलीम कौसर
नज़्म
हुई फिर इमतिहान-ए-इशक़ की तदबीर बिस्मिल्लाह
हर इक जानिब मचा कुहराम-ए-दार-ओ-गीर बिस्मिल्लाह
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
नज़्म
जलाना छोड़ दें दोज़ख़ के अंगारे ये मुमकिन है
रवानी तर्क कर दें बर्क़ के धारे ये मुमकिन है
मख़दूम मुहिउद्दीन
नज़्म
हम कि हैं कब से दर-ए-उम्मीद के दरयूज़ा-गर
ये घड़ी गुज़री तो फिर दस्त-ए-तलब फैलाएँगे
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
नज़्म
शिआर की जो मुदारात-ए-क़ामत-ए-जानाँ
किया है 'फ़ैज़' दर-ए-दिल दर-ए-फ़लक से बुलंद
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
नज़्म
सर-ए-पुर-नख़वत-ए-अर्बाब-ए-ज़माँ तोडूँगा
शोर-ए-नाला से दर-ए-अर्ज़-ओ-समाँ तोडूँगा