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नज़्म
गर मिरा हर्फ़-ए-तसल्ली वो दवा हो जिस से
जी उठे फिर तिरा उजड़ा हुआ बे-नूर दिमाग़
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
नज़्म
हबीब जालिब
नज़्म
टक ग़ाफ़िल दिल में सोच ज़रा है साथ लगा तेरे दुश्मन
क्या लौंडी बांदी दाई दवा क्या बंदा चेला नेक-चलन
नज़ीर अकबराबादी
नज़्म
ज़बाँ से गर किया तौहीद का दावा तो क्या हासिल
बनाया है बुत-ए-पिंदार को अपना ख़ुदा तू ने
अल्लामा इक़बाल
नज़्म
हैरती हूँ मैं तिरी तस्वीर के ए'जाज़ का
रुख़ बदल डाला है जिस ने वक़्त की परवाज़ का
अल्लामा इक़बाल
नज़्म
तुम कि बन सकती हो हर महफ़िल में फ़िरदौस-ए-नज़र
मुझ को ये दावा कि हर महफ़िल पे छा सकता हूँ मैं
असरार-उल-हक़ मजाज़
नज़्म
उसी ज़माने में कहते हैं मेरे दादा ने
जब अर्ज़-ए-हिन्द सिंची ख़ून से ''सपूतों'' के
फ़िराक़ गोरखपुरी
नज़्म
है जिन्हें सब से ज़ियादा दावा-ए-हुब्बुलवतन
आज उन की वज्ह से हुब्ब-ए-वतन रुस्वा तो है