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नज़्म
इक शाम जो उस को बुलवाया कुछ समझाया बेचारे ने
उस रात ये क़िस्सा पाक किया कुछ खा ही लिया दुखयारे ने
इब्न-ए-इंशा
नज़्म
पहलू-ए-शाह में ये दुख़्तर-ए-जम्हूर की क़ब्र
कितने गुम-गश्ता फ़सानों का पता देती है
साहिर लुधियानवी
नज़्म
कोई आवाज़ देता है कि आओ तुम हमारे हो
मिरी धरती के बेटे मेरी दुनिया के दुलारे हो
ख़लील-उर-रहमान आज़मी
नज़्म
और ढेर अबीरों के लागे, सो इशरत की तय्यारी है
हैं राग बहारें दिखलाते और रंग-भरी पिचकारी है