aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair
jis ke hote hue hote the zamāne mere
परिणाम "diler"
सच कहो सच कहो हमेशा सचहै भले-मानसों का पेशा सचसच कहोगे तो तुम रहोगे अज़ीज़सच तो ये है कि सच है अच्छी चीज़सच कहोगे तो तुम रहोगे शादफ़िक्र से पाक रंज से आज़ादसच कहोगे तुम रहोगे दिलेरजैसे डरता नहीं दिलावर शेरसच से रहती है तक़्वियत दिल कोसहल करता है सख़्त मुश्किल कोसच है सारे मुआमलों की जानसच से रहता है दिल को इत्मिनानसच में राहत है और आसानीसच से होती नहीं पशेमानीसच है दुनिया में नेकियों की जड़सच न हो तो जहान जाए उजड़सच कहोगे तो दिल रहेगा साफ़सच करा देगा सब क़ुसूर मुआफ़सच से ज़िन्हार दर-गुज़र न करोदिल में कुछ ख़ौफ़ और ख़तर न करोजिस को सच बोलने की आदत हैवो बड़ा नेक बा-सआदत हैवही दाना है जो कि है सच्चाइस में बुढ्ढा हो या कोई सच्चाहै बुरा झूट बोलने वालाआप करता है अपना मुँह कालाफ़ाएदा उस को कुछ न देगा झूटजाएगा एक रोज़ भांडा फूटझूट की भूल कर न डालो ख़ूझूट ज़िल्लत की बात है आख़-थू
शहीदों का सरताज जन्नत-मक़ाममोहब्बत की मेराज ज़ी-एहतिरामग़ुलामान-ए-आलम की पुश्त-ओ-पनाहअहिंसा के बंदों की उम्मीद-दगाहवो ग़म भी वतन का था ग़म-ख़्वार भीरज़ाकार भी और सालार भीअहिंसा का पैरव मगर शेर-ए-मर्दमोहब्बत में यकता सदाक़त में फ़र्दहुआ जिस के दम से ब-सद एहतिशामसियासत से ऊँचा सदाक़त का नामवो आदम की अज़्मत का आईना-दारवो ज़र्रा कि चमका था ख़ुरशीद-दारवो जिस ने दिया आदमियत को औजवो जिस ने लड़ाई अहिंसा की फ़ौजक़फ़स है कोई अब न सय्याद हैवतन जिस की हिकमत से आज़ाद हैवो नूर-ए-ज़िया-बार सीमा-ए-ख़ैरवो जूया-ए-ख़ैर-ओ-शनासा-ए-ख़ैरफ़िरिश्ता-खिसाल-ओ-फ़रिश्ता-सियरमलक दर-हक़ीक़त ब-ज़ाहिर बशरमोहब्बत की वो इक शबीह-ए-हसींउख़ुव्वत का वो एक माह-ए-मुबींवो हक़ आगही की कछारों का शेरसदाक़त के मैदाँ का मर्द-ए-दिलेरफ़लक-आफ़रीं और गर्दूँ-तराज़मरीज़ान-ए-पस्ती का वो चारासाज़वो कोताह-बीनों की शम-ए-शुऊ'रवो गुमराहियों में हिदायत का नूरवो जिस ने उठाया ज़माने का बारकिया जिस ने जाबिर को बे-इख़्तियारवो बे-मिस्ल क़ाइद मुअस्सर ख़तीबवो लश्कर में जिस के अमीर-ओ-ग़रीबवो जिस ने करोड़ों के काटे हैं बंदवो अरफ़ा वो आ'ला वो सब से बुलंदवो जिस की अता है निराली अतावो जिस ने दिया इक नया फ़ल्सफ़ाज़मीं पर बहा उस जरी का लहूतफ़ोबर तू ऐ चर्ख़-ए-गर्दां तफ़ू
सच कहोगे तो तुम रहोगे दिलेरजैसे डरता नहीं दिलावर शेर
हर सर में इम्तिहान का सौदा है आज-कलहर दिल में फ़ेल होने का धड़का है आज-कलपर्चों के आउट होने का चर्चा है आज-कलकोई नहीं किसी की भी सुनता है आज-कलमुन्नी की आँख नम है तो मुन्ना के दिल में ग़मबेचैनियों में कोई किसी से नहीं है कमदीमक की तरह चाट रहा है कोई किताबकोई ये सोचता है कि अब आएगा इ'ताबपढ़ता है रात भर कोई जुग़राफ़िया का बाबपेंसिल से सोख़्ता पे है लिखता कोई जवाबहर ज़ी-शुऊर खेल के मैदाँ से दूर हैपढ़ने से कोई और कोई लिखने से चूर हैअंजुम की आँख नम है तो फ़िरदौस हैं उदास'मोहसिन' ये सोचते हैं कि होंगे ये कैसे पासअज़रा की ये दुआ है कि आ जाए रटना रासहर ज़ेहन में है ख़ौफ़ तो हर दिल में है हिरासकोई नज़र में मौत का नक़्शा लिए हुएबैठा है कोई हाथ में बस्ता लिए हुएखाने की फ़िक्र है न है फूटबाल का ख़यालचेहरे पे हर नफ़स के है तहरीर दिल का हालइस बार फ़ेल गर हुए जीना हुआ मुहालअब्बू के मार-पीट से उतरेगी मेरी खालयारों को किस तरह से मुँह अपना दिखाएँगेऔर किस तरह से मंज़िल-ए-उम्मीद पाएँगेबाक़ी कुछ ऐसे लोग भी हैं इस जहान मेंजो फ़र्क़ आने देते नहीं अपनी आन मेंसीने फुला फुला के निकलते हैं शान मेंजैसे कि कोई ख़तरा न हो इम्तिहान मेंये लोग ज़िंदा-दिल हैं बहादुर हैं शेर हैंजो फ़ेल हो के होते हैं ख़ुश वो दिलेर हैंपढ़ने का ग़म है इन को न है इन को फ़िक्र-ए-दोशहर वक़्त खेलते हैं पढ़ाई का किस को होशआपस में लड़ भी लेते हैं जब आए इन को जोशहँसते हैं इम्तिहान के दिन ये कुतुब-फ़रोशइन के लिए ज़माने में कोई भी ग़म नहींचिकने घड़े हैं ये इन्हें कोई अलम नहीं
जो दिलेर थी कभीजब पैदा हुई थीतो रो रो कर पैर पटक करअपने अस्तित्व को दर्शाने की कोशिश करने लगी परनज़र पड़ते ही अपनी माँ परमाँ की बेचारगी ने उसे सहमना सिखायाअपनी अहमियत दिखाने कीजुरअत हुई तुम्हें कैसेज़माने की नज़रों में ये नज़र आयाऔर बसतभी से पय्याँ पय्याँ चलने सेस्कूल से कॉलेज तककॉलेज से मंडप तकबस सहमी हुई हैकभी जो दिलेर होने की कोशिश करती हैबे-शर्म कहलाई जाती हैलोगों को चालाक न नज़र आए इस लिएझट फिर सहम जाती हैमानो सहमना तो उस की निय्यत हैउस लड़की से मेरा एक अजीब सा रिश्ता हैउस में मुझे अपना बचपन दिखता है
इक गधे को मिली जो शेर की खालउस के दिल में अजब ये आया ख़यालमैं जहाँ चाहूँ डाल दूँ डेरासारे जंगल पे राज हो मेरापहन कर खाल शेर बन बैठाजानवर वो दिलेर बन बैठाउस से डरते थे जानवर सारेजान जाती थी ख़ौफ़ के मारेएक ऐसा भी दिन मगर आयाइक गधा पास आ के चिल्लायाभूल कर फिर तो शेर का चोलाये गधा भी उसी तरह बोलासुनते ही शेर से गधे के बोलखुल गई लम्हा भर में सारी पोलखाल वो छोड़-छाड़ कर भागाभाग सकता था जिस क़दर भागाबोला दिल में वो हो के शर्मिंदाचाल अपनी चलूँगा आइंदा
असली जापानी दो नालीनाना की बंदूक़ निरालीकंदा इस का मट-मैला सारूप डरावना सूरत कालीनाना जी इस के रसिया थेनानी थी इस की मतवालीलेते थे इस से जो निशानाजाता था वो अक्सर ख़ालीचिड़ियों का जीना दूभर थाछुपती थीं वो डाली डालीनाना जी इक रोज़ गए थेदेखने जब मेला वैशालीनानी को समझा के गए थेकरनी थी इस की रखवालीसारी रात गुज़ारी बाहरमेले की थी शान निरालीघर पर रात को डाकू आएतोड़ के रौशन-दान की जालीनानी को पिस्तौल दिखा करले भागे बंदूक़ कमालीशोर मचाती पीछे दौड़ींवो थीं दिलेर बड़ी दिल वालीहल्ला सुन कर लोग भी दौड़ेले कर बल्लम और भुजालीचोर हुए तब नौ दो ग्यारहछोड़ गए बंदूक़ मिसालीनाना के घर इसी ख़ुशी मेंअगले रोज़ मनी दीवालीनानी जी ने इसी ख़ुशी मेंघर घर भेजी खीर की थाली
चलो चलें हम बिदेश यारोबढ़े चलो आज जल्दी जल्दीदिलेर बन कर हँसी ख़ुशी सेहमारा साथी है छोटा बंदरहमारे साथी कुछ और भी हैंहमारा कुत्ता हमारा तोताहमारी बिल्ली हमारा मुर्ग़ासभी हमारे हैं दोस्त अच्छे
क़दम मिला के चलो हाँ क़दम मिला के चलोवतन की राह में अहल-ए-वतन निभा के चलोहज़ार मुश्किलें इक जस्त में उबूर करोहर एक रोड़े को ठोकर से चूर-चूर करोजो डाले रख़्ना उसे रास्ते से दूर करोदिलेर हो तो मुसीबत में मुस्कुरा के चलो
सुनो'औरत की नाराज़गी से डरोकि ये क़हर की सदा हैमगर उस 'औरत की नाराज़गी से पनाह माँगोजो ज़हीन और दिलेर हैउस से मत उलझोकि तुम्हारा अपना वुजूदख़ुद उस के हक़ में गवाही देगाकि ये वो आईना हैजिस में तुम्हें अपनी वहशतऔर अपना खोखला वक़ार बरहना दिखाई देगा
दिल से जो बात निकलती है असर रखती हैपर नहीं ताक़त-ए-परवाज़ मगर रखती हैक़ुदसी-उल-अस्ल है रिफ़अत पे नज़र रखती हैख़ाक से उठती है गर्दूं पे गुज़र रखती हैइश्क़ था फ़ित्नागर ओ सरकश ओ चालाक मिराआसमाँ चीर गया नाला-ए-बेबाक मिरापीर-ए-गर्दूं ने कहा सुन के कहीं है कोईबोले सय्यारे सर-ए-अर्श-ए-बरीं है कोईचाँद कहता था नहीं अहल-ए-ज़मीं है कोईकहकशाँ कहती थी पोशीदा यहीं है कोईकुछ जो समझा मिरे शिकवे को तो रिज़वाँ समझामुझ को जन्नत से निकाला हुआ इंसाँ समझाथी फ़रिश्तों को भी हैरत कि ये आवाज़ है क्याअर्श वालों पे भी खुलता नहीं ये राज़ है क्याता-सर-ए-अर्श भी इंसाँ की तग-ओ-ताज़ है क्याआ गई ख़ाक की चुटकी को भी परवाज़ है क्याग़ाफ़िल आदाब से सुक्कान-ए-ज़मीं कैसे हैंशोख़ ओ गुस्ताख़ ये पस्ती के मकीं कैसे हैंइस क़दर शोख़ कि अल्लाह से भी बरहम हैथा जो मस्जूद-ए-मलाइक ये वही आदम हैआलिम-ए-कैफ़ है दाना-ए-रुमूज़-ए-कम हैहाँ मगर इज्ज़ के असरार से ना-महरम हैनाज़ है ताक़त-ए-गुफ़्तार पे इंसानों कोबात करने का सलीक़ा नहीं नादानों कोआई आवाज़ ग़म-अंगेज़ है अफ़्साना तिराअश्क-ए-बेताब से लबरेज़ है पैमाना तिराआसमाँ-गीर हुआ नारा-ए-मस्ताना तिराकिस क़दर शोख़-ज़बाँ है दिल-ए-दीवाना तिराशुक्र शिकवे को किया हुस्न-ए-अदा से तू नेहम-सुख़न कर दिया बंदों को ख़ुदा से तू नेहम तो माइल-ब-करम हैं कोई साइल ही नहींराह दिखलाएँ किसे रह-रव-ए-मंज़िल ही नहींतर्बियत आम तो है जौहर-ए-क़ाबिल ही नहींजिस से तामीर हो आदम की ये वो गिल ही नहींकोई क़ाबिल हो तो हम शान-ए-कई देते हैंढूँडने वालों को दुनिया भी नई देते हैंहाथ बे-ज़ोर हैं इल्हाद से दिल ख़ूगर हैंउम्मती बाइस-ए-रुस्वाई-ए-पैग़म्बर हैंबुत-शिकन उठ गए बाक़ी जो रहे बुत-गर हैंथा ब्राहीम पिदर और पिसर आज़र हैंबादा-आशाम नए बादा नया ख़ुम भी नएहरम-ए-काबा नया बुत भी नए तुम भी नएवो भी दिन थे कि यही माया-ए-रानाई थानाज़िश-ए-मौसम-ए-गुल लाला-ए-सहराई थाजो मुसलमान था अल्लाह का सौदाई थाकभी महबूब तुम्हारा यही हरजाई थाकिसी यकजाई से अब अहद-ए-ग़ुलामी कर लोमिल्लत-ए-अहमद-ए-मुर्सिल को मक़ामी कर लोकिस क़दर तुम पे गिराँ सुब्ह की बेदारी हैहम से कब प्यार है हाँ नींद तुम्हें प्यारी हैतब-ए-आज़ाद पे क़ैद-ए-रमज़ाँ भारी हैतुम्हीं कह दो यही आईन-ए-वफ़ादारी हैक़ौम मज़हब से है मज़हब जो नहीं तुम भी नहींजज़्ब-ए-बाहम जो नहीं महफ़िल-ए-अंजुम भी नहींजिन को आता नहीं दुनिया में कोई फ़न तुम होनहीं जिस क़ौम को परवा-ए-नशेमन तुम होबिजलियाँ जिस में हों आसूदा वो ख़िर्मन तुम होबेच खाते हैं जो अस्लाफ़ के मदफ़न तुम होहो निको नाम जो क़ब्रों की तिजारत कर केक्या न बेचोगे जो मिल जाएँ सनम पत्थर केसफ़्हा-ए-दहर से बातिल को मिटाया किस नेनौ-ए-इंसाँ को ग़ुलामी से छुड़ाया किस नेमेरे काबे को जबीनों से बसाया किस नेमेरे क़ुरआन को सीनों से लगाया किस नेथे तो आबा वो तुम्हारे ही मगर तुम क्या होहाथ पर हाथ धरे मुंतज़िर-ए-फ़र्दा होक्या कहा बहर-ए-मुसलमाँ है फ़क़त वादा-ए-हूरशिकवा बेजा भी करे कोई तो लाज़िम है शुऊरअदल है फ़ातिर-ए-हस्ती का अज़ल से दस्तूरमुस्लिम आईं हुआ काफ़िर तो मिले हूर ओ क़ुसूरतुम में हूरों का कोई चाहने वाला ही नहींजल्वा-ए-तूर तो मौजूद है मूसा ही नहींमंफ़अत एक है इस क़ौम का नुक़सान भी एकएक ही सब का नबी दीन भी ईमान भी एकहरम-ए-पाक भी अल्लाह भी क़ुरआन भी एककुछ बड़ी बात थी होते जो मुसलमान भी एकफ़िरक़ा-बंदी है कहीं और कहीं ज़ातें हैंक्या ज़माने में पनपने की यही बातें हैंकौन है तारिक-ए-आईन-ए-रसूल-ए-मुख़्तारमस्लहत वक़्त की है किस के अमल का मेआरकिस की आँखों में समाया है शिआर-ए-अग़्यारहो गई किस की निगह तर्ज़-ए-सलफ़ से बे-ज़ारक़ल्ब में सोज़ नहीं रूह में एहसास नहींकुछ भी पैग़ाम-ए-मोहम्मद का तुम्हें पास नहींजा के होते हैं मसाजिद में सफ़-आरा तो ग़रीबज़हमत-ए-रोज़ा जो करते हैं गवारा तो ग़रीबनाम लेता है अगर कोई हमारा तो ग़रीबपर्दा रखता है अगर कोई तुम्हारा तो ग़रीबउमरा नश्शा-ए-दौलत में हैं ग़ाफ़िल हम सेज़िंदा है मिल्लत-ए-बैज़ा ग़ुरबा के दम सेवाइज़-ए-क़ौम की वो पुख़्ता-ख़याली न रहीबर्क़-ए-तबई न रही शोला-मक़ाली न रहीरह गई रस्म-ए-अज़ाँ रूह-ए-बिलाली न रहीफ़ल्सफ़ा रह गया तल्क़ीन-ए-ग़ज़ाली न रहीमस्जिदें मर्सियाँ-ख़्वाँ हैं कि नमाज़ी न रहेयानी वो साहिब-ए-औसाफ़-ए-हिजाज़ी न रहेशोर है हो गए दुनिया से मुसलमाँ नाबूदहम ये कहते हैं कि थे भी कहीं मुस्लिम मौजूदवज़्अ में तुम हो नसारा तो तमद्दुन में हुनूदये मुसलमाँ हैं जिन्हें देख के शरमाएँ यहूदयूँ तो सय्यद भी हो मिर्ज़ा भी हो अफ़्ग़ान भी होतुम सभी कुछ हो बताओ तो मुसलमान भी होदम-ए-तक़रीर थी मुस्लिम की सदाक़त बेबाकअदल उस का था क़वी लौस-ए-मराआत से पाकशजर-ए-फ़ितरत-ए-मुस्लिम था हया से नमनाकथा शुजाअत में वो इक हस्ती-ए-फ़ोक़-उल-इदराकख़ुद-गुदाज़ी नम-ए-कैफ़ियत-ए-सहबा-यश बूदख़ाली-अज़-ख़ेश शुदन सूरत-ए-मीना-यश बूदहर मुसलमाँ रग-ए-बातिल के लिए नश्तर थाउस के आईना-ए-हस्ती में अमल जौहर थाजो भरोसा था उसे क़ुव्वत-ए-बाज़ू पर थाहै तुम्हें मौत का डर उस को ख़ुदा का डर थाबाप का इल्म न बेटे को अगर अज़बर होफिर पिसर क़ाबिल-ए-मीरास-ए-पिदर क्यूँकर होहर कोई मस्त-ए-मय-ए-ज़ौक़-ए-तन-आसानी हैतुम मुसलमाँ हो ये अंदाज़-ए-मुसलमानी हैहैदरी फ़क़्र है ने दौलत-ए-उस्मानी हैतुम को अस्लाफ़ से क्या निस्बत-ए-रूहानी हैवो ज़माने में मुअज़्ज़िज़ थे मुसलमाँ हो करऔर तुम ख़्वार हुए तारिक-ए-क़ुरआँ हो करतुम हो आपस में ग़ज़बनाक वो आपस में रहीमतुम ख़ता-कार ओ ख़ता-बीं वो ख़ता-पोश ओ करीमचाहते सब हैं कि हों औज-ए-सुरय्या पे मुक़ीमपहले वैसा कोई पैदा तो करे क़ल्ब-ए-सलीमतख़्त-ए-फ़ग़्फ़ूर भी उन का था सरीर-ए-कए भीयूँ ही बातें हैं कि तुम में वो हमियत है भीख़ुद-कुशी शेवा तुम्हारा वो ग़यूर ओ ख़ुद्दारतुम उख़ुव्वत से गुरेज़ाँ वो उख़ुव्वत पे निसारतुम हो गुफ़्तार सरापा वो सरापा किरदारतुम तरसते हो कली को वो गुलिस्ताँ ब-कनारअब तलक याद है क़ौमों को हिकायत उन कीनक़्श है सफ़्हा-ए-हस्ती पे सदाक़त उन कीमिस्ल-ए-अंजुम उफ़ुक़-ए-क़ौम पे रौशन भी हुएबुत-ए-हिन्दी की मोहब्बत में बिरहमन भी हुएशौक़-ए-परवाज़ में महजूर-ए-नशेमन भी हुएबे-अमल थे ही जवाँ दीन से बद-ज़न भी हुएइन को तहज़ीब ने हर बंद से आज़ाद कियाला के काबे से सनम-ख़ाने में आबाद कियाक़ैस ज़हमत-कश-ए-तन्हाई-ए-सहरा न रहेशहर की खाए हवा बादिया-पैमा न रहेवो तो दीवाना है बस्ती में रहे या न रहेये ज़रूरी है हिजाब-ए-रुख़-ए-लैला न रहेगिला-ए-ज़ौर न हो शिकवा-ए-बेदाद न होइश्क़ आज़ाद है क्यूँ हुस्न भी आज़ाद न होअहद-ए-नौ बर्क़ है आतिश-ज़न-ए-हर-ख़िर्मन हैऐमन इस से कोई सहरा न कोई गुलशन हैइस नई आग का अक़्वाम-ए-कुहन ईंधन हैमिल्लत-ए-ख़त्म-ए-रसूल शोला-ब-पैराहन हैआज भी हो जो ब्राहीम का ईमाँ पैदाआग कर सकती है अंदाज़-ए-गुलिस्ताँ पैदादेख कर रंग-ए-चमन हो न परेशाँ मालीकौकब-ए-ग़ुंचा से शाख़ें हैं चमकने वालीख़स ओ ख़ाशाक से होता है गुलिस्ताँ ख़ालीगुल-बर-अंदाज़ है ख़ून-ए-शोहदा की लालीरंग गर्दूं का ज़रा देख तो उन्नाबी हैये निकलते हुए सूरज की उफ़ुक़-ताबी हैउम्मतें गुलशन-ए-हस्ती में समर-चीदा भी हैंऔर महरूम-ए-समर भी हैं ख़िज़ाँ-दीदा भी हैंसैकड़ों नख़्ल हैं काहीदा भी बालीदा भी हैंसैकड़ों बत्न-ए-चमन में अभी पोशीदा भी हैंनख़्ल-ए-इस्लाम नमूना है बिरौ-मंदी काफल है ये सैकड़ों सदियों की चमन-बंदी कापाक है गर्द-ए-वतन से सर-ए-दामाँ तेरातू वो यूसुफ़ है कि हर मिस्र है कनआँ तेराक़ाफ़िला हो न सकेगा कभी वीराँ तेराग़ैर यक-बाँग-ए-दारा कुछ नहीं सामाँ तेरानख़्ल-ए-शमा अस्ती ओ दर शोला दो-रेशा-ए-तूआक़िबत-सोज़ बवद साया-ए-अँदेशा-ए-तूतू न मिट जाएगा ईरान के मिट जाने सेनश्शा-ए-मय को तअल्लुक़ नहीं पैमाने सेहै अयाँ यूरिश-ए-तातार के अफ़्साने सेपासबाँ मिल गए काबे को सनम-ख़ाने सेकश्ती-ए-हक़ का ज़माने में सहारा तू हैअस्र-ए-नौ-रात है धुँदला सा सितारा तू हैहै जो हंगामा बपा यूरिश-ए-बुलग़ारी काग़ाफ़िलों के लिए पैग़ाम है बेदारी कातू समझता है ये सामाँ है दिल-आज़ारी काइम्तिहाँ है तिरे ईसार का ख़ुद्दारी काक्यूँ हिरासाँ है सहिल-ए-फ़रस-ए-आदा सेनूर-ए-हक़ बुझ न सकेगा नफ़स-ए-आदा सेचश्म-ए-अक़्वाम से मख़्फ़ी है हक़ीक़त तेरीहै अभी महफ़िल-ए-हस्ती को ज़रूरत तेरीज़िंदा रखती है ज़माने को हरारत तेरीकौकब-ए-क़िस्मत-ए-इम्काँ है ख़िलाफ़त तेरीवक़्त-ए-फ़ुर्सत है कहाँ काम अभी बाक़ी हैनूर-ए-तौहीद का इत्माम अभी बाक़ी हैमिस्ल-ए-बू क़ैद है ग़ुंचे में परेशाँ हो जारख़्त-बर-दोश हवा-ए-चमनिस्ताँ हो जाहै तुनक-माया तू ज़र्रे से बयाबाँ हो जानग़्मा-ए-मौज है हंगामा-ए-तूफ़ाँ हो जाक़ुव्वत-ए-इश्क़ से हर पस्त को बाला कर देदहर में इस्म-ए-मोहम्मद से उजाला कर देहो न ये फूल तो बुलबुल का तरन्नुम भी न होचमन-ए-दह्र में कलियों का तबस्सुम भी न होये न साक़ी हो तो फिर मय भी न हो ख़ुम भी न होबज़्म-ए-तौहीद भी दुनिया में न हो तुम भी न होख़ेमा-ए-अफ़्लाक का इस्तादा इसी नाम से हैनब्ज़-ए-हस्ती तपिश-आमादा इसी नाम से हैदश्त में दामन-ए-कोहसार में मैदान में हैबहर में मौज की आग़ोश में तूफ़ान में हैचीन के शहर मराक़श के बयाबान में हैऔर पोशीदा मुसलमान के ईमान में हैचश्म-ए-अक़्वाम ये नज़्ज़ारा अबद तक देखेरिफ़अत-ए-शान-ए-रफ़ाना-लका-ज़िक्र देखेमर्दुम-ए-चश्म-ए-ज़मीं यानी वो काली दुनियावो तुम्हारे शोहदा पालने वाली दुनियागर्मी-ए-मेहर की परवरदा हिलाली दुनियाइश्क़ वाले जिसे कहते हैं बिलाली दुनियातपिश-अंदोज़ है इस नाम से पारे की तरहग़ोता-ज़न नूर में है आँख के तारे की तरहअक़्ल है तेरी सिपर इश्क़ है शमशीर तिरीमिरे दरवेश ख़िलाफ़त है जहाँगीर तिरीमा-सिवा-अल्लाह के लिए आग है तकबीर तिरीतू मुसलमाँ हो तो तक़दीर है तदबीर तिरीकी मोहम्मद से वफ़ा तू ने तो हम तेरे हैंये जहाँ चीज़ है क्या लौह-ओ-क़लम तेरे हैं
फिर कोई आया दिल-ए-ज़ार नहीं कोई नहींराह-रौ होगा कहीं और चला जाएगाढल चुकी रात बिखरने लगा तारों का ग़ुबारलड़खड़ाने लगे ऐवानों में ख़्वाबीदा चराग़सो गई रास्ता तक तक के हर इक राहगुज़ारअजनबी ख़ाक ने धुँदला दिए क़दमों के सुराग़गुल करो शमएँ बढ़ा दो मय ओ मीना ओ अयाग़अपने बे-ख़्वाब किवाड़ों को मुक़फ़्फ़ल कर लोअब यहाँ कोई नहीं कोई नहीं आएगा
सितारे जो दमकते हैंकिसी की चश्म-ए-हैराँ मेंमुलाक़ातें जो होती हैंजमाल-ए-अब्र-ओ-बाराँ मेंये ना-आबाद वक़्तों मेंदिल-ए-नाशाद में होगीमोहब्बत अब नहीं होगीये कुछ दिन बा'द में होगीगुज़र जाएँगे जब ये दिनये उन की याद में होगी
नहीं मालूम 'ज़रयून' अब तुम्हारी उम्र क्या होगीमिरे ख़ुद से गुज़रने के ज़माने से सिवा होगीमिरे क़ामत से अब क़ामत तुम्हारा कुछ फ़ुज़ूँ होगामिरा फ़र्दा मिरे दीरोज़ से भी ख़ुश नुमूं होगाहिसाब-ए-माह-ओ-साल अब तक कभी रक्खा नहीं मैं नेकिसी भी फ़स्ल का अब तक मज़ा चक्खा नहीं मैं नेमैं अपने आप में कब रह सका कब रह सका आख़िरकभी इक पल को भी अपने लिए सोचा नहीं मैं नेहिसाब-ए-माह-ओ-साल ओ रोज़-ओ-शब वो सोख़्ता-बूदशमुसलसल जाँ-कनी के हाल में रखता भी तो कैसेजिसे ये भी न हो मालूम वो है भी तो क्यूँ-कर हैकोई हालत दिल-ए-पामाल में रखता भी तो कैसेकोई निस्बत भी अब तो ज़ात से बाहर नहीं मेरीकोई बिस्तर नहीं मेरा कोई चादर नहीं मेरी
कोई ये कैसे बताए कि वो तन्हा क्यूँ हैवो जो अपना था वही और किसी का क्यूँ हैयही दुनिया है तो फिर ऐसी ये दुनिया क्यूँ हैयही होता है तो आख़िर यही होता क्यूँ हैइक ज़रा हाथ बढ़ा दें तो पकड़ लें दामनउन के सीने में समा जाए हमारी धड़कनइतनी क़ुर्बत है तो फिर फ़ासला इतना क्यूँ हैदिल-ए-बर्बाद से निकला नहीं अब तक कोईइस लुटे घर पे दिया करता है दस्तक कोईआस जो टूट गई फिर से बंधाता क्यूँ हैतुम मसर्रत का कहो या इसे ग़म का रिश्ताकहते हैं प्यार का रिश्ता है जनम का रिश्ताहै जनम का जो ये रिश्ता तो बदलता क्यूँ है
दयार-ए-इश्क़ में अपना मक़ाम पैदा करनया ज़माना नए सुब्ह ओ शाम पैदा करख़ुदा अगर दिल-ए-फ़ितरत-शनास दे तुझ कोसुकूत-ए-लाला-ओ-गुल से कलाम पैदा करउठा न शीशागरान-ए-फ़रंग के एहसाँसिफ़ाल-ए-हिन्द से मीना ओ जाम पैदा करमैं शाख़-ए-ताक हूँ मेरी ग़ज़ल है मेरा समरमिरे समर से मय-ए-लाला-फ़ाम पैदा करमिरा तरीक़ अमीरी नहीं फ़क़ीरी हैख़ुदी न बेच ग़रीबी में नाम पैदा कर
वो गुदाज़-ए-दिल-ए-मरहूम कहाँ से लाऊँअब मैं वो जज़्बा-ए-मासूम कहाँ से लाऊँ
दलील-ए-सुब्ह-ए-रौशन है सितारों की तुनुक-ताबीउफ़ुक़ से आफ़्ताब उभरा गया दौर-ए-गिराँ-ख़्वाबीउरूक़-मुर्दा-ए-मशरिक़ में ख़ून-ए-ज़िंदगी दौड़ासमझ सकते नहीं इस राज़ को सीना ओ फ़ाराबीमुसलमाँ को मुसलमाँ कर दिया तूफ़ान-ए-मग़रिब नेतलातुम-हा-ए-दरिया ही से है गौहर की सैराबीअता मोमिन को फिर दरगाह-ए-हक़ से होने वाला हैशिकोह-ए-तुर्कमानी ज़ेहन हिन्दी नुत्क़ आराबीअसर कुछ ख़्वाब का ग़ुंचों में बाक़ी है तू ऐ बुलबुलनवा-रा तल्ख़-तरमी ज़न चू ज़ौक़-ए-नग़्मा कम-याबीतड़प सेहन-ए-चमन में आशियाँ में शाख़-सारों मेंजुदा पारे से हो सकती नहीं तक़दीर-ए-सीमाबीवो चश्म-ए-पाक हैं क्यूँ ज़ीनत-ए-बर-गुस्तवाँ देखेनज़र आती है जिस को मर्द-ए-ग़ाज़ी की जिगर-ताबीज़मीर-ए-लाला में रौशन चराग़-ए-आरज़ू कर देचमन के ज़र्रे ज़र्रे को शहीद-ए-जुस्तुजू कर देसरिश्क-ए-चश्म-ए-मुस्लिम में है नैसाँ का असर पैदाख़लीलुल्लाह के दरिया में होंगे फिर गुहर पैदाकिताब-ए-मिल्लत-ए-बैज़ा की फिर शीराज़ा-बंदी हैये शाख़-ए-हाशमी करने को है फिर बर्ग-ओ-बर पैदारबूद आँ तुर्क शीराज़ी दिल-ए-तबरेज़-ओ-काबुल रासबा करती है बू-ए-गुल से अपना हम-सफ़र पैदाअगर उस्मानियों पर कोह-ए-ग़म टूटा तो क्या ग़म हैकि ख़ून-ए-सद-हज़ार-अंजुम से होती है सहर पैदाजहाँबानी से है दुश्वार-तर कार-ए-जहाँ-बीनीजिगर ख़ूँ हो तो चश्म-ए-दिल में होती है नज़र पैदाहज़ारों साल नर्गिस अपनी बे-नूरी पे रोती हैबड़ी मुश्किल से होता है चमन में दीदा-वर पैदानवा-पैरा हो ऐ बुलबुल कि हो तेरे तरन्नुम सेकबूतर के तन-ए-नाज़ुक में शाहीं का जिगर पैदातिरे सीने में है पोशीदा राज़-ए-ज़िंदगी कह देमुसलमाँ से हदीस-ए-सोज़-ओ-साज़-ए-ज़िंदगी कह देख़ुदा-ए-लम-यज़ल का दस्त-ए-क़ुदरत तू ज़बाँ तू हैयक़ीं पैदा कर ऐ ग़ाफ़िल कि मग़लूब-ए-गुमाँ तू हैपरे है चर्ख़-ए-नीली-फ़ाम से मंज़िल मुसलमाँ कीसितारे जिस की गर्द-ए-राह हों वो कारवाँ तो हैमकाँ फ़ानी मकीं फ़ानी अज़ल तेरा अबद तेराख़ुदा का आख़िरी पैग़ाम है तू जावेदाँ तू हैहिना-बंद-ए-उरूस-ए-लाला है ख़ून-ए-जिगर तेरातिरी निस्बत बराहीमी है मेमार-ए-जहाँ तू हैतिरी फ़ितरत अमीं है मुम्किनात-ए-ज़िंदगानी कीजहाँ के जौहर-ए-मुज़्मर का गोया इम्तिहाँ तो हैजहान-ए-आब-ओ-गिल से आलम-ए-जावेद की ख़ातिरनबुव्वत साथ जिस को ले गई वो अरमुग़ाँ तू हैये नुक्ता सरगुज़िश्त-ए-मिल्लत-ए-बैज़ा से है पैदाकि अक़्वाम-ए-ज़मीन-ए-एशिया का पासबाँ तू हैसबक़ फिर पढ़ सदाक़त का अदालत का शुजाअ'त कालिया जाएगा तुझ से काम दुनिया की इमामत कायही मक़्सूद-ए-फ़ितरत है यही रम्ज़-ए-मुसलमानीउख़ुव्वत की जहाँगीरी मोहब्बत की फ़रावानीबुतान-ए-रंग-ओ-ख़ूँ को तोड़ कर मिल्लत में गुम हो जान तूरानी रहे बाक़ी न ईरानी न अफ़्ग़ानीमियान-ए-शाख़-साराँ सोहबत-ए-मुर्ग़-ए-चमन कब तकतिरे बाज़ू में है परवाज़-ए-शाहीन-ए-क़हस्तानीगुमाँ-आबाद हस्ती में यक़ीं मर्द-ए-मुसलमाँ काबयाबाँ की शब-ए-तारीक में क़िंदील-ए-रुहबानीमिटाया क़ैसर ओ किसरा के इस्तिब्दाद को जिस नेवो क्या था ज़ोर-ए-हैदर फ़क़्र-ए-बू-ज़र सिद्क़-ए-सलमानीहुए अहरार-ए-मिल्लत जादा-पैमा किस तजम्मुल सेतमाशाई शिगाफ़-ए-दर से हैं सदियों के ज़िंदानीसबात-ए-ज़िंदगी ईमान-ए-मोहकम से है दुनिया मेंकि अल्मानी से भी पाएँदा-तर निकला है तूरानीजब इस अँगारा-ए-ख़ाकी में होता है यक़ीं पैदातो कर लेता है ये बाल-ओ-पर-ए-रूह-उल-अमीं पैदाग़ुलामी में न काम आती हैं शमशीरें न तदबीरेंजो हो ज़ौक़-ए-यक़ीं पैदा तो कट जाती हैं ज़ंजीरेंकोई अंदाज़ा कर सकता है उस के ज़ोर-ए-बाज़ू कानिगाह-ए-मर्द-ए-मोमिन से बदल जाती हैं तक़दीरेंविलायत पादशाही इल्म-ए-अशिया की जहाँगीरीये सब क्या हैं फ़क़त इक नुक्ता-ए-ईमाँ की तफ़्सीरेंबराहीमी नज़र पैदा मगर मुश्किल से होती हैहवस छुप छुप के सीनों में बना लेती है तस्वीरेंतमीज़-ए-बंदा-ओ-आक़ा फ़साद-ए-आदमियत हैहज़र ऐ चीरा-दस्ताँ सख़्त हैं फ़ितरत की ताज़ीरेंहक़ीक़त एक है हर शय की ख़ाकी हो कि नूरी होलहू ख़ुर्शीद का टपके अगर ज़र्रे का दिल चीरेंयक़ीं मोहकम अमल पैहम मोहब्बत फ़ातेह-ए-आलमजिहाद-ए-ज़िंदगानी में हैं ये मर्दों की शमशीरेंचे बायद मर्द रा तब-ए-बुलंद मशरब-ए-नाबेदिल-ए-गरमे निगाह-ए-पाक-बीने जान-ए-बेताबेउक़ाबी शान से झपटे थे जो बे-बाल-ओ-पर निकलेसितारे शाम के ख़ून-ए-शफ़क़ में डूब कर निकलेहुए मदफ़ून-ए-दरिया ज़ेर-ए-दरिया तैरने वालेतमांचे मौज के खाते थे जो बन कर गुहर निकलेग़ुबार-ए-रहगुज़र हैं कीमिया पर नाज़ था जिन कोजबीनें ख़ाक पर रखते थे जो इक्सीर-गर निकलेहमारा नर्म-रौ क़ासिद पयाम-ए-ज़िंदगी लायाख़बर देती थीं जिन को बिजलियाँ वो बे-ख़बर निकलेहरम रुस्वा हुआ पीर-ए-हरम की कम-निगाही सेजवानान-ए-ततारी किस क़दर साहब-नज़र निकलेज़मीं से नूरयान-ए-आसमाँ-परवाज़ कहते थेये ख़ाकी ज़िंदा-तर पाएँदा-तर ताबिंदा-तर निकलेजहाँ में अहल-ए-ईमाँ सूरत-ए-ख़ुर्शीद जीते हैंइधर डूबे उधर निकले उधर डूबे इधर निकलेयक़ीं अफ़राद का सरमाया-ए-तामीर-ए-मिल्लत हैयही क़ुव्वत है जो सूरत-गर-ए-तक़दीर-ए-मिल्लत हैतू राज़-ए-कुन-फ़काँ है अपनी आँखों पर अयाँ हो जाख़ुदी का राज़-दाँ हो जा ख़ुदा का तर्जुमाँ हो जाहवस ने कर दिया है टुकड़े टुकड़े नौ-ए-इंसाँ कोउख़ुव्वत का बयाँ हो जा मोहब्बत की ज़बाँ हो जाये हिन्दी वो ख़ुरासानी ये अफ़्ग़ानी वो तूरानीतू ऐ शर्मिंदा-ए-साहिल उछल कर बे-कराँ हो जाग़ुबार-आलूदा-ए-रंग-ओ-नसब हैं बाल-ओ-पर तेरेतू ऐ मुर्ग़-ए-हरम उड़ने से पहले पर-फ़िशाँ हो जाख़ुदी में डूब जा ग़ाफ़िल ये सिर्र-ए-ज़िंदगानी हैनिकल कर हल्क़ा-ए-शाम-ओ-सहर से जावेदाँ हो जामसाफ़-ए-ज़िंदगी में सीरत-ए-फ़ौलाद पैदा करशबिस्तान-ए-मोहब्बत में हरीर ओ पर्नियाँ हो जागुज़र जा बन के सैल-ए-तुंद-रौ कोह ओ बयाबाँ सेगुलिस्ताँ राह में आए तो जू-ए-नग़्मा-ख़्वाँ हो जातिरे इल्म ओ मोहब्बत की नहीं है इंतिहा कोईनहीं है तुझ से बढ़ कर साज़-ए-फ़ितरत में नवा कोईअभी तक आदमी सैद-ए-ज़बून-ए-शहरयारी हैक़यामत है कि इंसाँ नौ-ए-इंसाँ का शिकारी हैनज़र को ख़ीरा करती है चमक तहज़ीब-ए-हाज़िर कीये सन्नाई मगर झूटे निगूँ की रेज़ा-कारी हैवो हिकमत नाज़ था जिस पर ख़िरद-मंदान-ए-मग़रिब कोहवस के पंजा-ए-ख़ूनीं में तेग़-ए-कार-ज़ारी हैतदब्बुर की फ़ुसूँ-कारी से मोहकम हो नहीं सकताजहाँ में जिस तमद्दुन की बिना सरमाया-दारी हैअमल से ज़िंदगी बनती है जन्नत भी जहन्नम भीये ख़ाकी अपनी फ़ितरत में न नूरी है न नारी हैख़रोश-आमोज़ बुलबुल हो गिरह ग़ुंचे की वा कर देकि तू इस गुल्सिताँ के वास्ते बाद-ए-बहारी हैफिर उट्ठी एशिया के दिल से चिंगारी मोहब्बत कीज़मीं जौलाँ-गह-ए-अतलस क़बायान-ए-तातारी हैबया पैदा ख़रीदा रास्त जान-ए-ना-वान-ए-रापस अज़ मुद्दत गुज़ार उफ़्ताद बर्मा कारवाने राबया साक़ी नवा-ए-मुर्ग़-ज़ार अज़ शाख़-सार आमदबहार आमद निगार आमद निगार आमद क़रार आमदकशीद अब्र-ए-बहारी ख़ेमा अंदर वादी ओ सहरासदा-ए-आबशाराँ अज़ फ़राज़-ए-कोह-सार आमदसरत गर्दम तोहम क़ानून पेशीं साज़ दह साक़ीकि ख़ैल-ए-नग़्मा-पर्दाज़ाँ क़तार अंदर क़तार आमदकनार अज़ ज़ाहिदाँ बर-गीर ओ बेबाकाना साग़र-कशपस अज़ मुद्दत अज़ीं शाख़-ए-कुहन बाँग-ए-हज़ार आमदब-मुश्ताक़ाँ हदीस-ए-ख़्वाजा-ए-बदरौ हुनैन आवरतसर्रुफ़-हा-ए-पिन्हानश ब-चश्म-ए-आश्कार आमददिगर शाख़-ए-ख़लील अज़ ख़ून-ए-मा नमनाक मी गर्ददब-बाज़ार-ए-मोहब्बत नक़्द-ए-मा कामिल अय्यार आमदसर-ए-ख़ाक-ए-शाहीरे बर्ग-हा-ए-लाला मी पाशमकि ख़ूनश बा-निहाल-ए-मिल्लत-ए-मा साज़गार आमदबया ता-गुल बा-अफ़ोशनीम ओ मय दर साग़र अंदाज़ेमफ़लक रा सक़्फ़ ब-शागाफ़ेम ओ तरह-ए-दीगर अंदाज़ेम
हर शाम यहाँ शाम-ए-वीराँ आसेब-ज़दा रस्ते गलियाँजिस शहर की धुन में निकले थे वो शहर दिल-ए-बर्बाद कहाँसहरा को चमन बन को गुलशन बादल को रिदा क्या लिखनाज़ुल्मत को ज़िया सरसर को सबा बंदे को ख़ुदा क्या लिखना
तन्हाई में क्या क्या न तुझे याद किया हैक्या क्या न दिल-ए-ज़ार ने ढूँडी हैं पनाहेंआँखों से लगाया है कभी दस्त-ए-सबा कोडाली हैं कभी गर्दन-ए-महताब में बाहें
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