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नज़्म
यूँही देखूँ जो राखी को तो ये रंगीन डोरा है
जो देखूँ ग़ौर से इस को तो है ज़ंजीर लोहे की
फौज़िया मुग़ल
नज़्म
तुम्हारी ज़ुल्फ़ से महकी हुई रातों में खो जाऊँ
इसे मैं कैसे समझाऊँ कि अब ये साँस का डोरा
वसीम बरेलवी
नज़्म
सो मैं ने साहत-ए-दीरोज़ में डाला है अब डेरा
मिरे दीरोज़ में ज़हर-ए-हलाहल तेग़-ए-क़ातिल है
जौन एलिया
नज़्म
हबीब जालिब
नज़्म
सब ठाठ पड़ा रह जावेगा जब लाद चलेगा बंजारा
हर मंज़िल में अब साथ तिरे ये जितना डेरा-डांडा है
नज़ीर अकबराबादी
नज़्म
क़ाफ़िले में ग़ैर फ़रियाद-ए-दिरा कुछ भी नहीं
इक मता-ए-दीदा-ए-तर के सिवा कुछ भी नहीं
अल्लामा इक़बाल
नज़्म
जिस में सदियों के तहय्युर के पड़े हों डोरे
क्या तुझे रूह के पत्थर की ज़रूरत होगी