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नज़्म
यकसाँ नज़दीक-ओ-दूर पे था बारान-ए-फ़ैज़-ए-आम तिरा
हर दश्त-ओ-चमन हर कोह-ओ-दमन में गूँजा है पैग़ाम तिरा
आनंद नारायण मुल्ला
नज़्म
मआ'ज़-अल्लाह अब हर हर क़दम पर दाम है साक़ी
गुलिस्ताँ में ये आज़ादी का फ़ैज़-ए-आम है साक़ी
शमीम फ़ारूक़ बांस पारी
नज़्म
अब भी ख़िज़ाँ का राज है लेकिन कहीं कहीं
गोशे रह-ए-चमन में ग़ज़ल-ख़्वाँ हुए तो हैं
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
नज़्म
ऐ ख़ाक-ए-हिंद तेरी अज़्मत में क्या गुमाँ है
दरिया-ए-फ़ैज़-ए-क़ुदरत तेरे लिए रवाँ है
चकबस्त बृज नारायण
नज़्म
ऐ ख़ाक-ए-हिंद तेरी 'अज़्मत में क्या गुमाँ है
दरिया-ए-फ़ैज़-ए-क़ुदरत तेरे लिए रवाँ है
चकबस्त बृज नारायण
नज़्म
बज़्म-गाह-ए-हुस्न में इक परतव-ए-फ़ैज़-ए-जमाल
सैद-गाह-ए-इश्क़ में है एक सैद-ए-ख़स्ता-हाल