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नज़्म
क्या कहा बहर-ए-मुसलमाँ है फ़क़त वादा-ए-हूर
शिकवा बेजा भी करे कोई तो लाज़िम है शुऊर
अल्लामा इक़बाल
नज़्म
वासिल-ए-मंज़िल-ए-मक़्सूद न होते क्यूँकर
फ़रस-ए-इश्क़ पे असवार गुरु-नानक थे
श्याम सुंदर लाल बर्क़
नज़्म
अस्प ईराँ में अरब में फ़रस कहलाता है ये
और हिन्दोस्तान में घोड़ा कहा जाता है ये
मुर्तजा साहिल तस्लीमी
नज़्म
इलियास बाबर आवान
नज़्म
फ़रस इब्न-ए-ज़ियादा के लिए उज़्व ज़ियादा है
सवारी वास्ते मुश्की हिरन ज़ंजीर करते हैं
मोहम्मद अनवर ख़ालिद
नज़्म
यूँ न था मैं ने फ़क़त चाहा था यूँ हो जाए
और भी दुख हैं ज़माने में मोहब्बत के सिवा