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नज़्म
इस क़ौम की फ़लाह है जाम-ओ-सुबू के बेच
तुम इंतिख़ाब जा के लड़ो हाव-हू के बीच
सय्यद मोहम्मद जाफ़री
नज़्म
आज-कल पेश-ए-नज़र है मुल्क-ओ-मिल्लत की फ़लाह
इक भतीजे की दुकाँ का भी करूँगा इफ़्तिताह
सय्यद मोहम्मद जाफ़री
नज़्म
यूँ न था मैं ने फ़क़त चाहा था यूँ हो जाए
और भी दुख हैं ज़माने में मोहब्बत के सिवा
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
नज़्म
क्या कहा बहर-ए-मुसलमाँ है फ़क़त वादा-ए-हूर
शिकवा बेजा भी करे कोई तो लाज़िम है शुऊर
अल्लामा इक़बाल
नज़्म
बढ़ रही हैं गोद फैलाए हुए रुस्वाइयाँ
ऐ ग़म-ए-दिल क्या करूँ ऐ वहशत-ए-दिल क्या करूँ
असरार-उल-हक़ मजाज़
नज़्म
चंद रोज़ और मिरी जान फ़क़त चंद ही रोज़
ज़ुल्म की छाँव में दम लेने पे मजबूर हैं हम
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
नज़्म
मेरी हर फ़तह में है एक हज़ीमत पिन्हाँ
हर मसर्रत में है राज़-ए-ग़म-ओ-हसरत पिन्हाँ