aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair
jis ke hote hue hote the zamāne mere
परिणाम "far"
होता है मह-वशों का वो आलम तिरे हुज़ूरजैसे चराग़-ए-मुर्दा सर-ए-बज़्म-ए-शम-ए-तूरआ कर तिरी जनाब में ऐ कार-साज़-ए-नूरपलकों में मुँह छुपाते हैं झेंपे हुए ग़ुरूरआती है एक लहर सी चेहरों पर आह कीआँखों में छूट जाती हैं नब्ज़ें निगाह की
इक लड़की थी छोटी सीदुबली सी और मोटी सीनन्ही सी और मुन्नी सीबिल्कुल ही थन मथनी सीउस के बाल थे काले सेसीधे घुँघराले सेमुँह पर उस के लाली सीचट्टी सी मटियाली सीउस की नाक पकोड़ी सीनोकीली सी चौड़ी सीआँखें काली नीली सीसुर्ख़ सफ़ेद और पीली सीकपड़े उस के थैले सेउजले से और मैले सेये लड़की थी भोली सीबी बी सी और गोली सीहर दम खेल था काम उस काशादाँ बी-बी नाम था उस काहँसती थी और रोती थीजागती थी और सोती थीहर दम उस की अम्माँ-जानखींचा करती उस के कानकहती थीं मकतब को जाखेलों में मत वक़्त गँवाअम्मी सब कुछ कहती थीशादाँ खेलती रहती थीइक दिन शादाँ खेल में थीआए उस के अब्बा जीवो लाहौर से आए थेचीज़ें वीज़ें लाए थेबॉक्स में थीं ये चीज़ें सबख़ैर तमाशा देखो अबअब्बा ने आते ही कहाशादाँ आ कुछ पढ़ के सुनागुम थी इक मुद्दत से किताबक्या देती इस वक़्त जवाबदो बहनें थीं शादाँ कीछोटी नन्ही मुन्नी सीनाम था मंझली का सीमाँगुड़िया सी नन्ही नादाँवो बोली ऐ अब्बा जीअब तो पढ़ती हूँ मैं भीबिल्ली है सी ए टी कैटचूहा है आर ए टी रैटमुँह माउथ है नाक है नोज़और गुलाब का फूल है रोज़मैं ने अब्बा जी देखाख़ूब सबक़ है याद कियाशादाँ ने उस वक़्त कहामैं ने ही तो सिखाया थालेकिन अब्बा ने चुप चापखोला बॉक्स को उठ कर आपइस में जो चीज़ें निकलेंसारी सीमाँ को दे देंइक चीनी की गुड़िया थीइक जादू की पुड़िया थीइक नन्ही सी थी मोटरआप ही चलती थी फ़र-फ़रगेंदों का इक जोड़ा थाइक लकड़ी का घोड़ा थाइक सीटी थी इक बाजाएक था मिट्टी का राजाशादाँ को कुछ भी न मिलायानी खेल की पाई सज़ाअब वो ग़ौर से पढ़ती हैपूरे तौर से पढ़ती है
हलवे के लिए फिर आज भी हम इक आस लगाए बैठे हैंजो बात ज़बाँ पर ला न सके वो दिल में छुपाए बैठे हैंथोड़ी सी मिठाई ताक़ पे थी मुट्ठी में चुराए बैठे हैंअब्बू के भगाए भागे थे अम्मी के बुलाए बैठे हैंकुछ बच भी गई हैं पिटने से कुछ मार भी खाए बैठे हैंतुझ से तो हमें कोई शिकवा ऐ ख़ालिक़-ए-सुब्ह-ओ-शाम नहींस्कूल ही ऐसा है कि जहाँ कुछ चैन नहीं आराम नहींइस वक़्त अगरचे सर में किसी के दर्द बराए नाम नहींहर वक़्त मगर पढ़ते रहना कम-उम्रों का तो काम नहींसब अपनी अपनी कुर्सी पर सुध-बुध बिसराए बैठे हैंइक बार कहीं से मिल जाता हम सब को चराग़-ए-चैन अगरबस साल में इक दिन पढ़ लेते दर्जे की किताबें फ़र फ़र फ़रफिर ख़्वाब ही दिलचस्पी रहती फिर ख़ूब मज़ा आता दिन भरस्कूल में जाना क्यूँ होता हर रोज़ ये रहता क्यूँ चक्करउम्मीद नहीं लेकिन फिर भी उम्मीद लगाए बैठे हैंलेकिन ये ज़माना इल्म का है ये वक़्त है आगे बढ़ने कामिल-जुल के करेंगे गर मेहनत हो जाएगा हर सपना पूराहिम्मत से हुई हैं तामीरें जुरअत से हुआ है काम नयाजब अज़्म-ओ-अमल अच्छा होगा अच्छा ही नतीजा भी होगाहम लोग यहाँ हलवा खा कर इक शम्अ' जलाए बैठे हैं
जहाँ में हर तरफ़ है इल्म ही की गर्म-बाज़ारीज़मीं से आसमाँ तक बस इसी का फ़ैज़ है जारीयही सरचश्मा-ए-असली है तहज़ीब-ओ-तमद्दुन काबग़ैर इस के बशर होना भी है इक सख़्त बीमारीबनाता है यही इंसान को कामिल-तरीन इंसाँसिखाता है यही अख़्लाक़ ओ ईसार ओ रवा-दारीयही क़ौमों को पहुँचाता है बाम-ए-औज-ओ-रिफ़अत परयही मुल्कों के अंदर फूँकता है रूह-ए-बेदारीइसी के नाम का चलता है सिक्का सारे आलम मेंइसी के सर पे रहता है हमेशा ताज-ए-सरदारीइसी के सब करिश्मे ये नज़र आते हैं दुनिया मेंइसी के दम से रौनक़ आलम-ए-इम्काँ की है सारीये ला-सिलकी, ये टेलीफ़ोन ये रेलें, ये तय्यारेये ज़ेर-ए-आब ओ बाला-ए-फ़लक इंसाँ की तर्रारीहुदूद-ए-इस्तवा क़ुतबैन से यूँ हो गए मुदग़मकि है अब रुबअ मस्कों जैसे घर की चार-दीवारीसमुंदर हो गए पायाब सहरा बिन गए गुलशनकिया साइंस ने भी ए'तराफ़-ए-इज्ज़-ओ-नाचारीबुख़ार ओ बर्क़ का जर्रार लश्कर है अब आमादाउगलवा ले ज़मीन ओ आसमाँ की दौलतें सारीग़रज़ चारों तरफ़ अब इल्म ही की बादशाही हैकि उस के बाज़ूओं में क़ुव्वत-ए-दस्त-ए-इलाही हैनिगाह-ए-ग़ौर से देखो अगर हालात-ए-इंसानीतो हो सकता है हल ये उक़्दा-ए-मुश्किल ब-आसानीवही क़ौमें तरक़्क़ी के मदारिज पर हैं फाएक़-तरकि है जिन में तमद्दुन और सियासत की फ़रावानीइसी के ज़ोम में है जर्मनी चर्ख़-ए-तफ़ाख़ुर परइसी के ज़ोर पर मिर्रीख़ का हम-सर है जापानीइसी की क़ुव्वत-ए-बाज़ू पे है मग़रूर अमरीकाइसी के बिल पर लड़की हो रही है रुस्तम-ए-सानीइशारे पर इसी के नक़्ल-ओ-हरकत है सब इटली कीइसी के ताबा-ए-फ़रमान हैं रूसी ओ ईरानीइसी के जुम्बिश-ए-अबरू पे है इंग्लैण्ड का ग़र्राइसी के हैं सब आवुर्दे फ़्रांसीसी ओ एल्बानीकोई मुल्क अब नहीं जिन में ये जौहर हो न रख़्शंदान ग़ाफ़िल इस से चीनी हैं न शामी हैं न अफ़्ग़ानीबग़ैर इस के जो रहना चाहते हैं इस ज़माने मेंसमझ रक्खें फ़ना उन के लिए है हुक्म-ए-रब्बानीज़माना फेंक देगा ख़ुद उन्हें क़अ'र-ए-हलाकत मेंवो अपने हाथ से होंगे ख़ुद अपनी क़ब्र के बानीज़माने में जिसे हो साहिब-ए-फ़तह-ओ-ज़फ़र होनाज़रूरी है उसे इल्म-ओ-हुनर से बहरा-वर होनातरक़्क़ी की खुली हैं शाहराहें दहर में हर सूनज़र आता है तहज़ीब-ओ-तमद्दुन से जहाँ ममलूचले जाते हैं उड़ते शहसवारान-ए-फ़लक-पैमाख़िराज-ए-तहनियत लेते हुए करते हुए जादूगुज़रते जा रहे हैं दूसरों को छोड़ते पीछेकभी होता है सहरा मुस्तक़र उन का कभी टापूकमर बाँधे हुए दिन रात चलने पर हैं आमादादिमाग़ अफ़्कार से और दिल वुफ़ूर-ए-शौक़ से मलूलअलग रह कर ख़याल-ए-ज़हमत ओ एहसास-ए-राहत सेलगे हैं अपनी अपनी फ़िक्र में बा-ख़ातिर-ए-यकसूमगर हम हैं कि असलन हिस नहीं हम को कोई इस कीहमारे पा-ए-हिम्मत इन मराहिल में हैं बे-क़ाबूजहाँ पहला क़दम रक्खा था रोज़-ए-अव्वलीं हम नेनहीं सरके इस अपने असली मरकज़ से ब-क़द्र-ए-मूये हालत है कि हम पर बंद है हर एक दरवाज़ानज़र आता नहीं हरगिज़ कोई उम्मीद का पहलूमगर वा-हसरता फिर भी हम अपने ज़ोम-ए-बातिल मेंसमझते हैं ज़माने भर से आगे ख़ुद को मंज़िल मेंज़रूरत है कि हम में रौशनी हो इल्म की पैदानज़र आए हमें भी ताकि अस्ल-ए-हालत-ए-दुनियाहमें मालूम हो हालात अब क्या हैं ज़माने केहमारे साथ का जो क़ाफ़िला था वो कहाँ पहुँचाजो पस्ती में थे अब वो जल्वा-गर हैं बाम-ए-रिफ़अत परजो बालक बे-निशाँ थे आज है इन का अलम बरपाहमारी ख़ूबियाँ सब दूसरों ने छीन लीं हम सेज़माने ने हमें इतना झिंझोड़ा कर दिया नंगारवा-दारी, उख़ुव्वत, दोस्ती, ईसार, हमदर्दीख़्याल-ए-मुल्क-ओ-मिल्लत, दर्द-ए-क़ौम, अंदेशा-ए-फ़र्दाये सब जौहर हमारे थे कभी ऐ वाए-महरूमीबने हैं ख़ूबी-ए-क़िस्मत से जो अब ग़ैर का हिस्साअगर हो जाएँ राग़िब अब भी हम तालीम की जानिबतो कर सकते हैं अब भी मुल्क में हम ज़िंदगी पैदाबहुत कुछ वक़्त हम ने खो दिया है लेकिन इस पर भीअगर चाहें तो कर दें पेश-रौ को अपने हम पसपानिकम्मा कर दिया है काहिली ने गो हमें लेकिनरगों में है हमारी ख़ून अभी तक दौड़ता फिरताकोई मख़्फ़ी हरारत गर हमारे दिल को गरमा देहमारे जिस्म में फिर ज़िंदगी की रूह दौड़ा देवतन वालो बहुत ग़ाफ़िल रहे अब होश में आओउठो बे-दार हो अक़्ल-ओ-ख़िरद को काम में लाओतुम्हारे क़ौम के बच्चों में है तालीम का फ़ुक़्दाँये गुत्थी सख़्त पेचीदा है इस को जल्द सुलझाओयही बच्चे बिल-आख़िर तुम सभों के जा-नशीं होंगेतुम अपने सामने जैसा उन्हें चाहो बना जाओबहुत ही रंज-दह हो जाएगी उस वक़्त की ग़फ़लतकहीं ऐसा न हो मौक़ा निकल जाने पे पछताओये है कार-ए-अहम दो चार इस को कर नहीं सकतेख़ुदा-रा तुम भी अपने फ़र्ज़ का एहसास फ़रमाओये बोझ ऐसा नहीं जिस को उठा लें चार छे मिल करसहारा दो, सहारा दूसरों से इस में दिलवाओजो ज़ी-एहसास हैं हासिल करो तुम ख़िदमतें उन कीजो ज़ी-परवा हैं उन को जिस तरह हो उस तरफ़ लाओग़रज़ जैसे भी हो जिस शक्ल से भी हो ये लाज़िम हैतुम अपने क़ौम के बच्चों को अब तालीम दिलवाओअगर तुम मुस्तइ'द्दी को बना लोगे शिआर अपनायक़ीं जानो कि मुस्तक़बिल है बेहद शानदार अपनाख़ुदावंदा! दुआओं में हमारी हो असर पैदाशब-ए-ग़फ़लत हमारी फिर करे नूर-ए-सहर पैदाहमारे सारे ख़्वाबीदा क़वा बे-दार हो जाएँसर-ए-नौ हो फिर इन में ज़िंदगी की कर्र-ओ-फ़र्र पैदाहमें एहसास हो हम कौन थे और आज हम क्या हैंकरें माहौल-ए-मुल्की के लिए गहरी नज़र पैदामिला रक्खा है अपने जौहर-ए-कामिल को मिट्टी मेंहम अब भी ख़ाक से कर सकते हैं लाल-ओ-गुहर पैदाअगर चाहें तो हम मुश्किल वतन की दम में हल कर देंहज़ारों सूरतें कर सकते हैं हम कारगर पैदाब-ज़ाहिर गो हम इक तूदा हैं बिल्कुल राख का लेकिनअगर चाहें तो ख़ाकिस्तर से कर दें सौ शरर पैदावतन का नक्बत ओ अफ़्लास खो दें हम इशारे मेंजहाँ ठोकर लगा दें हो वहीं से कान-ए-ज़र पैदाहम इस मंज़िल के आख़िर पर पहुँच कर बिल-यक़ीं दम लेंअगर कुछ ताज़ा-दम हो जाएँ अपने हम-सफ़र पैदाजो कोशिश मुत्तहिद हो कर कहीं इक बार हो जाएयक़ीं है मुल्क की क़िस्मत का बेड़ा पार हो जाए
शाहिद-ए-बज़्म-ए-सुख़न नाज़ूरा-ए-मअ'नी-तराज़ऐ ख़ुदा-ए-रेख़्ता पैग़मबर-ए-सोज़-अो-गुदाज़यूसुफ़-ए-मुल्क-ए-मआनी पीर-ए-कनआ'न-ए-सुख़नहै तिरी हर बैत अहल-ए-दर्द को बैत-उल-हुज़नऐ शहीद-ए-जलवा-ए-मानी फ़क़ीर-ए-बे-नियाज़इस तरह किस ने कही है दास्तान-ए-सोज़-अो-साज़है अदब उर्दू का नाज़ाँ जिस पे वो है तेरी ज़ातसर-ज़मीन-ए-शेर पर ऐ चश्मा-ए-आब-ए-हयाततफ़्ता-दिल आशुफ़्ता-सर आतिश-नवा बे-ख़ेशतनआह तेरी सीना-सोज़ और नाला तेरा दिल-शिकनख़त्म तुझ पर हो गया लुत्फ़-ए-बयान-ए-आशिक़ीमर्हबा ऐ वाक़िफ़-ए-राज़-ए-निहान-ए-आशिक़ीसर-ज़मीन-ए-शेर काबा और तू इस का ख़लीलशाख़-ए-तूबा-ए-सुख़न पर हमनवा-ए-जिब्रईलजोश-ए-इस्तिग़्ना तिरा तेरे लिए वजह-ए-नशातशान-ए-ख़ुद्दारी तिरी आईना-दार-ए-एहतियातबज़्म से गुज़रा कमाल-ए-फ़क़्र दिखलाता हुआताज-ए-शाही पा-ए-इस्ति़ग़ना से ठुकराता हुआथा दिमाग़-ओ-दिल में सहबा-ए-क़नाअत का सुरूरथी जवाब-ए-सतवत-ए-शाही तिरी तब-ए-ग़यूरमौजा-ए-बहर-ए-क़नाअत तेरी अबरू की शिकनतख्त-ए-शाही पर हसीर-ए-फ़क़्र तेरा ख़ंदा-ज़नथा ये जौहर तेरी फ़ितरी शाइरी के रूतबा-दाँइज़्ज़त-ए-फ़न थी तिरी नाज़ुक-मिज़ाजी में निहाँमुल्तफ़ित करता तुझे क्या अग़निया का कर्र-ओ-फ़र्रथा तिरी रग रग में दरवेशों की सोहबत का असरदिल तिरा ज़ख़्मों से बज़्म-ए-आशिक़ी में चूर हैजिस सुख़न को देखिए रिसता हुआ नासूर हैबज़्म-गाह-ए-हुस्न में इक परतव-ए-फ़ैज़-ए-जमालसैद-गाह-ए-इश्क़ में है एक सैद-ए-ख़स्ता-हालदेखना हो गर तुझे देखे तिरे अफ़्कार मेंहै तिरी तस्वीर तेरे ख़ूँ-चकाँ अशआ'र मेंसैर के क़ाबिल है दिल सद-पारा उस नख़चीर काजिस के हर टुकड़े में हो पैवस्त पैकाँ तीर काआसमान-ए-शेर पर चमके हैं सय्यारे बहुतअपनी अपनी रौशनी दिखला गए तारे बहुतअहद-ए-गुल है और वही रंगीनी-ए-गुलज़ार हैख़ाक-ए-हिंद अब तक अगर देखो तजल्ली-ज़ार हैऔर भी हैं माअ'रके में शहसवार-ए-यक्का-ताज़और भी हैं मय-कदे में साक़ियान-ए-दिल-नवाज़हैं तो पैमाने वही लेकिन वो मय मिलती नहींनग़्मा-संजों में किसी से तेरी लय मिलती नहींसाहिबान-ए-ज़ौक़ के सीनों में थी जिस की खटकतैरते हैं दिल में वो सर-तेज़ नश्तर आज तककारवान-ए-रफ़्ता को था तेरी यकताई पे नाज़अस्र-ए-मौजूदा ने भी माना है तेरा इम्तियाज़हो गए हैं आज तुझ को एक सौ बाईस सालतो नहीं ज़िंदा है दुनिया में मगर तेरा कमालहक़ है हम पर याद कर के तुझ को रोना चाहिएमातम अपनी ना-शनासी का भी होना चाहिएढूँडते हैं क़ब्र का भी अब निशाँ मिलता नहींऐ ज़मीं तुझ में हमारा आसमाँ मिलता नहीं
एक दिन हज़रत-ए-हाफ़िज़ ने ये देखा मंज़रतौक़-ए-ज़र्रीं से मुज़य्यन है हमा गर्दन-ए-ख़रऔर छकड़े में जुता रेंग रहा है ताज़ीज़ख़्म ही ज़ख़्म है कोड़े का ज़ि-सर ता-ब-कमरथे जौ मरहूम बड़े सादा-दिल ओ नेक-मिज़ाज''ईं-चे शोरीस्त'' कहा और गिरे चकरा करवो तो इस ग़म को लिए ख़ुल्द-ए-बरीं में पहुँचेकई सदियों का ज़माने ने लगाया चक्करआज हम पर भी मगर जब्र-ए-नज़ारा है वहीवही नैरंग-ए-तमाशा वही नैरंग-ए-नज़रवो चारा-गाह-ए-सियासत हो कि मैदान-ए-अदबतौक़-ए-ज़र्रीं है वही और वही गर्दन-ए-ख़रइख़्तियारात की कुर्सी पे ख़रान-ए-फ़र्बामुतमक्किन नज़र आते हैं ब-सद कर्र-ओ-फ़र्रएक कुर्सी पे किसी तरह उचक कर पहुँचेऔर फिर धड़ से खुले कश्फ़-ओ-करामात के दरफिर तो 'बुक़रात' और 'अरस्तू'-ए-ज़माना हैं वोइल्म ओ हिकमत में नहीं फिर कोई उन का हम-सरफिर तो सहरा-ए-जहालत भी है दरिया-ए-उलूमफिर तो इस बे-हुनरी में भी हैं सौ सौ जौहरख़्वाह दो हर्फ़ भी तालीम न हासिल की होतौक़-ए-ज़र्रीं के करिश्मे से बने दानिश-वरकोई जल्सा हो वो ''मेहमान-ए-ख़ोसूसी'' होंगेकोई मौक़ा हो धड़ल्ले से वो देंगे लेक्चरवो ज़मीं के हों मसाइल के ख़ला की बातेंमिस्ल-ए-मिक़राज़ ज़बाँ चलती रहेगी फ़र-फ़रआलिम ओ फ़ाज़िल ओ दानिश-वर ओ अहल-ए-हिकमतसब नज़र आएँगे क़दमों पे झुकाए हुए सरतौक़-ए-ज़र्रीं का जो इस को न करिश्मा कहिएनातिक़ा सर-ब-गिरेबाँ कि इसे क्या कहिए
कल शबजब सूरज नेअपनी आँखें मूँदींअपना दामन खींचाऔर हवा का सरपट घोड़ा बाँध दियाऔर फ़लक पर इक जानिब सेचादर मटियाली सी तानी
फ़र-फ़र उड़ने वाला पंछीटें-टें बोलने वाला तोता
मक़ाम-ए-अज़्मत-ए-इंसाँ को तू ने फ़ाश कियाजुमूद-बस्ता ग़ुलामी को पाश-पाश कियाहयात-ए-सुब्ह-ए-मोहब्बत के नूर में गुम हैअजीब चीज़ तिरा दिल-कुशा तबस्सुम हैये जब्र-ओ-क़हर के बंदे ये शोर-ओ-शर के ग़ुलामन पा सकेंगे तिरी ज़िंदगी की रम्ज़-ए-दवामदिया है सुल्ह-ओ-मुसावात का सबक़ तू नेअता किया है जुनूँ को नया उफ़ुक़ तू नेफ़ना-कदे को बनाया है जन्नत-ए-गुल-पोशरवाँ-दवाँ हैं जहाँ नील-ओ-गंग दोश-ब-दोशये मो'जिज़ा है तिरे ज़ौक़-ए-ताज़ा-कारी काकि सर-निगूँ है फ़र-ओ-फ़ाल शहरयारी कानहीं है तेरे सिवा कोई राज़दान-ए-वतनतुझी से फ़ाएज़-ए-मंज़िल है कारवान-ए-वतनवफ़ा के राग मोहब्बत की आग ले के गयातू अपने साथ वतन का सुहाग ले के गयासितम से रूह-ए-सदाक़त कभी न हारेगीनिगाह-ए-इश्क़ तुझे ता-अबद पुकारेगी
मिरे प्यारे बच्चेबड़ा ज़ुल्म तुम पर हुआ हैब-यक जुम्बिश-ए-सर तुम्हें अपनी मसनद से मा'ज़ूल होना पड़ा हैसमझ में नहीं आता ऐसी ख़ता क्या हुई तुम सेमाना कि तुम अपने भाइयों से ठगने थेया फिर तुम्हारा ठिकाना मुक़र्रर नहीं थातुम अपनी हदों से भटक कर किसी और के दाएरे मेंदर-अंदाज़ होते थे
ऐ ऐश-महल के रहने वालोदेखो तो कभी नज़र उठा करहाल अपने पड़ोसियों का भी कुछटूटे हुए झोंपड़ों के अंदरइंसान की शक्ल में बहाइमऔलाद-ए-बशर गिद्धों से बद-तरनाचार-ओ-तबाह-ओ-ज़ार-ओ-बीमाररुस्वा-ओ-ज़लील-ओ-ख़्वार-ओ-अबतरफ़ाक़ों की है जिन के रुख़ पे ज़र्दीफ़िक्रों से जो हो रहे हैं लाग़रकपड़ा नहीं जिन के तन पे साबितचादर है न जिन के पास बिस्तरसूखी हुई रोटियाँ भी जिन कोमिलती नहीं दो दो वक़्त अक्सरदेखी नहीं अम्न-ओ-आफ़ियत कीसूरत भी जिन्हों ने ज़िंदगी-भरक़िस्मत में नहीं है जिन की आरामकोल्हू का जो बैल हैं सरासरलेकिन तुम्हें ग़ालिबन ये इक बातमालूम नहीं है बंदा-पर्वरसदक़ा है उन्हीं की जूतियों कासारी ये तुम्हारी शौकत-ओ-फ़र्रगर फेर लें ये नज़र कुछ अपनीतुम को न रहे ख़बर कुछ अपनी
हम कामयाब होंगेपढ़ना है दिल लगा करफ़र फ़र सबक़ सुना कर
हमेशा देर कर देता हूँ मैं हर काम करने मेंज़रूरी बात कहनी हो कोई वा'दा निभाना होउसे आवाज़ देनी हो उसे वापस बुलाना होहमेशा देर कर देता हूँ मैंमदद करनी हो उस की यार की ढारस बंधाना होबहुत देरीना रस्तों पर किसी से मिलने जाना होहमेशा देर कर देता हूँ मैंबदलते मौसमों की सैर में दिल को लगाना होकिसी को याद रखना हो किसी को भूल जाना होहमेशा देर कर देता हूँ मैंकिसी को मौत से पहले किसी ग़म से बचाना होहक़ीक़त और थी कुछ उस को जा के ये बताना होहमेशा देर कर देता हूँ मैं हर काम करने में.....
न ये कि वो चले तो कहकशाँ सी रहगुज़र लगेमगर वो साथ हो तो फिर भला भला सफ़र लगे
कुछ इश्क़ किया कुछ काम कियावो लोग बहुत ख़ुश-क़िस्मत थेजो इश्क़ को काम समझते थेया काम से आशिक़ी करते थेहम जीते-जी मसरूफ़ रहेकुछ इश्क़ किया कुछ काम कियाकाम इश्क़ के आड़े आता रहाऔर इश्क़ से काम उलझता रहाफिर आख़िर तंग आ कर हम नेदोनों को अधूरा छोड़ दिया
इन किताबों ने बड़ा ज़ुल्म किया है मुझ परइन में इक रम्ज़ है जिस रम्ज़ का मारा हुआ ज़ेहनमुज़्दा-ए-इशरत-ए-अंजाम नहीं पा सकताज़िंदगी में कभी आराम नहीं पा सकता
तुम जिस ज़मीन पर हो मैं उस का ख़ुदा नहींपस सर-ब-सर अज़िय्यत ओ आज़ार ही रहोबेज़ार हो गई हो बहुत ज़िंदगी से तुमजब बस में कुछ नहीं है तो बेज़ार ही रहोतुम को यहाँ के साया ओ परतव से क्या ग़रज़तुम अपने हक़ में बीच की दीवार ही रहो
चलो इक बार फिर से अजनबी बन जाएँ हम दोनोंन मैं तुम से कोई उम्मीद रखूँ दिल-नवाज़ी कीन तुम मेरी तरफ़ देखो ग़लत-अंदाज़ नज़रों सेन मेरे दिल की धड़कन लड़खड़ाए मेरी बातों सेन ज़ाहिर हो तुम्हारी कश्मकश का राज़ नज़रों से
आश्ना हैं तिरे क़दमों से वो राहें जिन परउस की मदहोश जवानी ने इनायत की हैकारवाँ गुज़रे हैं जिन से उसी रानाई केजिस की इन आँखों ने बे-सूद इबादत की है
क्यूँ ज़ियाँ-कार बनूँ सूद-फ़रामोश रहूँफ़िक्र-ए-फ़र्दा न करूँ महव-ए-ग़म-ए-दोश रहूँनाले बुलबुल के सुनूँ और हमा-तन गोश रहूँहम-नवा मैं भी कोई गुल हूँ कि ख़ामोश रहूँजुरअत-आमोज़ मिरी ताब-ए-सुख़न है मुझ कोशिकवा अल्लाह से ख़ाकम-ब-दहन है मुझ कोहै बजा शेवा-ए-तस्लीम में मशहूर हैं हमक़िस्सा-ए-दर्द सुनाते हैं कि मजबूर हैं हमसाज़ ख़ामोश हैं फ़रियाद से मामूर हैं हमनाला आता है अगर लब पे तो मा'ज़ूर हैं हमऐ ख़ुदा शिकवा-ए-अर्बाब-ए-वफ़ा भी सुन लेख़ूगर-ए-हम्द से थोड़ा सा गिला भी सुन लेथी तो मौजूद अज़ल से ही तिरी ज़ात-ए-क़दीमफूल था ज़ेब-ए-चमन पर न परेशाँ थी शमीमशर्त इंसाफ़ है ऐ साहिब-ए-अल्ताफ़-ए-अमीमबू-ए-गुल फैलती किस तरह जो होती न नसीमहम को जमईयत-ए-ख़ातिर ये परेशानी थीवर्ना उम्मत तिरे महबूब की दीवानी थीहम से पहले था अजब तेरे जहाँ का मंज़रकहीं मस्जूद थे पत्थर कहीं मा'बूद शजरख़ूगर-ए-पैकर-ए-महसूस थी इंसाँ की नज़रमानता फिर कोई अन-देखे ख़ुदा को क्यूँकरतुझ को मालूम है लेता था कोई नाम तिराक़ुव्वत-ए-बाज़ू-ए-मुस्लिम ने किया काम तिराबस रहे थे यहीं सल्जूक़ भी तूरानी भीअहल-ए-चीं चीन में ईरान में सासानी भीइसी मामूरे में आबाद थे यूनानी भीइसी दुनिया में यहूदी भी थे नसरानी भीपर तिरे नाम पे तलवार उठाई किस नेबात जो बिगड़ी हुई थी वो बनाई किस नेथे हमीं एक तिरे मारका-आराओं मेंख़ुश्कियों में कभी लड़ते कभी दरियाओं मेंदीं अज़ानें कभी यूरोप के कलीसाओं मेंकभी अफ़्रीक़ा के तपते हुए सहराओं मेंशान आँखों में न जचती थी जहाँ-दारों कीकलमा पढ़ते थे हमीं छाँव में तलवारों कीहम जो जीते थे तो जंगों की मुसीबत के लिएऔर मरते थे तिरे नाम की अज़्मत के लिएथी न कुछ तेग़ज़नी अपनी हुकूमत के लिएसर-ब-कफ़ फिरते थे क्या दहर में दौलत के लिएक़ौम अपनी जो ज़र-ओ-माल-ए-जहाँ पर मरतीबुत-फ़रोशीं के एवज़ बुत-शिकनी क्यूँ करतीटल न सकते थे अगर जंग में अड़ जाते थेपाँव शेरों के भी मैदाँ से उखड़ जाते थेतुझ से सरकश हुआ कोई तो बिगड़ जाते थेतेग़ क्या चीज़ है हम तोप से लड़ जाते थेनक़्श-ए-तौहीद का हर दिल पे बिठाया हम नेज़ेर-ए-ख़ंजर भी ये पैग़ाम सुनाया हम नेतू ही कह दे कि उखाड़ा दर-ए-ख़ैबर किस नेशहर क़ैसर का जो था उस को किया सर किस नेतोड़े मख़्लूक़ ख़ुदावंदों के पैकर किस नेकाट कर रख दिए कुफ़्फ़ार के लश्कर किस नेकिस ने ठंडा किया आतिश-कदा-ए-ईराँ कोकिस ने फिर ज़िंदा किया तज़्किरा-ए-यज़्दाँ कोकौन सी क़ौम फ़क़त तेरी तलबगार हुईऔर तेरे लिए ज़हमत-कश-ए-पैकार हुईकिस की शमशीर जहाँगीर जहाँ-दार हुईकिस की तकबीर से दुनिया तिरी बेदार हुईकिस की हैबत से सनम सहमे हुए रहते थेमुँह के बल गिर के हू-अल्लाहू-अहद कहते थेआ गया ऐन लड़ाई में अगर वक़्त-ए-नमाज़क़िबला-रू हो के ज़मीं-बोस हुई क़ौम-ए-हिजाज़एक ही सफ़ में खड़े हो गए महमूद ओ अयाज़न कोई बंदा रहा और न कोई बंदा-नवाज़बंदा ओ साहब ओ मोहताज ओ ग़नी एक हुएतेरी सरकार में पहुँचे तो सभी एक हुएमहफ़िल-ए-कौन-ओ-मकाँ में सहर ओ शाम फिरेमय-ए-तौहीद को ले कर सिफ़त-ए-जाम फिरेकोह में दश्त में ले कर तिरा पैग़ाम फिरेऔर मालूम है तुझ को कभी नाकाम फिरेदश्त तो दश्त हैं दरिया भी न छोड़े हम नेबहर-ए-ज़ुल्मात में दौड़ा दिए घोड़े हम नेसफ़्हा-ए-दहर से बातिल को मिटाया हम नेनौ-ए-इंसाँ को ग़ुलामी से छुड़ाया हम नेतेरे का'बे को जबीनों से बसाया हम नेतेरे क़ुरआन को सीनों से लगाया हम नेफिर भी हम से ये गिला है कि वफ़ादार नहींहम वफ़ादार नहीं तू भी तो दिलदार नहींउम्मतें और भी हैं उन में गुनहगार भी हैंइज्ज़ वाले भी हैं मस्त-ए-मय-ए-पिंदार भी हैंउन में काहिल भी हैं ग़ाफ़िल भी हैं हुश्यार भी हैंसैकड़ों हैं कि तिरे नाम से बे-ज़ार भी हैंरहमतें हैं तिरी अग़्यार के काशानों परबर्क़ गिरती है तो बेचारे मुसलमानों परबुत सनम-ख़ानों में कहते हैं मुसलमान गएहै ख़ुशी उन को कि का'बे के निगहबान गएमंज़िल-ए-दहर से ऊँटों के हुदी-ख़्वान गएअपनी बग़लों में दबाए हुए क़ुरआन गएख़ंदा-ज़न कुफ़्र है एहसास तुझे है कि नहींअपनी तौहीद का कुछ पास तुझे है कि नहींये शिकायत नहीं हैं उन के ख़ज़ाने मामूरनहीं महफ़िल में जिन्हें बात भी करने का शुऊ'रक़हर तो ये है कि काफ़िर को मिलें हूर ओ क़ुसूरऔर बेचारे मुसलमाँ को फ़क़त वादा-ए-हूरअब वो अल्ताफ़ नहीं हम पे इनायात नहींबात ये क्या है कि पहली सी मुदारात नहींक्यूँ मुसलमानों में है दौलत-ए-दुनिया नायाबतेरी क़ुदरत तो है वो जिस की न हद है न हिसाबतू जो चाहे तो उठे सीना-ए-सहरा से हबाबरह-रव-ए-दश्त हो सैली-ज़दा-ए-मौज-ए-सराबतान-ए-अग़्यार है रुस्वाई है नादारी हैक्या तिरे नाम पे मरने का एवज़ ख़्वारी हैबनी अग़्यार की अब चाहने वाली दुनियारह गई अपने लिए एक ख़याली दुनियाहम तो रुख़्सत हुए औरों ने सँभाली दुनियाफिर न कहना हुई तौहीद से ख़ाली दुनियाहम तो जीते हैं कि दुनिया में तिरा नाम रहेकहीं मुमकिन है कि साक़ी न रहे जाम रहेतेरी महफ़िल भी गई चाहने वाले भी गएशब की आहें भी गईं सुब्ह के नाले भी गएदिल तुझे दे भी गए अपना सिला ले भी गएआ के बैठे भी न थे और निकाले भी गएआए उश्शाक़ गए वादा-ए-फ़र्दा ले करअब उन्हें ढूँड चराग़-ए-रुख़-ए-ज़ेबा ले करदर्द-ए-लैला भी वही क़ैस का पहलू भी वहीनज्द के दश्त ओ जबल में रम-ए-आहू भी वहीइश्क़ का दिल भी वही हुस्न का जादू भी वहीउम्मत-ए-अहमद-ए-मुर्सिल भी वही तू भी वहीफिर ये आज़ुर्दगी-ए-ग़ैर सबब क्या मा'नीअपने शैदाओं पे ये चश्म-ए-ग़ज़ब क्या मा'नीतुझ को छोड़ा कि रसूल-ए-अरबी को छोड़ाबुत-गरी पेशा किया बुत-शिकनी को छोड़ाइश्क़ को इश्क़ की आशुफ़्ता-सरी को छोड़ारस्म-ए-सलमान ओ उवैस-ए-क़रनी को छोड़ाआग तकबीर की सीनों में दबी रखते हैंज़िंदगी मिस्ल-ए-बिलाल-ए-हबशी रखते हैंइश्क़ की ख़ैर वो पहली सी अदा भी न सहीजादा-पैमाई-ए-तस्लीम-ओ-रज़ा भी न सहीमुज़्तरिब दिल सिफ़त-ए-क़िबला-नुमा भी न सहीऔर पाबंदी-ए-आईन-ए-वफ़ा भी न सहीकभी हम से कभी ग़ैरों से शनासाई हैबात कहने की नहीं तू भी तो हरजाई हैसर-ए-फ़ाराँ पे किया दीन को कामिल तू नेइक इशारे में हज़ारों के लिए दिल तू नेआतिश-अंदोज़ किया इश्क़ का हासिल तू नेफूँक दी गर्मी-ए-रुख़्सार से महफ़िल तू नेआज क्यूँ सीने हमारे शरर-आबाद नहींहम वही सोख़्ता-सामाँ हैं तुझे याद नहींवादी-ए-नज्द में वो शोर-ए-सलासिल न रहाक़ैस दीवाना-ए-नज़्ज़ारा-ए-महमिल न रहाहौसले वो न रहे हम न रहे दिल न रहाघर ये उजड़ा है कि तू रौनक़-ए-महफ़िल न रहाऐ ख़ुशा आँ रोज़ कि आई ओ ब-सद नाज़ आईबे-हिजाबाना सू-ए-महफ़िल-ए-मा बाज़ आईबादा-कश ग़ैर हैं गुलशन में लब-ए-जू बैठेसुनते हैं जाम-ब-कफ़ नग़्मा-ए-कू-कू बैठेदौर हंगामा-ए-गुलज़ार से यकसू बैठेतेरे दीवाने भी हैं मुंतज़िर-ए-हू बैठेअपने परवानों को फिर ज़ौक़-ए-ख़ुद-अफ़रोज़ी देबर्क़-ए-देरीना को फ़रमान-ए-जिगर-सोज़ी देक़ौम-ए-आवारा इनाँ-ताब है फिर सू-ए-हिजाज़ले उड़ा बुलबुल-ए-बे-पर को मज़ाक़-ए-परवाज़मुज़्तरिब-बाग़ के हर ग़ुंचे में है बू-ए-नियाज़तू ज़रा छेड़ तो दे तिश्ना-ए-मिज़राब है साज़नग़्मे बेताब हैं तारों से निकलने के लिएतूर मुज़्तर है उसी आग में जलने के लिएमुश्किलें उम्मत-ए-मरहूम की आसाँ कर देमोर-ए-बे-माया को हम-दोश-ए-सुलेमाँ कर देजिंस-ए-नायाब-ए-मोहब्बत को फिर अर्ज़ां कर देहिन्द के दैर-नशीनों को मुसलमाँ कर देजू-ए-ख़ूँ मी चकद अज़ हसरत-ए-दैरीना-ए-मामी तपद नाला ब-निश्तर कद-ए-सीना-ए-माबू-ए-गुल ले गई बैरून-ए-चमन राज़-ए-चमनक्या क़यामत है कि ख़ुद फूल हैं ग़म्माज़-ए-चमनअहद-ए-गुल ख़त्म हुआ टूट गया साज़-ए-चमनउड़ गए डालियों से ज़मज़मा-पर्दाज़-ए-चमनएक बुलबुल है कि महव-ए-तरन्नुम अब तकउस के सीने में है नग़्मों का तलातुम अब तकक़ुमरियाँ शाख़-ए-सनोबर से गुरेज़ाँ भी हुईंपत्तियाँ फूल की झड़ झड़ के परेशाँ भी हुईंवो पुरानी रौशें बाग़ की वीराँ भी हुईंडालियाँ पैरहन-ए-बर्ग से उर्यां भी हुईंक़ैद-ए-मौसम से तबीअत रही आज़ाद उस कीकाश गुलशन में समझता कोई फ़रियाद उस कीलुत्फ़ मरने में है बाक़ी न मज़ा जीने मेंकुछ मज़ा है तो यही ख़ून-ए-जिगर पीने मेंकितने बेताब हैं जौहर मिरे आईने मेंकिस क़दर जल्वे तड़पते हैं मिरे सीने मेंइस गुलिस्ताँ में मगर देखने वाले ही नहींदाग़ जो सीने में रखते हों वो लाले ही नहींचाक इस बुलबुल-ए-तन्हा की नवा से दिल होंजागने वाले इसी बाँग-ए-दरा से दिल होंया'नी फिर ज़िंदा नए अहद-ए-वफ़ा से दिल होंफिर इसी बादा-ए-दैरीना के प्यासे दिल होंअजमी ख़ुम है तो क्या मय तो हिजाज़ी है मिरीनग़्मा हिन्दी है तो क्या लय तो हिजाज़ी है मिरी
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